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हम इक उम्र से वाकिफ़ है

इनसान अपनी स्मृति की आधारशिला पर टिका होता है। उसकी स्मृतियाँ उसकी अस्मिता हैं और ये स्मृतियाँ ही उसके वर्तमान को अतीत से जोड़ती हैं। हम शायद कलम कहाँ रखी है यह भूल जाएँ, पर यह नहीं भूलते कि उर्दू क्लास के मौलवी साहब पान कैसे चबाते थे। लेकिन स्मृतियाँ कई बार हमारे दिमाग़ पर बोझ भी बन जाती हैं, फिर उन्हें दिमाग के कवाड़ से ढूँढ़ना कठिन होता है। लेकिन कोई छोटी बात, कोई गंध, कोई स्पर्श झट से आपको पुरानी स्मृति से जोड़ देते हैं।

संस्मरण वर्तमान में अतीत के बारे में लिखे जाते हैं। अतीत और वर्तमान के बीच वाचक के साथ काफ़ी कुछ घटित हो चुका होता है। संवेदना, भाषा, परिप्रेक्ष्य, अभिव्यक्ति, जीवन की प्राथमिकता, संबंध, दृष्टि आदि ऐसे बदल चुके होते हैं कि अतीत बिलकुल उलटा भी दिख सकता है। इमली तोड़ने के लिए आप बचपन में पेड़ पर चढ़े, गिरे, हाथ तुड़वा बैठे। तकलीफ़ हुई ऊपर से पिता ने पीटा, माँ ने कोसा। आज उसी घटना को याद कर हँसी आ सकती है। इमली की डाल कमज़ोर होती है, यह बच्चे को कहाँ पता? बेवकूफ़ी और उत्साह के मारे हाथ तुड़वा बैठे। पर तब वह हरक़त बेवकूफ़ी कहाँ लगी थी?

आजकल हिंदी साहित्य में संस्मरणों की बहार है। संस्मरण की बहार यहीं नहीं है। अमरीका में लेखन-विधा के गुरु हैं विलियम जिंसर। वे लेखन का मैनुअल लिखते हैं -- जीवनी कैसे लिखें, आत्मकथा कैसे लिखें आदि आदि। उन्होंने संस्मरणों के धुँआधार प्रकाशन पर टिप्पणी की, ``यह संस्मरण का युग है। बीसवीं सदी के अंत के पहले कभी भी अमरीकी धरती पर व्यक्तिगत आख्यान की ऐसी जबर्दस्त फसल कभी नहीं हुई थी। हर किसी के पास कहने के लिए एक कथा और हर कोई कथा कह रहा है।'' संस्मरणों की बाढ़ से अमरीकी इतने दुखी हुए कि संस्मरणों की पैरोडी तक लिखी जाने लगी। शुक्र मनाइये कि हिंदी में मामला यहाँ तक नहीं पहुँचा है।

संस्मरण क्यों लिखे जाते हैं? क्या संस्मरण नहीं लिखे तो लेखक के पेट में मरोड़ होगा? या उबकाई आ जाएगी? वह कौन-सी र्दुनिवार इच्छा है जो संस्मरण लिखवाती है? हिंदी में संस्मरण यदाकदा लिखे जाते थे। आलोचना भी उसे एक अमहत्त्वपूर्ण विधा मानकर चलती थी, लिहाज़ा संस्मरणों की अनदेखी होती थी। जहाँ तक मेरा अनुमान है कि विश्वनाथ त्रिपाठी द्वारा नामवर सिंह पर लिखे संस्मरण `हक जो अदा न हुआ' ने ऐसा धूम मचाया कि एकदम से इस विधा की क्षमता का पुनर्प्रकटीकरण हुआ और संस्मरण की ओर कई रचनाकार मुड़े। काशीनाथ सिंह का इस तरफ़ सबसे पहले मुड़ना संगत ही माना जाना चाहिए।

आत्मकथा जैसी विधा की गंभीर विदुषी लॉरा मरकुस ने आत्मकथा और संस्मरण में अंतर करते लिखा है : ``यह अंतर केवल रूपगत नहीं है। आत्मकथा लेखक आत्म-चिंतन कर सकते हैं और संस्मरण लेखक में यह क्षमता नहीं होती।'' आचर्य नहीं कि इन दिनों प्रकाशित संस्मरणों में लेखक का व्यक्तित्व नहीं झाँकता। बल्कि संस्मरण लेखक अपने व्यक्तित्व को छिपाता है।


