मुखपृष्ठ  |  कहानी कविता | कार्टून कार्यशाला कैशोर्य चित्र-लेख |  दृष्टिकोण नृत्य निबन्ध देस-परदेस परिवार | फीचर | बच्चों की दुनिया भक्ति-काल धर्म रसोई लेखक व्यक्तित्व व्यंग्य विविधा |  विश्व साहित्य | संस्मरण | सृजन स्वास्थ्य | साहित्य कोष |

 

 Home |  Boloji | Kabir | Writers | Contribute | Search | Fonts | FeedbackContact | Share this Page!

 Click & Connect : Prepaid International Calling Cards 

You can search the entire site of HindiNest.com and also pages from the Web

Google
 
चैनल्स  

मुख पृष्ठ
समाचार
कहानी
कविता
कार्यशाला
कैशोर्य
चित्र-लेख
दृष्टिकोण
नृत्य
निबन्ध
देस-परदेस
परिवार
फीचर
बच्चों की दुनिया
भक्ति-काल धर्म
रसोई
लेखक
व्यक्तित्व
व्यंग्य
विविध
संस्मरण
सृजन
स्वास्
थ्य
साहित्य कोष
 

 

 

 

विजय तेन्दुलकर का होना आज उनके होने से बहुत बडा है...
 

आज विजय तेन्दुलकर हमारे बीच नहीं हैं...इसका दुख तो पूरे नाट्य-संसार को है और हमेशा रहेगा..., पर उनका होना इतना सशक्त जीवंत है, कि नाट्य-सार में उनके होने पर अफ़सोस करने की बात वैसे ही नहीं है - जैसे तुलसीदास के अनुसार राजा दशरथ के लिए नहीं थी - सोच जोग नहिं कौसलराऊ, भुवन चारि दस प्रकट प्रभाऊ... जी हाँ, नाटककार विजय तेन्दुलकर का भी प्रभाव चौदहो भुवन में विख्यात है। उनकी विश्व-ख्याति का डंकाघासीराम कोतवाल ने बजाया था, जो फिर कभी रुका नहीं - सखाराम बाइंडर, कन्यादान, खामोश अदालत जारी है, अंजी, पंछी ऐसे आते हैं...आदि के रूप में देश-देशांतर में गूँजता ही रहा... महाराष्ट्र प्रदेश के विविध करंगों के माध्यम से बुने गये घासीराम कोतवाल से तो प्रभावित होकर 1985 में इसे अग्रेजी में यूँ तैयार किया गया, कि उसमें चीन, जापान, रूस, सिंहल, मोरक्को भारत के कलाकारों ने अभिनय किया। अमेरिका के विभिन्न शहरों में 16 शोज़ हुए। स्वयं तेन्दुलकर के ही शब्दों में - “बहुत बडे पैमाने पर अमेरिकन दर्शकों ने नाटक देखा - अच्छी तरह देखा। बाद में आते उनके ‘ओवेशंस’ बहुत जोरदार होते थे। हो सकता है कि यह अमेरिकन दर्शकों की आदत हो, पर नाटक के दौरान उनके ‘इनवॉल्वमेंट’ देखते ही बनते थे। फिर फॉर्म व विषय के बारे में जो बोलते थे, बडी समझदारी से बोलते थे...। भाषा की अडचन भी वहाँ नहीं आयी’’। विदेश में यह आलम, तो देश का क्या कहना..!

आरम्भ में तेन्दुलकरजी एक प्रखर पत्रकार-स्तम्भकार रहे। उन्होंने फिल्म व टेलीविज़न में भी अपनी विरल प्रतिभा का लोहा मनवाया। गोविन्द निहलानी की फिल्म ‘आक्रोश’ की पटकथा व संवाद तथा ‘अर्धसत्य’ के लेखन के लिए ‘फिल्मफेयर’ व आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर ‘प्रोड्यूसर एमरेटस’ जैसे प्र्ख्यात सम्मान उन्हें मिले। दूरदर्शन के लिए वे निर्माता भी बने। और भी बहुत से काम किये...

लेकिन उनका मूल क्षेत्र नाटक ही रहा और मराठी के होते हुए भी हिन्दी में उनके नाटक किसी भी हिन्दी नाटककार से कम न खेले जाते। स्व. गुरुवर वसंत देव जैसा श्रेष्ठ अनुवादक भी उन्हें मिला। असल में हिन्दी में आने के बाद ही तेन्दुलकर, गिरीश कर्नाड व बादल सरकार जैसे तमाम भारतीय नाटककार राष्ट्रीय स्तर पर जाने गये और फिर अंतरराष्ट्रीय क्षितिजों तक पहुंचे। और इसका श्रेय सबने सहर्ष हिन्दी को दिया भी है। तेन्दुलकरजी को ‘सह्स्त्राब्दि का नाटककार’ घोषित होने का गौरव हिन्दी में ही दिया गया। इस कीर्त्ति को अपने कानों सुनने व इसके निमित्त हुए समारोहों को अपनी आँखों देखने का अवसर उन्हें मिला...। विजयजी अपने जीतेजी ही लीजेंड बन गये । हालांकि वे अपनी तारीफ़ सुनना सचमुच पसन्द नहीं करते थे - कई बार ऐसे अवसरों पर उन्हें सभागार से उठकर जाते हुए मैंने देखा है, लेकिन व्यावहारिकता के नाते काफी कुछ सुनना-करना तो होता ही था...।

