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संचार का भविष्य
( यह निबंध सर्वप्रथम सन १९४० मे लिखा गया था जब मैं आई आर एस ई की परीक्षा की तैयारी कर रहा था। उसके बाद समय समय पर विकास की प्रगति देख कर मैंने उसमे कुछ बदलाव किये हैं और भविष्य की कल्पना भी की है। कोई कल्पना कर सकता था कि मोबाइल फोन इस तेज़ी से मकड़े के जाले की तरह चारों ओर फैल जाएंगे और संसार मे कहीं भी उनके द्वारा संपर्क किया जा सकेगा। ऊपर से डिजिटल फोटोग्राफी ने तो कमाल ही कर दिया है। कितनी तेज़ी से यह सब हो रहा है? अब यह मनुष्य के ऊपर है कि वह इसको विकास कार्यों मे लगाये या विनाश के कार्यों मे लगा कर अपने को नष्ट कर ले। आशावादी होने के नाते मैं तो यही आशा करता हूं कि वह चेत जायेगा और नष्ट होने से बच जायेगा।)

कहा गया है कि तीव्र गति या भाग दौड़ आधुनिक मानव की सनक या झक हो गई है। पर यह किसी ने नहीं कहा कि यह तीव्र गति प्रकृति का तो स्वभाव ही है और यही वास्तविक सत्य है। कदाचित मनुष्य भी उसी की होड़ मे उससे जीत पाने का प्रयास कर रहा है। परन्तु मानव इस दिशा मे अभी भी काफी पीछे है। हम देखते हैं कि आकाश मे सूर्य चांद तारे तथा सारे नक्षत्र किस तीव्र गति से घूम रहे हैं। क्या कभी भी वह इस दौड़ मे प्रकृति को पकड़ पायेगा
?
भूतकाल की प्रगति से ही हम भविष्य का अनुमान लगा सकते हैं। लेकिन यह प्रक्रिया हम यदि प्रगति के भविष्य के बारे मे प्रयोग करते हैं तो यह भूल जाते हैं कि प्रगति की रफ्तार लगातार इतनी तेज़ी से बढ़ती जा रही है कि वह मानव की कल्पना से भी बाहर है। अगर सत्रहवीं शताभ्दी मे रहने वाले किसी आदमी से यातायात के भविष्य के भारे मे पूछा गया होता तो शायद वह अधिक से अधिक यह अनुमान लगा पाता कि किसी समय मे बिना घोड़े वाली गाड़ियां चलने लगेंगी और आदमी बिना परों के उड़ सकेगा। पर बह तो केवल उसकी कल्पना मात्र ही होती। बहुत कम लोगों ने उसका विश्वास किया होता। अधिकतर लोग उसको बेपर की उड़ाने वाला अथवा पागल ही समझते। शायद वह स्वयं ही विश्वास नहीं करता यदि उसे टाइम मशीन द्वारा दिखलाया गया होता कि कुछ ही शताब्दियों मे उससे भी अधिक प्रगति हो जायेगी। कदाचित इसी कल्पना के बूते पर पौराणिक साहित्य में पुष्पक विमानों तथा उड़न खटोलों का वर्णन किया गया होगा।
परन्तु हम देखते हैं कि कल्पना के क्षेत्र को मात देकर घटनाओं की प्रगति कहीं अधिक तेज़ी से हुई है। बिना घोड़ों की गाड़ियें सड़कों पर चारो ओर तेज़ी से दौड़ रही हैं। आकाश में उड़ना भी कितना आसान हो गया है। मानव अंतरिक्ष मे पहुंच कर चंद्रमा के चक्कर लगा कर वहां उतर भी चुका है। मनुष्य के भेजे हुए स्पुटनिक आकाश मे चक्कर लगा रहे हैं। और सुदूर नक्षत्रों मे रौकेट यह पता लगाने के लिये भेजे गये हैं कि वहां किस तरह का वातावरण है
?
यदि पहले पृथ्वी पर १० या १५ मील प्रति घंटे की रफ्तार से डाक की गाड़ियें चलती थी आज बिजली की गाड़ियें उससे कई गुना तेज़ी से दौड़ रही हैं। नहीं जनाब जापान मे तो न्यू टोकैडो लाइन पर टोकियो एक्सप्रेस १०० मील प्रति घंटे से भी ऊपर चल रही है। यदि उस समय समुद्र मे यात्रा के लिये हवा की दिशा पर निर्भर रहने वाले पाल जहाज यात्रा मे महीने लेते थे आज उसके स्थान पर तेज़ी से सफर करने वाले स्टीमर कुछ ही दिनों मे यात्रा पूरी करवा देते हैं। हवाई यात्रा से तो यह दूरी और भी कम हो गई है। जो सफर महीनों मे पूरा होता था वह अब कुछ ही दिन लेता है। कभी कभी तो वह कुछ घंटों मे ही पूरा हो जाता है। जूल्स वर्न की कल्पना `राउंड द वर्ल्ड इन एट्टी डेज' अब अस्सी घंटों मे ही तय हो सकती है। कदाचित हमारे देखते देखते यह अस्सी मिनट मे ही संभव हो पाये।
समाचार संचार मे तो वायरलेस ह्यबेतार की तारबर्कीहृ की सहायता से और भी अधिक प्रगति हुई है। जिस समाचार को पहुंचाने मे महीनो लग जाते थे अब कुछ ही पलों मे पहुंचा दिये जाते हैं।