अल्डुअस हक्सले का विचार था कि हर व्यक्ति की स्मृति उसका निजी साहित्य है। यह साहित्य प्राइवेट है। तो लेखक इसे क्यों सार्वजनिक करना चाहता है? इसका उत्तर संस्मरणों के पैरोडीकार डेनियल हैरिस ने एक साक्षात्कार में दिया, ``संस्मरण खुद के हाशियाकरण से निबटने की कोशिश है।'' हंस, तद्भव अन्य पत्रिकाओं में ऐसे अनेक संस्मरण प्रकाशित हुए हैं जिनका उद्देय खुद के हाशियाकरण के भँवर से निकालकर साहित्य के केंद्र में लाना था। ग़ौर से देखें तो `मेरे विश्वासघात' स्तंभ में लिखने वालों की प्रबल इच्छा यही थी। एक वृद्ध लेखिका का प्रेम-प्रसंग इतना दयनीय था कि आप अविश्वास से भर उठें। `हंस' के उस स्तंभ में कुछ और विश्वासघाती आए पर वे दूसरों के छल और विश्वासघात की कथा सुनाते रहे। मज़े की बात है कि `मेरे विश्वासघात' स्तंभ बंद होने के कगार पर था पर हंस के मालिक संपादक राजेंद्र यादव, मन्नू भंडारी सहकर्मी अर्चना वर्मा, गौरीनाथ या राजेंद्र जी की मंडली के पंकज बिष्ट प्रभृत्त ने अपने `विश्वासघातों' का खुलासा नहीं किया और उस स्तंभ को बंद हो जाने दिया गया क्योंकि `मेरे वि विश्वासघात' स्तंभ ने अपना व्यावसायिक उद्देश्य -- लेखक और पत्रिका का प्रचार -- हासिल हो गया था।

संस्मरण का एक और प्रकार है -- व्यावसायिक संस्मरण। हाल में मलयालम में एक कॉलगर्ल ने अपनी आत्मकथा लिखी और उसके कई संस्करण धड़ाधड़ बिक गए। कुख्यात अपराधी बबलू श्रीवास्तव की आत्मकथा प्रकाशित होनेवाली है। संस्मरण का एक वर्जित क्षेत्र भी है। चरित्र हनन की साज़िश रचने वाला पत्रकार संस्मरण नहीं लिखता। भ्रष्ट नेता भी संस्मरण क्यों लिखें? बलात्कारी, लुटेरा, हत्यारा, ईर्ष्यालू, धोखेबाज़ भी क्यों लिखें? ये र्वाजत संस्मरण
लेखक जैसे ही कलम उठाएँगे, प्रकाशक का घर पैसों से भर जाएगा। लेखक भी रातों-रात प्रसिद्ध और समृद्ध हो जाएगा। संस्मरण में जितनी अधिक वर्जना होती है, वह उतना ही बिकाऊ होता है। बिल क्लिंटन को एक करोड़ बीस लाख डॉलर का अग्रिम इसके लिए मिला था।

डैनियल हैरिस कहते हैं, ``यह संस्मरण लोकप्रिय आंदोलन जैसा रूप ले चुका है। वस्तुत: इसकी शुरुआत आठवें दाक में हो चुकी थी। अब तो इसे लोक-कला जैसी चीज़ माना जाता है -- आप संस्मरण लिखें और अपने परिवारियों और मित्रों के बीच बाँट दें। कायदे से इसे आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्पद होना चाहिए था पर अब यह एक उद्योग है।'' प्रकाशन जगत इस तथ्य को जानता है। इन पंक्तियों को लेखक को एक पाठक-सर्वेक्षण को निर्देशित करने का अवसर मिला था। यह सर्वेक्षण दिल्ली के एक प्रतिष्ठित प्रकाशन ने करवाया था। उसमें एक प्रन था -- पाठकों में सबसे लोकप्रिय विधा कौन-सी है? मैं उम्मीद कर रहा था कि उत्तर आएगा -- उपन्यास या कहानी। पर पाठकों के बहुमत का उत्तर था -- आत्मकथा। कहना न होगा कि संस्मरण आत्मकथा की ही एक उपविधा है। आज वही प्रकाशक आत्मकथ्य और संस्मरणों की सर्वाधिक पुस्तकें छापता है।

संस्मरण सिर्फ साहित्य के क्षेत्र में ही सीमित नहीं होता / संस्मरण के लिए उपन्यास लेखन जैसी कला की जरूरत नहीं होती, इसलिए इसे कोई भी लिख देता है। खिलाड़ी, व्यापारी, शिक्षक, व्याभिचारी। लेकिन मुख्यत: संस्मरण बचपन, सफलता और वर्जना को ही लेकर लिखे जाते हैं।