विदेश और हिन्दी के अलावा देश की तमाम भाषाओं में तेन्दुलकरजी के नाटक खेले गये। सभी नामचीनों ने खेला...और जिसने नहीं खेला, उसने कहीं न कहीं, कभी न कभी बताया ज़रूर कि क्यों नहीं खेला...। यह क्या उनके बडे नाटककार होने का छोटा प्रमाण है? उल्लेख्य है कि राष्ट्रीय स्तर के जितने भी सम्मान्य पुरस्कार हैं, प्राय: सब उन्हें मिले। ‘संगीत नाटक अकादमी’ (1971), ‘सरस्वती सम्मान’ (1993), ‘पद्मभूषण’ (1984). ‘नेहरू फ़ेलोशिप’ (1973-74), सर्वश्रेष्ठ नाट्यकृति के रूप में ‘शांतता कोर्ट चालू आहे’ को ‘कमलादेवी चट्टोपाध्याय पुरस्कार’ (1970) के अलावा मध्यप्रदेश का प्रतिष्ठित ‘कालिदास सम्मान’, रवीन्द्र भारती विश्वविद्यालय द्वारा डी.लिट. की मानद उपाधि। अपने महाराष्ट्र प्रदेश में तो कतिपय नाटकों को राज्य पुरस्कार व कुसुमाग्रज प्रतिष्ठान के “जन्मस्थान पुरस्कार’’ के साथ ढेरों मान-सम्मान मिले ही...।

लेकिन उनके जन्म प्रदेश (महाराष्ट्र) ने उन्हें उन ‘पुरस्कारों’ से नवाजने में भी कोई कसर नहीं छोडी, जो किसी भी ज़हीन सर्जक के समक्ष घनघोर चुनौती बनकर खडे होते हैं, पर अंतत: उसे महान बनने के कारक भी सिद्ध होते हैं । तेन्दुलकरजी के प्राय: सभी नाटक उच्चकुलीन सामंती मूल्यों पर मर्मांतक प्रहार करते हैं, जिसके कारण शुरुआती दिनों में उन्हें घोर उपेक्षा सहनी पडी। जब उनके पहले नाटक ‘गृहस्थ’ (दामू केंकरे निर्देशित) के पहले शो में सिर्फ़ दस-पाँच दर्शकों को देखकर काशीनाथ घाणेकर(जो बाद में सुपरहिट अभिनेता हुए) ने शो करने से इनकार कर दिया, तो तेन्दुलकरजी ने कभी नाटक न लिखने तक की बात सोच ली थी। फिर दामूजी ने ही उनका पहले का लिखा हुआ नाटक खेला - ‘माणूस नावांचे बेट’, जो चल निकला...। और विजयजी का विश्वास बढा, पर प्रबल विरोध का सामना तो उन्हें सतत करना पडा...। क्योंकि जैसे-जैसे उनका नाट्यलेखन आगे बढता रहा, सामंती व ब्राह्मणवादी (ध्यातव्य है कि वे स्वयं ब्राह्मण थे) मूल्यों पर आघात धारदार से धारदार होता गया। लोगों की नींदें हराम होती गयीं और तेन्दुलकरजी को अपने जान-माल पर भी हमले झेलने पडे। ऐसी अराजकताएं उनके व उनके नाटकों के साथ हुईं और विडम्बना यह कि ‘अनार्किस्ट’ का तमग़ा भी तेन्दुलकरजी पर ही लगा। परन्तु ऐसी अराजकतायें भी अपने विचारों पर दृढ इस कलमकार की आग को दबा न सकीं। और ऐसे पुरस्कार तो साहित्य में (हिन्दी के परसाईजी जैसे) कम ही लोगों को नसीब होते हैं कि एक तरफ विशाल जनसमूह आप की रचनाओं पर फ़िदा है और दूसरी तरफ एक ख़ास मानसिकता की ऐसी नंगई...।

