मनीषा कुलश्रेष्ठ

परिचय
जन्म :
26
अगस्त 1967, जोधपुर
शिक्षा : बी एस सी, विशारद ( कथक)
एम. ए. (
हिन्दी साहित्य) एम. फिल.
प्रकाशित कृतियां :
बौनी
होती परछांई ( कहानी संग्रह)
मेधा प्रकाशन
कठपुतलियां ( कहानी संग्रह)
ज्ञानपीठ प्रकाशन
कुछ भी तो रूमानी नहीं
( कहानी संग्रह)
अंतिका
प्रकाशन
उपन्यास 'शिगाफ' (राजकमल
प्रकाशन) से शीघ्र प्रकाश्य
अन्य
बहुचर्चित कहानी कठपुतलियां का साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा तेलुगू,
अंग्रेज़ी, पंजाबी,
उर्दू, डोगरी,
राजस्थानी, कश्मीरी भाषाओं में
अनुवाद.
कई
विदेशी रचनाओं का हिन्दी अनुवाद
आजकल
ज्ञानपीठ की पत्रिका
'नया
ज्ञानोदय' के लिए स्थायी कॉलम '
इंटरनेट और साहित्य' लिख
रही हैं।
सम्मान :
1989 में राजस्थान साहित्य अकादमी द्वारा 'चन्द्रदेव
शर्मा पुरस्कार' से सम्मानित।
2001 में कथाक्रम द्वारा आयोजित भारतीय युवा कहानीकार
प्रतियोगिता में विशेष पुरस्कार से सम्मानित।
संप्रति
: वेब
पर पहली
साहित्यक वेबपत्रिका हिन्दीनेस्ट.कॉम का
पिछले आठ
वर्षों से
संपादन
तथा स्वतन्त्र लेखन
Manisha is the Editor of
this website. She can be contacted at:
manisha@hindinest.com
कविताएं
अग्निशिखा
अदेही
सम्बंध
अन्तस
यात्रा
अंतिम
सम्बोधन
अंधेरे
में उजाले की किरण
अन्यमनस्कता
अनकण्डीशनल
अपने
ही विरूद्ध
अमलताश
अलौकिक
खेल रंगों का
आबिदा
परवीन को सुनते हुए
आदमियत
का सच्चा किस्सा
आत्मघात
आत्मविस्मृति
ओ
अदेखे
अजाने
सूर्य
ओ
तूलिका
और
फिर
इतना
भी क्या कम है?
इस
पल
इस
बार दीपावली कुछ अलग तरह मनाएं
इसी
ज़मीन का मौसम
उल्लास
की विलुप्त नदी
उसकी
प्रकृति है मां होना
एक
औरत की पुकार,
यकीन और गुनाह
एक
छोटी सी उड़ान
एक
दिन प्रकृति के संग भी
एक
धागा हताशा का
एक
पोट्रेट
एक
मार्मिक छोर :
एक हार
एकरसता
एकान्त
क्या
आज भी?
क्यों
नहीं जन्मे हम एक शलभ की तरह
कच्चा
आंगन
कठपुतली
जो चिड़िया होना चाहती थी
कल
फिर गांव से गुजरेगी रेल
कोई
एक रंग मेरा भी
कोलाज
कोंपलें
खण्डहर
खत
खुमारियां
खैरियत
गुजरना
उस हरे-भरे मोड़ से
छलावा
छवि
जीवन
के
समानान्तर
जीवन
ज़िद
जोगिया
पल
तुम्हारा
और मेरा बसन्त
दो
छोटी रूमानी कविताएं
तिलिस्म
तुम
लौट आओ तो लौट आएं
रौनकें
तोता
दंश
नदी
नववर्ष
नये
साल की पहली किरण
पतझड़
पतझड़
और अलगाव
पलाश
के जंगल
पारदर्शी
प्रकृति
अपनी-अपनी
प्रिज्म
पीले
पत्तों का सैलाब
प्रेम
प्रेम
की उम्र के चार पड़ाव
प्रेम
बनाम प्रकृति
बिखरे
पुष्प की गंध
भविष्य
आंकते-आंकते...
मरूस्थल
माया
मानसून
मात्र
एक उत्सव
मिट्टी के दिये
मैं
उसका कमरा
मोनालिसा
की तस्वीर!
यूं
तुम हो ...
योगमाया
रोक
लो प्रेम को तिकोना होने से
वक्त
के उस मुहाने पर
वसुन्धरा
वल्लरी
विरल
शक
के गिरगिट
शब्दों
का खेल
शब्द
ये
शब्द
स्वतन्त्रता
का ढीठ स्वप्न
सच
कहना ...
सपनीली
फर्न की फन्तासी में
स्मृति
कोष
सम्भोग
सम
पर आकर टूटती
लय
समय
के साथ
सादा
दिल औरत के जटिल
सपने
साधना
कक्ष
सिमोन
की डांट
सुनहरी
फर्न
हर
बार
हरे
भरे मन की थाह
हाइकू
- एक जीवन्त कविता शैली
हेमन्त
की धूप
होली
के बदलते रंग