उपन्यास में कल्पना की जरूरत बहुत अधिक होती है। पर संस्मरण में इसकी जरूरत बहुत कम। इसके साथ ही उपन्यास में प्रयोगों के बावजूद विधा की एक सीमा तो रहती ही है, संस्मरण में ऐसी कोई बंदिश नहीं होती। संस्मरण का रूप नैर्सागक और उन्मुक्त होता है।

संस्मरण विरेचन भी है। मानसिक विरेचन। संस्मरणों में आत्मप्रांसा और परनिंदा प्राय: साथ साथ आते हैं। कटाक्ष्य, अपमान प्रसंग लेखक को भीतर ही भीतर मथता रहता है। व्यक्तिगत रूप से मिलकर लेखक खल पात्र को अपनी बात कह नहीं सकता। ज़रा सी फुर्सत मिलते ही ध्यान उस अपमान, उस कटाक्ष की ओर चला जाता है। महाभारत की कथा अपमान के बग़ैर आगे बढ़ नहीं सकती थी। लेखक दुर्योधन है नहीं के कुरुक्षेत्र में जाकर लड़ लें, वह कलम को तलवार बनाता है और परनिंदा शुरू कर देता। परनिंदा परोक्ष रूप से आत्मप्रांसा है। पर उससे भी संतोष न हो तो आत्मप्रशंसा पर उतर आता है।

संस्मरण में एक सुर विपरीत परिस्थितियों में भी अस्तित्व बनाये रखने का होता है। इसे जिजीविषा-संस्मरण कह लें। प्राय: इसमें संस्मरण लेखक अपनी तकलीफ़ों, मुसीबतों का सुंदर वर्णन करता है और अपनी `न दैन्यम् न पलायनम्' वाली क्षमता का प्रर्दान करता है। यह भी आत्मप्रशंसा ही है। मुसीबतों को जितना अधिक बढ़ाकर दिखाया जाता है, संस्मरण-लेखक का पराक्रम उतना ही अधिक उभारा जाता है। इसी का एक रूप होता है -- विजय संस्मरण। लक्ष्य मुकिल ही नहीं, असंभव था पर संस्मरण-लेखक अपनी सूझबूझ, साहस और संघर्ष से उसे पा लेता है। संस्मरण-लेखक दोनों तरह के होते हैं -- आम और ख़ास। आम संस्मरण-लेखक आम इंसान ही होता है। वह अपने विकट अतीत, विकट समस्या (जैसे शराबखोरी) या विकट संकट (विकलांगता वग़ैरह) से जूझने का प्रसंग लिखता है। ख़ास लोग स्वयं से ऊँचे, समान, समकालीन और प्रतिद्वंद्वी के बारे में लिखते हैं। उसमें प्रतिद्वंद्वी, दुमन, समस्यामूलक संबंधों को नीचा दिखलाया जाता है। साहित्यिक लेखक प्राय: लेखकों के बारे में ही लिखता है। प्रकाशक या रिक्शा वाले के बारे में नहीं। कुछ लोग संस्मरण को निजी आख्यान कहते हैं तो मेरा मन कहता है कि संस्मरण को निजी बखान कह दूँ।

संस्मरण भी आत्मकथा ही है अलबत्ता वह समग्र आत्मकथा के मुकाबले काफ़ी छोटी होती है। संस्मरण अतीत के ख़ास क्षणों, महत्त्वपूर्ण मोड़ों को फिर से जीवित करने की कोशिश होती है। कई बार संस्मरण लिखते समय अतीत की साधारणता भी महत्त्वपूर्ण लगने लगती है। आत्मकथा में निजी जीवन के दस्तावेज़ीकरण की कोशिश होती है तो संस्मरण में दस्तावेज़ की शुष्कता के बजाय भावना अधिक सक्रिय हो उठती है इसीलिए अतीत के मुलाकाती, परिजन, घटनाएँ अधिक आत्मीयता से प्रस्तुत हो पाती हैं। संस्मरण को आत्मकथा का फ़्लैा कहा जा सकता है। लेकिन जब दूसरे का स्मरण किया जाए तो उसे संस्मरण-चित्र कहना अधिक सही रहेगा। लेकिन वह रेखाचित्र से भिन्न ही रहेगा क्योंकि रेखाचित्र प्राय: स्टिल-लाईफ़ पेंटिंग जैसे होते हैं।