ताज्जुब होता है कि किसी ख़ास पार्टी या संगठन से जुडे बिना भी अकेलेदम यह लेखक सारे प्रहारों का अविचलित भाव से सामना करता रहा। टूटा नहीं, बिखरा नहीं, वरन लगता है कि उससे शक्ति ग्रहण करता रहा- नीलकण्ठ की तरह। बस, एक बात अवश्य थी कि साठ-सत्तर के दशक वाले उनके समय में आज जितना पतन नहीं हुआ था। हर क्षेत्र - यहाँ तक कि राजनीति में भी - सचाई व मूल्यवता का साथ देने वाले लोग एकदम खत्म नहीं हो गये थे...। लेकिन अब तो न वैसे देवता रहे, न ही वैसा अक्षत । कुछ लोगों का मानना है कि विवाद में बने रहने के लिए ऐसी स्थितियां वे जानबूझकर पैदा करते थे, पर यह कयास बेबुनियाद है। सच व मानवीय मूल्यों के प्रति निष्ठा व निर्भयता उनके स्वभाव में थी। उन्होंने कई बार बयान देकर भी नाजायज बातों का खुला विरोध किया  - शिवसेना-भाजपा व नरेन्द्र मोदी तक का...। ‘मेरे हाथ में बन्दूक हो, तो मैं मोदी को गोली मार दूं’ वाला उनका कथन काफ़ी हलचल पैदा करने वाला साबित हुआ था। इस तरह साहित्य की कथनी को जीवन की करनी में उतारने वाले विरल साहित्यकार रहे तेन्दुलकर जी।

यूँ मेरे ख्याल से विजय तेन्दुलकर मितभाषी व काफी संयत स्वभाव के व्यक्ति रहे । उनकी साहसिकता, बेबाक़ी, ईमानदारी व दृढता निहित रह्ती - उनकी गम्भीरता में। परंतु उनकी दृष्टि व प्रतिबद्धताएं बहुत साफ़ थीं। दो छोटे-छोटे, पर प्रत्य्क्ष उदाहरण दूँगा...। पहला है - उनसे मेरी पहली मुलाकात का। फोन पर ‘जनसता’ के लिए मराठी रगमंच पर एक सीरीज़ लिखने के मक़सद को बताते हुए उनसे समय माँगा, तो ‘रंगमंच’ का नाम सुनते ही उन्होंने ‘हाँ’ तो कर दी, पर समय तीन महीने बाद ही मिल पाया, जिस दौरान मुझे पचासों फोन तो अवश्य करने पडे होंगे...। इंटर्व्यू लेने के लिए उन दिनों मैं तेंदुलकर के बारे काफ़ी कुछ पढ रहा था और उससे यह अहसास बन-सा गया था कि वे हर सामने वाले को परखते हैं। सो, मुझे लगा- शायद परख रहे हों और मैं डटा रहा...लेकिन जब मिला - वे ‘सरदार’ फिल्म लिखने के लिए एकांतवास में थे, तो वहाँ लगभग डेढ़ घंटे न कोई फोन आया, न कोई मिलने वाला - सिर्फ़ एक बार मेरे लिए कॉफ़ी देने वाले के सिवा...। समझ में आयी उनकी पद्धति और प्रतिबद्धता । और उन्होंने बताया भी - कि मन तो नाटक में बसता है, इसलिए आप से बात करना ही चाहता था, लेकिन व्यस्तता के कारण आपको बहुत तक़लीफ़ दे दी। मेरे पूछने के दौरान वे सवालों को बडी तल्लीनता से सुनते और मेरी तरफ़ देखती हुई उनकी पैनी आँखें मुझे अन्दर तक भेदती हुई महसूस होतीं। मैंने बालठाकरे से लेकर श्रीराम लागू तक सैकडों लोगों के इंटर्व्यूज लिए हैं, पर ऐसा बेधक अनुभव कभी नहीं हुआ। सवालों के जवाब उन्होंने बडी शिद्दत से, बडी बेबाकी से, पर उतनी ही विनम्र गम्भीरता से दिये। उनके आलोक से निकलकर आते हुए का अहसास मुझे अच्छी तरह याद है - मैं वही नहीं रह गया था, जो डेढ घंटे पहले अन्दर गया था...उनकी निष्ठा व मूल्यवत्ता से बहुत मुतासिर, बहुत समृद्ध होकर निकला था...।