यह सब इतने कम समय मे हो गया है कि मानवीय मस्तिष्क उसको पूरी तरह पचा भी नहीं पा रहा है। लगने लगा है कि प्रगति अब अपनी चरम सीमा पर पहुंच चुकी है और भविष्य मे उसके लिये कोई संभावना ही नहीं रह गई है। हम केवल आधुनिक अविष्कारों को ही परिष्कृत कर सकते है तथा उनको सस्ता बना कर जन साधारण तक पहुंचा सकते हैं।अधिक से अधिक सोचने पर भी एक शताब्दी के बाद क्या होगा उसके बारे में जिस निष्कर्ष पर भी पहुंचें संभावना यही है कि उससे कहीं अधिक आगे हम बढ़ चुके हांगे।
पिछले समय मे क्या प्रगति हुई है उसको ध्यान मे रख कर शायद यह अनुमान लगा पाते कि हवाई यात्रा सारी दुनिया मे जन साधारण के लिये सामान्य हो जायेगी। अमीरों के पास अपने निजी वायुयान होंगे। (जैसे कि कुछ लोगों के पास आज है भी) कदाचित हम यह भी सोच लेते कि लोग अपनी छतों पर अपने वायुयान उतार पाएंगे। यह भी जायरस्कोपिक सिद्धांत से सीधी खड़ी लैंडिंग से संभव हो रहा है। हेलिकौप्टर कहीं भी उतारे जा सकते हैं। फिर यह सोचा जाता कि दुर्घटनाआें से बचने के लिये अंतर राष्ट्रीय पुलिस द्वारा एयर ट्रैफिक कंट्रोल की आवश्यकता पड़ेगी। उसके नियंत्रण के लिये शहरों तथा देशों को आपस मे जोड़ने के लिये सुव्यवस्थित रास्ते तय किये जाएंगे। सड़कों पर गाड़ियें तो केवल गरीब लोगों के लिये ही होंगी। (वह अवस्था तो अभी नहीं आई है)
डाक के बारे मे यह सोचा जा सकता था कि डाक विभाग केवल सरकारी कार्य तथा पारसल ले जाने के लिये ही रह जायेगा। सारे लिखित रिकार्ड फैक्स से भेजे जाएंगे और लोग आपस मे संपर्क के लिये टेलिफोन ही प्रयोग मे लाएंगे। वीडियो फोन साधारण रूप में इस्तमाल होंगे तथा उन ही के द्वारा कान्फरेंस भी संभव हो सकेंगी। यह सब तो हमारे देखने मे आ ही गया है।
यह भी कल्पना की जा सकती थी कि पृथ्वी के लोग दूसरे नक्षत्रों मे जाकर बस जाएंगे और वहां पर अपनी बस्तियां बसा लेंगे। नक्षत्रों के बीच यातायात साधारण रूप से स्थापित हो जायेगा। फिर यह भी संभव है कि आपसी स्पर्धा घृणा तथा लालच के कारण नक्षत्रों मे रहने वाले मर्हायुद्ध करने लगें और इस ब्रह्मांड को ही नष्ट करने का प्रयास करें जैसा कि साइंस फिक्शन के `स्टार ट्रेक' तथा `स्टार वार' जैसे चर्लचित्रों मे दिखलाया जाता है।
ऊपर लिखे विकास का अनुमान तो जिस प्रकार प्रगति हो रही है उसी के अनुसार किया गया है। बहुत कुछ तो इसमे से पूरा भी हो गया है। परंतु संचार की यदि इतनी ही प्रगति हो तो वह तो हमारे अनुमान के अनुसार ही होगी और उसमे कल्पना को कोई श्रेय नहीं मिल सकेगा। परंतु जब हम देखते हैं कि पाश्चात्य मे कल्पनातीत विकास हुआ है तो हमे भी अपने कल्पना के घोड़ों की रफ्तार को तेज़ करना पड़ेगा। यदि हमे आश्चर्यान्वित होना है तो नये मापदंड अपनाने पड़ेंगे। केवल वाष्प शक्ति पेट्रोल या विद्युत शक्ति का सहारा लेकर ही काम नहीं चलेगा बल्कि अपने जहाज़ों को रेडियो की किरण शक्ति से उड़ाना होगा। और यदि ऐसा संभव हो सका तो हमारे जहाज़ उसी गति से चलेंगे। क्या हमे आश्चर्य नहीं होगा यदि एक दिन हमारे वैज्ञानिक हमे रेडियो किरणों के सहारे उड़ा सकेंगे
? उस समय चांद तारे और सारे नक्षत्र संचार क्षेत्र मे आपस मे इसी प्रकार जुड़ जाएंगे जिस प्रकार आज संसार के सारे भाग टेलीफोन द्वारा जुड़े हुए हैं। यदि मानव इस प्र्रकार की प्रगति कर सका तो क्या वह भगवान का ही एक अंश नहीं हो जायेगाऋ क्या वह तब भी अपनी शक्ति को इसी तरह मदांध होकर बढ़ाने की इच्छा तथा इसी प्रकार जाति भेदव़र्ग भेद करता रहेगाऋ यदि उसने अपने को इस पूर्वाग्रह घृणा और लाभ से छुटकारा नहीं दिलाया तो वह अपने आप को ही नष्ट कर लेगा।
शायद प्राचीन काल मे योगी अपने को इसी भावना से निर्लिप्त होने का प्रयास करते रहे हैं। या वह केवल उनकी कल्पना मात्र ही थी कौन जानता है
?



आर्य भूषण
मार्च 1, 2006

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