संस्मरण विधा प्राय: समय के एक ख़ास दौर तक, उस दौर से जुड़ी घटनाओं, व्यक्तियों तक सीमित रहती हैं लेकिन ये सब वही होंगे जो लेखक की स्मृति में टिके हों। जो विस्मृत हो गए वे चाहे आख्यान के तर्क से कितने ही ज़रूरी हों, संस्मरण में नहीं आ पाते। लिहाज़ा संस्मरण में कार्य-कारण वाली तर्क प्रणाली अनुपस्थित हो तो आचर्य क्या? लेकिन जो स्मृति में है, वे भी सब के सब संस्मरण में आ जाएँ कोई आवयक नहीं होता। लेखक अपनी सुविधा से उन्हें छोड़ता, जोड़ता चलता है। यही स्थिति समय की है, संस्मरण में किसी का संपूर्ण जीवन-समय नहीं आता (यदि आ जाए तो वह आत्मकथा हो जाएगी) बल्कि जीवन समय के टुकड़े आते हैं। इन जीवन खंडों में संघर्षों, टकरावों, समाधान और उनके महत्त्व पर बल दिया जाता है। संस्मरण में आए व्यक्तियों, घटनाओं और उसके परिणामों का पुनर्सृजन आत्मीय और जीवंत तरीके से किया जाता है।

वर्जीनिया वुल्फ ने अपनी डायरी में लिखा, ``मैं यहीं नोट कर सकती हूँ कि अतीत सुंदर होता है क्योंकि उस वक्त की भावना का अहसास लोगों को कभी भी नहीं होता। बाद में उसका अहसास विस्तारित हो जाता है। और इसीलिए हमारे पास वर्तमान के लिए पर्याप्त भावना नहीं होती, बस अतीत के लिए होती, मुझे लगता है कि हम इसीलिए अतीत के बारे में ज्यादा सोचते हैं।'' हर किसी के पास निजी आख्यान है। किसी का जीवन सामान्य अथवा असामान्य रहा हो, उस आख्यान में कोई न कोई नई, अनूठी बात ज़रूर होगी। इसीलिए समकालीन संस्मरण परिदृय में हमें इतने लोग संस्मरण लेखन में जुटे दीखते हैं। जीवन के रहस्य और अनूठेपन के प्रति उत्सुकता र्दुनिवार होती है इसीलिए उसे पाठक पढ़ना भी चाहते हैं। स्मृति हमें पहचान ही नहीं देती बल्कि अतीत और वर्तमान के बीच पुल का काम भी करती है। जब स्मृति आप पर हावी होती है तो वही होता है जो दुष्यंत कुमार ने लिखा :
तुम रेल सी गुज़रती हो,
मैं पुल सा थरथराता हूँ।

होती है जिससे संस्मरण-लेखक गुज़रता है, लड़ता है, हारता है, जीतता है, निर्णय लेने से डरता है, निर्णय ले लेता है। हर अनुभव से गुज़रना किसी के लिए संभव नहीं है। सिद्धांत और अनुभव के मेल से विकसित होने वाली बुद्धि के लिए पाठक दूसरों के अनुभव से अपने अनुभव की कमी की भरपाई करता है। संस्मरण एक गतिशील प्रक्रिया है जिसकी आधारशिला स्मृति है लेकिन संस्मरण सारतत्व में मनुष्य के होने का अर्थ ही खोलता है।

पेंग्विन डिक्ानरी ऑफ़ लिटरेरी टर्म्स एंड लिटरेरी थ्योरी (संस्मरण १९९१) में अंग्रेज़ी के आलोचक जे.ए. कडेन ने लिखा, ``आत्मकथा अधिकांश काल्पनिक होती है। कम ही लोग प्रारंभिक जीवन के विवरणों को साफ़-साफ़ याद कर पाते हैं और इसीलिए वे दूसरों द्वारा निर्मित छवि पर निर्भर हो जाते हैं और यह स्रोत उतना ही अविश्वसनीय होता है। असहमति वाले तथ्यों या तो विस्तार पा जाते हैं अथवा दबा दिए जाते हैं।'' बावजूद इसके संस्मरण को सत्य की बैसाखी मिली हुई है और पाठक उसे सत्य ही मानते हैं। सच, असली सच जानने की उत्कंठा उन्हें संस्मरणों के पास लाती है और वे संस्मरण लेखिका द्वारा रची एक निर्मिति लेकर लौट जाते हैं। संस्मरण में सत्य का अंश होता है, संपूर्ण सत्य कभी हो भी नहीं सकता। फिर भी संस्मरण की विशेषता सत्य को ही माना जाता है। सत्य का लेबल ही उसे पाठकों के बीच उत्सुकता और स्वीकार्यता का बिंदु बनाए रखता है। अदालत में लोग शपथ लेकर भी झूठ बोलते, यह सभी जानते हैं। फिर भी पाठक यह क्यों मानते हैं कि लेखक अदालत जाकर कोई शपथ पत्र नहीं बनाया है, ने सच ही लिखा होगा? अंग्रेज़ी के उपन्यासकार एंथनी पॉवेल ने ठीक ही लिखा है, ``संस्मरण कभी भी पूरी तरह सच नहीं हो सकते क्योंकि बीती हुई हर बात, हर घटना, हर परिस्थिति को संस्मरण में ाामिल कर पाना मुमकिन भी नहीं है।''