और दूसरा उदाहरण है - मुम्बई में एन.एस.डी. से निकले लोगों के संगठन ‘सांग’ के नाट्योत्सव के उद्घाटन समारोह का...। तेन्दुलकरजी मुख्य अतिथि थे। संयोगन वही मेरा अंतिम अवसर सिद्ध हुआ- उन्हें देखने-सुनने का...। समारोह देर से शुरू हुआ और कारण बना था - ओम पुरी, राज बब्बर, पंकज कपूर आदि का इंतज़ार, जिन्हें वहाँ उत्कृष्ट रंगकर्म के लिए सम्मानित किया जाना था। अपने उद्घाटन-भाषण में तेन्दुलकरजी ने कहा- ‘स्टारों को सम्मानित करते हुए हमें स्ट्रग्लरों को नहीं भूलना चाहिए’...। बडी विनम्रता से सहज ही समझा दिया उन्होंने अपने मंतव्य तथा एक गम्भीर असलियत को - कि जो लोग संघर्ष करके नियमित थियेटर कर रहे हैं, उन्हें छोडकर इस रंग-कला के मंच से टी.वी-फिल्म के उन स्टारों को सम्मानित करना बेमानी है, जो बीसों वर्षों से थियेटर करने तो क्या, देखने तक नहीं आते। यह बात तो सबके मन में चल रही थी, पर उनके कह देने के बाद खुल सकी और तभी मैं इसी उक्त वाक्य को अपने लेख का शीर्षक बनाकर आसानी से उजागर कर सका...।

ऐसा सब देख लेने की तेज नज़र उनके पास थी, जिससे वे नये से नये नाटककार-निर्देशक के काम को देखते ही नहीं, बडी सटीक व स्पष्ट प्रतिक्रिया भी देते थे। उनकी इस नज़र व सक्रियता का कायल रहा है यह ज़माना और जिसके चलते वे थियेटर-जगत में चलती हर कारग़र गतिविधि को जान लेते थे । फिर करणीय को करने का भी भरसक प्रयत्न करते थे। जब वे असाध्य रोग से ग्रस्त होकर पूना के ‘प्रयाग’ अस्पताल में पडे थे, मुम्बई के मराठी रगपटल पर घटी एक घटना को लेकर उससे सम्बद्ध रंगकर्मी को फोन करके पूना बुलाया। अपनी प्रतिक्रिया तो व्यक्त की ही, अपने प्रतिकार का निर्णय भी सुनाया - उस संगठन से वे कभी सक्रिय रूप से जुडे थे। यह सुनकर मैं उनकी प्रतिबद्धता व सरोकार को बस, सलाम ही कर सका। इसके चन्द दिनों बाद ही उनका अवसान भी हो गया...।

ऐसी ही तेज नज़र, ऐसी ही सरोकारजन्य प्रतिबद्धता और इससे अधिक बेबाकी से बने हैं तेन्दुलकरजी के नाटक। हर नाटक किसी ज्वलंत सामाजिक समस्या से बावस्ता हैं। पुरुष व उच्च वर्ग द्वारा निर्मित समाज में मुख्यत: नारी व अंशत: पिछडों के साथ होते अत्याचार उनके नाटकों के मुख्य स्वर रहे हैं। एक तरह की राजनीतिक चेतना का धागा सबमें पिरोया हुआ देखा जा सकता है। और सेक्स का आधार व मारक आक्रामकता (हिंसा) का नाट्यमय व्यवहार इस स्वर के स्वरूप व दिशा के नियामक होते हैं। ‘श्रीमंत’ में कुमारी के माँ बनने की समस्या है, तो ‘गिधाडे’ में इसके साथ अन्यान्य पेचीदे मसले भी हैं। दोनो ही प्रतिष्ठित उच्च वर्गीय परिवार से बावस्ता हैं। ‘अंजी’ में सयानी व अपने पैरों पर खडी लडकी की शादी को लेकर, तो ‘खामोश,  अदालत जारी है’ में एक स्त्री के स्वातंत्र्य को लेकर पूरे समाज की खबर ली गयी है। इसी को ‘कुत्ते’ में अलग तरह से उठाया गया है। ‘जात ही पूछो साधु की’ में शिक्षा-क्षेत्र को आधार बनाकर पिछडी जाति के माध्यम से प्रेम-प्रसंग के बीच जातीय भेद की नृशंसता का खुलासा हुआ है, तो ‘कन्यादान’ में दलित जीवन की पीडा के साथ उसके अंतर्विरोधों को उघाडते हुए दलितोद्धार की सुधारवादी मानसिकता की भी पोल खोली गयी है। और इन सबका समुच्च्य है - ‘घासीराम कोतवाल’। फिर दूसरा समुच्च्य है - कमला, जिसमें नारी-पुरुष व दलित के साथ थोडी मुखर राजनीति को मिलाकर पत्रकारिता जगत के जरिए बात कही गयी है। इनसे थोडा अलग स्थित है - ‘सखाराम बाइंडर’, जिसमें एक सामान्य वर्ग व स्तर वाले पुरुष के स्वैराचार का नंगा निदर्शन है। ‘बेबी’ में बेरोक गुण्डागर्दी से विघटित एक सभ्य परिवार में जानबूझकर बचाये गये भाई का कलेजा हिला देने वाला डर व टूटन तथा बहन के साथ पशुवत सेक्साचार की दिल दहला देने वाली क्रूरता ऐसी भयावह है कि दर्शक के कलेजोदम की भी परीक्षा हो जाती है। इन सबसे अलग मात्र दोपात्री विशुद्ध राजनीतिक नाटक ‘हत्तेरी किस्मत’ देखकर कोई राजनीतिज्ञ पानी तक न माँगे...।      