वास्तव में संस्मरण सत्य का आभास है। वह स्मृति पर निर्भर है और स्मृति में कई जटिलताएँ होती हैं। एक तरह से देखें तो स्मृति सत्य की रितेदार ज़रूर है पर वे जुड़वाँ संतान तो कतई नहीं है। स्मृति के चमे से दूरस्थ समय की चीज़ें विशाल दिखती हैं। हम बहुत बातें भूलते भी हैं। बचपन के बारे में तो ज़रूर ही भूलते हैं। इसलिए बचपन के बारे में जो चाहे लिख दें, चलेगा। बचपन का कोई जीवाम नहीं होता। स्मृति तथ्य को धूमिल भी करती है।

स्मृति के धूमिल होने और लेखकीय हस्तक्षेप से प्रसंग के ाब्द बदल जाते हैं। ज़ाहिर है ऐसे में अर्थ भी प्रभावित होगा। इसका उदाहरण देखें -- प्रसिद्ध संस्मरण-लेखक काशीनाथ सिंह ने काशी के ही समाजवादी कार्यकर्त्ता देवव्रत मजूमदार की स्मृति में संस्मरण (उसे कथा रिपोर्ताज कहा गया है) लिखा है : लंका बांके चारि दुआरा काशी के बाज़ार लंका, जो विश्विद्यालय के छात्रों, अध्यापकों, साहित्यकारों, राजनीतिक कार्यकर्त्ताओं का अड्डा रहा है। बनारस हिंदू विश्विद्यालय के मुख्य द्वार से ज़रा आगे जाकर यह लंका है। यहीं का एक प्रसंग है।पहले काशीनाथ सिंह वाला पाठ देखिये : विद्यार्थी परिषद ने पर्चों और भाषणों में चंचल पर आरोप लगाया कि वह चरित्रहीन है, लड़कियों के सोता है। चंचल के भाषण का अंश -- ``आरोप एकदम सही है। मैं सोता हूँ लेकिन लड़कियों के साथ। विद्यार्थी परिषद वालों की तरह लड़कों के साथ नहीं। फ़ैसला आप करें कि चरित्रहीन कौन है?''

इस संस्मरण के प्रकाशन के बाद पूर्व छात्रनेता चंचल ने हंस' (पृष्ठ १६, जनवरी २००६) के अगले अंक में अपनी प्रतिक्रिया छपवायी। इसमें उन्होंने काशीनाथ सिंह की तारीफ़ ही की और अपना पाठ भी छपवा दिया। उस पाठ का संर्दाभत अंश ये रहा --
``मित्रों आप सब विश्विद्यालय के छात्र हैं। ज़ाहिर है कि जवान हैं। आप में से कोई एक हाथ उठाये और कहे कि वह किसी लड़की से दोस्ती करना नहीं चाहता... (पूरी भीड़ में सन्नाटा था) ... मैं बताता हूँ तीन तरह के लोग हैं जो किसी लड़की से कोई वास्ता नहीं रख सकते। एक `डेड बॉडी', दूसरा `इम्पोटेंट' तीसरे आर.एस.एस. ... आप हमें वोट दें या न दें, मैं उस संस्कृति का कभी भी हामी नहीं हो सकता जिसमें पुरुषों का पुरुषों से संबंध जायज़ माना जाता है (काशी भाई ने इसका हवाला दिया है)''
(हंस, पृ.४५, मार्च २००६)

अब इस दोनों पाठों का मिलान करें। काशीनाथ सिंह वाले पाठ में चंचल लड़कियों के साथ सोने की बात मंज़ूर करते हैं पर अपने वाले पाठ में ऐसी खुली स्वीकृति नहीं। दूसरे काशीनाथ सिंह का विद्यार्थी परिषद चंचल के यहाँ आर.एस.एस. हो जाता है। काशीनाथ सिंह के पाठ में भाषा खुली है जबकि चंचल संकेत से काम लेते हैं। इस तुलना से साफ़ है कि भले ही भाव एक हो, तथ्य और प्रस्तुति में अंतर आ ही जाता है। इसके लिए घटित और लिखित के अंतराल को दोष देना अधिक उचित होगा। और घटित और लिखित का यह अंतराल हमेशा रहेगा। इसीलिए संस्मरण को पूर्ण सत्य मानने के बजाए संदेह की गुंजाइश के साथ देखना चाहिए।

इच्छाएँ हमारे मन में बार-बार आवाजाही करती हैं। इच्छाएँ पूरी भी हो सकती हैं, अधूरी भी। अधूरी इच्छाओं को हम कल्पना से पूरा करते हैं। बेवजह दंड देनेवाले शिक्षक को पीटने की इच्छा एक दिन स्मृति में इस रूप में प्रकट हो सकती है कि आपने उस शिक्षक को पीट दिया था। स्मृति केवल सूचना नहीं है कि उसे शुद्ध रूप में फिर से हासिल कर लिया जाए। स्मृति हमारी सूचना को पहचानने की हमारी क्षमता भी धूमिल होती है। आप खोज रहे हैं कुछ मिला उसी से मिलता जुलता कुछ और। इसीलिए प्रख्यात इतालवी कलाकार सल्वाडोर डॉली ने झूठी स्मृति की बात स्वीकारी और सच्ची कथा तथा झूठी स्मृति के बीच अंतर करने का तरीका भी बताया : ``झूठी और सच्ची स्मृतियों में जवाहर जैसा ही अंतर होता है : नकली जवाहर ही ज्यादा असली और चमकदार लगते हैं।'' इसीलिए संस्मरण को संदेह से देखा जाना चाहिए, उसे संदेह से परे मानने की भूल तो कतई नहीं करनी चाहिए वरना हम अर्धसत्यों, अधूरी इच्छाआें से घिर जाएँगे।वह स्मृति आधारित है और `द लाईफ़ ऑफ़ रीजन' जैसी कृति के लेखक जॉर्ज सेंटायना के हवाले से कहें तो -- ``स्मृति अपने आपमें एक आंतरिक अफ़वाह है।'' यह आचर्यजनक नहीं है कि अनेक संस्मरण की
विश्सनीयता को लेकर विवाद पैदा होते रहे हैं।

संस्मरण सत्य का आभास कैसे उत्पन्न करते हैं? इसका उत्तर रचना-पद्धति से मिलता है। संस्मरण की प्रस्तुति कथात्मक ही होती है। लिहाज़ा उसमें कथानक, चरित्र, वातावरण, विवरण, संवाद, थीम और क्रम-विभाजन भी होते हैं। जैसे कथाकार काल्पनिक को इन्हीं उपकरणों के ज़रिए विश्वसनीय बनाता है। वैसे ही संस्मरण लेखक भी इन्हीं उपकरणों को आज़माता है और झूठी स्मृति को भी सत्य का विश्वसनीय बनाता है। वैसे ही संस्मरण लेखक भी इन्हीं उपकरणों को आज़माता है और झूठी स्मृति को भी सत्य का विश्वसनीय जामा पहना दे सकता है।

अगर कथेतर साहित्य को परिभाषित करना हो तो कहना पड़ेगा कि कथेतर साहित्य में किसी विषय को तथ्य के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यह प्रस्तुति सटीक है अथवा नहीं, तथ्य सत्य है या असत्य, यह सवाल हमेशा मुँह बाये खड़ा रहता है। फिर भी संस्मरण लेखक स्वयं द्वारा प्रस्तुत तथ्यों को सत्य ही मानता है। उसे सत्य के रूप में बहुधा धमाकेदार, पोलखोलू, सनसनीख़ेज़ खुलासे के रूप में प्रचारित भी किया जाता है।

कथेतर साहित्य में डायरी, जीवनी से लेकर यात्रा-वृत्तांत तक आते हैं। अब मान लें कि आप उत्तरांचल में अल्मोड़ा का यात्रा वृत्तांत लिखते हुए अल्मोड़ा तक किसी व्यावसायिक विमान सेवहाँ पहुँचने की बात लिख दें तो आपका झूठ फौरन पकड़ में आ जाएगा क्योंकि वहाँ के लिए कोई उड़ान उपलब्ध नहीं है। यात्रा वृत्तांत का मौलिक सत्यापन हो सकता है, जीवन के तथ्यों को दस्तावेज़ों से मिला सकते हैं पर संस्मरण के तथ्यों को कैसे जाँचेंगे? संस्मरण लेखक बहुधा अपनी डायरी, फ़ोटोग्राफ़ या अन्य स्मृति चिह्नों पर निर्भर होते हैं। जहाँ ये सब न हों तो वे पूर्णत: स्मृति पर निर्भर हो जाएँगे। स्मृति में कितना झाँका जा सकता है, इस पर चर्चा अन्यत्र हम करेंगे पर इतना तय है कि स्मृति वस्तुपरकता का निर्वाह नहीं कर सकती।