सेक्स सबमें है, पर नेपथ्य में... मंच पर आता है उसका असर। अधिकांश में नारी ही सेक्सुअल शोषण की शिकार है, जिसे मेल ओरिएंटेड सेक्स के आरोप से नवाजा जाता है। लेकिन चम्पा जैसी नारियां इसकी अपवाद भी हैं। यूँ समाज का सेटअप ही ऐसा है कि सेक्स की स्थिति पुरुषपरक ही है, तो तेन्दुलकर कहाँ से लायें फीमेल परिचालित सेक्स-संसार ? फिर भी बलात्कार तो एक ही होता है। वहाँ भी दशा यूँ दयनीय है कि बाद में लडकी सोचती है कि इसी रूप मे सही, अनुभव तो हुआ सेक्स का। इसमें सेक्स देखना पुन: नादानी ही होगी। इसमें नुमायां होती है- व्यवस्था में नारी की बेचारगी-वंचना। और जहाँ भी सेक्स आया है, ऐसे ही किसी न किसी मारक उद्देश्य का सबब बनकर आया है। अत: उस अर्थ में सेक्स-चित्रण यह है ही नहीं। यह तो विरोध का घिसटता हुआ बहाना भर है। बहरहाल,

यही उक्त विवेचित नाटक ही प्राय: वे प्रमुख व प्रखर नाटक हैं, जिन्होंने तेन्दुलकर को ‘विजय तेन्दुलकर’ बनाया है और जिनके आधार पर सारा मूल्यांकन-विश्लेषण होता है। इनमें हिंसा का नज़ारा देखना हो, तो ‘बेबी’ में प्रत्यक्ष व ख़ौफ़्नाक हिंसा है। ‘गिधाडे’ में पेट फाडकर गर्भ निकाला जाता है। ‘कन्यादान’ में ज्योति के गर्भ पर उसका दलित पति अरुण लात मारता है। ‘ख़ामोश, अदालत..’ की वेणारे बाई के, समाज की दृष्टि से नाजायज़, गर्भ को गिराने का फैसला होता है। ‘बाइण्डर’ में तो हत्या ही होती है। ‘घासीराम’ में उपभोग के बाद स्त्री को हमेशा के लिए सुला देना, नाना की सामंती जीवन-शैली ही है। इन सबके पीछे भोग की कामना व प्राय: सेक्स ही है - कहीं साफ़, तो कहीं संकेतित। लेकिन इन सबमें जातीय उच्चता, पुरुषत्त्व व सत्ता का अधिकार भाव, भोग-लिप्सा एवं तथाकथित नैतिकता ही वे कारक तत्त्व हैं, जिनसे नाटककार की लडाई है। इन पर इतना निर्मम प्रहार कि ये टैबूज टूटें ही नहीं, तहस-नहस हो जायें, की मंशा ही लेखक का इष्ट है। इनमें सडी-गली मान्यताओं व जर्जर हो चली परम्पराओं को तोड फेंकने का जज़्बा है। सबका आधार बनती जड विवाह-व्यवस्था व जातिप्रथा को तोड देने की ईमानदार कोशिश है। पर कहीं इन रूढ संस्कारों से चिपके लोग कर नहीं पाते (सखाराम की लक्ष्मी), तो कही समाज के क्रूर नियंता अपने ख़ौफ़ से ऐसा करने नहीं देते (ख़ामोश की वेणारे बाई को)। और यही सब विजय तेन्दुलकर के नाटकों का मक़सद है। पर कहीं यह सब मक़सद की तरह कहा नहीं जाता। हाँ, नाटकों की घटनाएं ऐसी ध्क्कामार नाटकीय समक्षता से पेश होती है कि इन हैवानी पशुताओं का निश्चित उच्छेदन दर्शकों के मन में बैठ जाता है। परंतु इस प्रक्रिया व इस असर तथा इस नाटकीय क्रियाव्यापार के कौशल को न समझ पाने वाले तमाम लोग इन नाटकों को कथ्यविहीन व उद्देश्यरहित भडकाऊ घटनाओं का संयोजन मात्र कह देते हैं। उनकी बुद्धि पर तरस खाने के सिवा भला क्या कहा जा सकता है !!

असलियत यह है कि तेंदुलकर के नाटक इतने अधिक मक़सद केन्द्रित हैं कि शुरुआत में तो इसीलिए नकारे गये कि इनमें मनोरंजन का तत्त्व ग़ायब ही हो गया। उस समय रंजन-कर्म को साकार करता हास्य नाटकों का बोलबाला भी था और सन्देश या सरोकार भी मनोरंजन की चासनी में ढालकर ही आ सकता था- आता था। तेन्दुलकरजी ने उसमें से निकालकर मराठी नाटकों को वैसे ही निर्मम यथार्थ से जोडा, जैसे प्रेमचन्द ने हिन्दी उपन्यासों को जासूसी-अय्यारी की दुनिया से निकालकर जीवन से जोडा। सो, इस प्रयोग को लोग गले ही न उतार पायें। उस पहले नाटक में उंगलियों पर गिने जाने जितने दर्शकों के आने का एक कारण यह भी था। लेकिन यह भीषण प्रयोग तेन्दुलकरजी ने पूरी हिम्मत व शिद्दत से किया कि इन कडवी हक़ीकतों को देखो, समझो और इस कडवाहट के यथार्थ से रू-ब-रू होओ, ताकि समाज में कहीं कुछ हिले-बदले... नाटक का उद्देश्य हास्य में मस्त करके सुलाना मात्र नहीं, वरन झिझोडकर जगाना भी है। उनके आविर्भाव का समय 1950 -55 का है, जो आजादी मिलने के बाद की अपेक्षित जागृति का समय भी है। इस सोद्देश्य नाट्यप्रयोग को कम ही समय में आम दर्शक द्वारा स्वीकार लिया गया, जबकि तमाम समानधर्मी समीक्षक व नामचीन सत्ताधारी लोग उसे इस या उस कारणों से नकारते ही रहे...जिनकी मूल वास्तविकता वही थी कि उसमें उनके अपने असली चेहरे दिखायी पडते थे और उसे वे देख नहीं सकते थे...।

उक्त वर्गीय विरोध के साथ नकार व अडंगे सेंसर की तरफ़ से भी आये - इतने कि एक ऐसा लेख सिर्फ़ इसी मुद्दे पर लिखा जा सकता है। पर यहाँ टोकेन के रूप में सिर्फ़ ‘गिधाडे’ की बात कहकर आगे बढूंगा...। सबसे पहले तो उसे करने के लिए कोई नाट्यसमूह व निर्माता तैयार ही न होता था। आश्चर्य न कीजिए कि लगभग 7-8 सालों तक डॉ श्रीराम लागू जैसे व्यक्तित्त्व के प्रस्तावों के बावजूद तमामों के साथ ‘रंगायन’ (पुणे) जैसे रंगमंडल तक ने हिम्मत न की। और जब हुआ भी, तो सत्यदेव दुबे ने निर्माता का दायित्त्व ख़ास तौर पर इरादतन सँभाला और उसके पहले कभी न करने वाले निर्देशन का जिम्मा स्वयं लागू ने लिया, क्योंकि इस नाटक की बेबाक प्रखरता ने उन्हें बेचैन कर रखा था। निर्माण की प्रक्रिया की तमाम बातों को ‘कट टु’ करके हम सीधे सेंसर पर आयें... सेंसर ने उसमें 150 कट किये। उतना सब करने के बाद तो नाटक बचता ही नहीं। सो, दुबे-लागू ने एक भी ‘कट’ माने बिना नाटक को मंचित कर डाला। पेशी हुई और आमने-सामने बैठकर इन दोनो कलाकारों ने ‘साहित्यकार-कलाकार की स्वतंत्रता की जानिब से बात की, तो 148 ‘कट’ निरस्त हो गये। जो दो बचे, उनमें एक तो कर्त्ताओं ने मान लिया, पर बचे एक में सेंसर की जडता का नज़ारा रोचक है। गर्भ गिराने के बाद खून लगी सारी में मंच पर आने को वे किसी भी तरह मान न रहे थे। हारकर समझौता यूं हुआ कि पीले दागों वाली सारी में स्त्री मंच पर आती और नेपथ्य से आवाज होती - ‘कृपया इसे ‘लाल’ समझें’। ऐसे सीरियस दृश्य में इस घोषणा के एकदम उलटे असर की कल्पना कीजिए...और अन्दाज़ लगाइए कर्त्ताओं की मज़बूरी का...तथा हद देखिए सेंसर के अहमकपने की...।