संचार माध्यमों में ख़बर तथ्य पर आधारित हों और तथ्य की प्रस्तुति में वस्तुपरकता का निर्वाह हो, यह आग्रह हम सब करते रहते हैं। ऐसा ही आग्रह काल्पनिक साहित्य से नहीं करते क्योंकि यह माना जाता है कि वह तथ्य आधारित नहीं, बल्कि काल्पनिक है। पर कथेतर साहित्य तथ्य आधारित होता है, उससे वस्तुपरकता का आग्रह करनाग़ैर-मुनासिब नहीं होगा। कथेतर साहित्य का उद्देय पाठकों तक सूचना पहुँचाना और पाठकों, लेखकों के विचारों और धारणाओं से सहमत करना होता इसलिए भी ज़रूरी है कि उसकी प्रस्तुति में संतुलन, सुसंगति और र्तााककता होनी चाहिए। कथेतर साहित्य में अपने समय का रोज़मर्रापन, व्यवहार, रुख और प्रवृत्ति झलकती है पर उसका आकर्षण काल्पनिक साहित्य जितना नहीं हो सकता, यही माना जाता रहा है। लेकिन तथ्य, संतुलन, सुसंगति, र्तााककता और वस्तुपरकता तो ाुष्क और अनाकर्षक होते हैं, फिर भी आत्मकथा और संस्मरण जैसे कथेतर विधाआें के प्रति पाठकों का आकर्षण इतना क्यों है, इस पर चर्चा अन्यत्र है।

बहरहाल, संस्मरण में वस्तुपरकता नहीं होती, इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। संस्मरणकार में लेखक, ``ख'' के बारे में लिखा -- `ख' में अपनी बेकारी के दिनों में नौकरी पाने के लिए बहुत खुशामद की थी तब दया कर उसकी नौकरी लगवा दी। यह प्रसंग पुस्तक में छुप गया तो लेखक ``ख'' को चोट पहुँची। `ख' के मुताबिक यह तथ्य ही ग़लत है। ख का कहना था, ``संस्मरण लेखक उन दिनों खुद बेकार था, मेरी नौकरी कैसे लगवाता? मैंने उसकी कोई खुशामद नहीं की।'' महाशय `ख' इस बाबत कोई बयान किसी पत्रिका में दे सकते हैं, पर कोई ज़रूरी नहीं कि संस्मरण का पाठक वह बयान पढ़े ही। पाठक तक सिऱ्फ संस्मरण-लेखक का ही पक्ष पहुँचेगा संस्मरण में र्वाणत लेखक का नहीं। पुस्तक में र्वाणत लेखक का भी पक्ष शामिल किया जाए, यह हो सकता है। पर इसे कौन करे और क्यों करें? यदि र्वाणत लेखक का पक्ष पुस्तक में शामिल हो जाए तो वस्तुपरकता आ जाएगी। पर ऐसा होता नहीं है। और मेरी जानकारी में किसी संस्मरण लेखक ने ऐसा किया भी नहीं है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि तथ्य पर आधारित होने (वैसे इसमें भी संदेह की गुंजाइश है)'' के बावजूद संस्मरण वस्तुपरक नहीं, आत्मपरक लेखन है। संस्मरण अधूरी विधा है। दुचित्तापन इसकी बनावट में ही अंर्तानहित है। ताज्जुब नहीं कि संस्मरण प्रथम पुरुष की टोन में लिखे जाते हैं।

हृदयेश की आत्मकथा के अंश इधर छपे हैं। वहाँ एक प्रयोग दिखता है कि वाचक तृतीय पुरुष है। यानी हृदयेश ही हृदयेश के बारे में लिखते हैं : हृदयेश ने ये किया, वो किया ... वाचक हृदयेश पर कटाक्ष भी करता है, उसकी पोल भी खोलता है। इस तरह विश्वनाथ त्रिपाठी की
पुस्तक नंगातलाई का गाँव का वाचक भी तृतीय पुरुष है। इसीलिए दोनों पुस्तकों को पाठकों ने विश्वसनीय माना। कहीं से संदेह की आवाज़ नहीं उठी। आत्मपरकता संदेह का बीज होती है। प्रथम पुरुष वाचक संदेह की पुष्टि कर देता है। संस्मरण लेखक इसीलिए संस्मरण को विश्वसनीय दिखाने का अतिरिक्त जतन करते दिखाई पड़ते हैं।

हिंदी में संस्मरण साहित्य का इतिहास बहुत छोटा है। इसलिए इस विधा को विश्व इतिहास पर नज़र डाल लेना सही रहेगा ताकि कुछ तो पूर्वपीठिका के रूप में हो जिसके बूते आगे विचार किया जा सके। संस्मरण को आत्मकथा की ही उपविधा माना जाता है।/ लिहाज़ा कुछ कॉमन पुस्तकें हैं जो आत्मकथा और संस्मरण दोनों की पूर्वज मानी जाती है। वैसे संस्मरण का पहला बीज ११वीं सदी के जापानी उपन्यास द टेल ऑफ़ गेंजी में भी मिलता है जो आत्मकथात्मक शैली में लिखा गया है। लेकिन वह अंतत: उपन्यास है।