हिंसा व वर्गीय चोट के अलावा नाटकों में प्रयुक्त गालियां भी विवाद का कारण बनतीं। वर्जित अपशब्द भरपूर आते हैं तेन्दुलकरजी के नाटकों में। किंतु वे इतने ज़रूरी बनकर आते हैं कि यदि ‘सखाराम’ की भाषा से गालियां निकाल दें, तो बचेगा क्या ? सखाराम श्रीहीन हो जायेगा। नाटक अति सामान्य हो जायेगा। सुना है कि कहीं गालियां निकालकर प्रयोग किया गया, तो चलते शो में दर्शक-दीर्घा से उसके संवादों पर आवाजें आतीं - सखाराम, गाली दे..। असल में तेन्दुलकर के नाटक इस पाखण्डी व्यवस्था पर गाली ही तो हैं, जो पात्रों के मुँह से भी निकल जाती है। घर में अपनी बहू-बेटी के पेट चीर देंगे और बाहर से सुसंस्कृत बनने का ढोंग करते रहेंगे। क़ातिल-अय्याश नाना सत्ताधीश है। ऐसे समाज को गाली देकर ही कुरेदा जा सकता है। तेन्दुलकर के लगभग समकालीन दुष्यंतकुमार को भी ऐसा ही लगा था - ‘गिडगिडाने का यहाँ कोई असर होगा नहीं ; आह भरकर गालियां दो, पेट भरकर बद्दुआ’। और इस पुराणपंथी समाज के बुरा मानने का तो क्या कहा जाये... तेन्दुलकरजी के गहन अर्थ भरे एक एकांकी ‘मादी’ का मंचन कर दिया डॉ लागू व विजया मेहता ने और उसकी सारी अर्थवत्ता को छोडकर, बस शरीर-स्पर्श को लेकर हंगामा बरपा कर दिया गया...। ‘गिधाडे’ को तो ‘मराठी नाटक और मानसिक विकृति’ नामक सेमिनार में एक मुख्य विवेच्य नाटक के रूप में रखा गया। इस मानसिकता का क्या ही माकूल जवाब दिया है डॉ लागूजी ने - ‘गिधाडे’ के लोग जन्म से मानसिक विकृति लेकर नहीं आये, ये समाज के सांस्कृतिक पतन के ग्रास बने हुए लोग हैं। अपसंस्कृति द्वारा किया गया इनका विनाश बहुत ही भयानक और दारुण है। रमा और रजनीकांत जैसे सुसंस्कृत लोग आज की नृशंस दुनिया में पिसते जाते हैं, यह सचाई भी उतनी ही दारुण हैं। लेकिन नाटक यह भी बताता है कि यह सब रमा के केवल ‘तुलसी-वृन्दावन’ से खत्म होने वाला नहीं। सुसंस्कृत होने के साथ बल भी होना चाहिए। बल भी केवल शरीर व शस्त्रों का नहीं, वरन नैतिक बल, जो कुसंस्कारों को हटाकर सुसंस्कारों को स्थापित करे... तभी गिद्धों का पनपना रुकेगा’।

अपने जीवनमूल्यों की तरह नाट्यमूल्यों को लेकर भी कम विवाद में नहीं रहे तेन्दुलकर। कहा जाता है कि इनके नाटक इतने सधे व सिद्ध हैं, मकसद इतना ठोस व सटीक है कि निर्देशक न कुछ खास कर सकता, न ही कोई दूसरी व्याख्या दे सकता। यह विशेषता जहाँ उनके चुस्त-दुरुस्त कौशल का मानक है, वहीं कुछ निर्देशकों की नाराज़गी का सबब - हमारे लिए कुछ है ही नहीं, तो हम क्यों करें ? अनकहे को कहा बनाने का विरल प्रयोग किया तेन्दुलकर ने, जिसके लिए आधे वाक्य कहकर आधे को छोड देने का गुर अपनाया। इसे बहुत दिनों तक किसी ने समझा ही नहीं और बहुतों ने कभी नहीं समझा। इसी त्वरा में चरित्रों का विरूपीकरण भी द्रष्टव्य है - सखाराम-लक्ष्मी-चम्पा, अरुण आठवले, वेणारे बाई, अंजी...आदि का। तेन्दुलकरजी इन्हें जिस तरह बनाते हैं- याने पेश करते हैं, वे कुछ और ही दिखते हैं। गाली बकने वाला व औरत को सामान समझने वाला सखाराम अंत तक आते-आते कहीं ‘जस्ट व राइट’ भी बनकर उभरता है। वेणारे बाई की चरित्रहीनता के बीच से निकलती है - उसकी त्रासदी। इस प्रक्रिया में ही नाटक बनते जाते हैं। जो लोग ऊपरी सतह को ही सच समझ लेंगे, इन पात्रों व नाटकों के साथ न्याय नहीं कर सकेंगे। फिर हर नाटक में नये-नये प्रयोग। एक प्रयोग, दूसरे में दोहराया जाता नहीं मिलेगा। और सब एक से एक नाट्यमय। फिर भी सारे के सारे नाटक यथार्थवादी। कब, कहाँ, कौन-सा प्रयोग आ जायेगा; का कोई अन्दाज़ लगा पाना बेहद मुश्किल। अकेले ‘घासीराम’ में प्रयोग-बाहुल्य का विलास... नाच-गान से लेकर खाँटी लोक व कीर्तन आदि की कितनी ही शैलियां समाहित। अत: कथ्य के स्तर पर भले एक बार नाटककार तेन्दुलकर को किसी टाइप में बाँधा जा सके, पर कलात्मकता को कहीं टाइप्ड कतई नहीं किया जा सकता...।

ये नाटक व इनके पात्र कहाँ से आये? इनके स्रोतों के बारे में तेन्दुलकरजी ने कभी नहीं बताया। पूछने पर यही कहते- मालूम नहीं कहाँ से, पर आये हैं...। ‘कमला’ तो जगजाहिर घटना पर आधारित है। इस पर जगमोहन मुन्दडा ने इसी नाम से फिल्म भी बनायी। ‘खामोश’ पर सत्यदेव दुबेजी ने बनायी। असली सखाराम से नीळू फुळेजी मिले थे - वाई (सातारा) में। और यूँ सभी पात्र व नाटक तो खाँटी जिन्दगी से ही निकले हैं, पर लगाने वालों ने पता लगा लिया है कि उनके अधिकांश नाटक किसी न किसी विदेशी नाटक से प्रेरित है। कि उन्हें तेन्दुलकरजी ने अपने परिवेश में ढाल लिया है। कि उन सूत्रों को न बताकर वे लेखकीय ईमानदारी से च्युत होते हैं...आदि-आदि। इस कारण भी उनके एक भी नाटक इरादतन न खेलने वाले हिन्दी के नामचीन राष्ट्रीय नाट्य संगठन मुम्बई में भी हैं। पर वे खुलकर कहने की भी हिम्मत नहीं रखते, जो उनकी असलियत की कथा आपोआप कह देता है।

हाँ, इस आरोप में सचाई अवश्य है कि अर्थतंत्र इनके नाटकों में नितांत उपेक्षित है। कोई भी पात्र इससे जूझता नहीं दिखता। फिर अपनी सारी विद्रोही चेतना के बावजूद, ताज्जुब होता है कि, ‘आपात्काल’ का विरोध करते हुए तेन्दुलक्रर कहीं नहीं दिखते। इससे वे हम जैसे बहुतों की नज़र में उतने ऊंचे नहीं रह जाते, जितने एक नाटककार के रूप में हैं, पर इससे उनके नाटकों पर कोई फ़र्क़ नहीं पडता। उसमें वे महान हैं और रहेंगे।

हिन्दी में तेन्दुलकरजी के नाटक अब भी लगातार खेले जा रहे हैं, पर पिछले दो दशकों से ही मराठी में उनके नाटकों के मंचन बहुत कम हो गये हैं। इसका सबसे बडा कारण तो मराठी में निरंतर लिखे जा रहे अच्छे नाटक हैं, पर इस दौर में फ़ौरी के प्रति झुकाव की एक प्रवृत्ति भी बहुत अहम है, वरना अभी तेन्दुलकरजी के इन प्रचलित नाटकों में भी असीम संभावनाएं निहित हैं। कुछ श्रद्धावान निर्देशक कहते सुने जाते हैं कि सडकों पर धन्धा करने वालों पर आधारित ‘फुट्पायरीच्या सम्राट’ और आवास की समस्या पर केन्द्रित ‘चिमणीच्या घर’ जैसे कम प्रचलित नाटकों को खेलने की उनकी योजना है। यदि आज की विकसित नाट्य-कला के साथ ऐसे प्रयत्न हुए, तो अभी नाटककार विजय धंडोपंत तेन्दुलकर में बहुत कुछ ऐसा बाकी है, जो मराठी व भारतीय रंगमंच को नयी ऊंचाइयों तक ले जा सकता है...। और आज उनके न रहने पर हम सभी नाट्यप्रेमी इसके साकार होने के मुंतज़िर हैं...

 


-सत्यदेव त्रिपाठी
सितंबर 16, 2008

Hindinest is a website for creative minds, who prefer to express their views to Hindi speaking masses of India.

             

मुखपृष्ठ  |  कहानी कविता | कार्टून कार्यशाला कैशोर्य चित्र-लेख |  दृष्टिकोण नृत्य निबन्ध देस-परदेस परिवार | बच्चों की दुनिया भक्ति-काल धर्म रसोई लेखक व्यक्तित्व व्यंग्य विविधा |  विश्व साहित्य | संस्मरण | सृजन साहित्य कोष |
प्रतिक्रिया पढ़ें! |                         प्रतिक्रिया लिखें!

HomeBoloji | Kabir | Writers | Contribute | Search | Fonts | FeedbackContact

(c) HindiNest.com 1999-2009 All Rights Reserved. A Boloji.com Website
Privacy Policy | Disclaimer
Contact : manisha@hindinest.com