संत ऑगस्टाइन ही आत्मकथा और संस्मरण के पूर्वज हैं। चौथी शताब्दी की उनकी कृति कन्फ़ेशंस में आत्मकथा तो है ही आत्मस्वीकृतियाँ भी हैं। संत बनने के पहले वे हमारी आपकी तरह दुनियावी इंसान थे। किशोर ऑगस्टाइन ने बाग़ से नाशपाती चुराया, औरत के साथ सोया, पवित्र बाइबिल और ईसा से चिढ़ता रहा। बाद में सुधर गया। फिर आत्म स्वीकृतियाँ लिखीं। वे ईश्वर को संबोधित हैं। यह बहुत लोकप्रिय पुस्तक रही है। सो कई सदियों तक पढ़े लिखे लोग संस्मरण लिखने का साहस ही जुटा नहीं पाए। माफ़ीनामा कौन लिखे।

सोलहवीं सत्रहवीं सदी में सूरत बदली। १५९५ में मोंटेन की पुस्तक एसेज़ आई। गणितज्ञ पास्कल पेंसीज़ १६५८ में प्रकाशित हुई। आचर्यजनक रूप से इन दोनों कृतियों में आत्म स्वीकृति जैसी चीज़ नहीं थी। १७८२ में प्रकाशित रूसो की प्रसिद्ध कृति कन्फ़ेशंस के आते आते संस्मरण ने सहज आख्यान का रूप ले लिया था। कथानक का ``प्रारंभ से लेकर अंत'' वाला ढाँचा ख़त्म हो गया था। अमरीकी हस्ती बेंजामिन की आत्मकथा (१७९२ में प्रकाशित) में संस्मरण के टोन में एक और चीज़ जुड़ी -- हास्य। लेकिन संस्मरणों में ईश्वर का दबदबा बना रहा। भला हो नीते का जिसने अपनी आत्मकथा (व्हाट वन बिकम्स व्हाट वन इज़) का ज़रिये इस विधा को ईश्वर से आज़ाद करा दिया।

संस्मरण इतनी तरल विधा है कि अपने बारे में लिखो तो आत्मकथा लगे, दूसरों के बारे में लिखो तो रेखाचित्र या निबंध दिखे और जगहों, यात्राओं के बारे में लिखा जाए तो यात्रा-वृत्तांत। हिंदी में संस्मरण शुंरू से ही लिखे जाते रहे पर वे संकलित न हो सके। प्रारंभ के संस्मरण-लेखकों में पद्मसिंह शर्मा है जिनकी पुस्तक पद्म राग १९२९ में प्रकाशित हुई थी। जनार्दन प्रसाद द्विज का चरित्र रेखा १९४३ का       प्रकाशन है। इस दौर की उल्लेखनीय संस्मरण रचना है शांतिप्रिय द्विवेदी की पथ चिह्न। इसका प्रकाशन १९४६ में हुआ था। १९४४ में प्रकाशित शिवरानी देवी की पुस्तक प्रेमचंद घर में का महत्त्व भी साहित्य संसार जानता है। १९४६ में प्रकाशित् भदंत आनंद वात्स्यायन की कृति जो भूल न सका भी उल्लेखनीय है। महादेवी वर्मा की दो अत्यंत मूल्यवान कृतियाँ स्मृति की रेखाएँ १९४३ और अतीत के चलचित्र १९४१ ने संस्मरण को प्रतिष्ठा दी। मेरा परिवार और पथ के साथी भी उनकी संस्मरण पुस्तकें हैं। आज़ादी के बाद ज़रूर इस विधा में गति आई। बनारसीदास चतुर्वेदी और रेखाचित्र दोनों १९५२ के प्रकाशन) के माध्यम से और कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर -- भूले हुए चेहरे तथा दीप जले, शंख बजे -- के ज़रिये प्रमुख संस्मरण लेखक के रूप में उभरे। उपेंद्रनाथ अक की बेजोड़ संस्मरण कृति मंटो मेरा दुमन १९५० में प्रकाशित हुई थी और इसकी धूम भी खूब रही। यशपाल के सिंहावलोकन के पहले खंड का प्रकाशन भी बीसवीं सदी के छठे दशक के प्रारंभ यानी १९५१ में हुआ था। यूँ तो स्वाधीनता सैनानियों/क्रांतिकारियों के बारे में संस्मरण पुस्तक क्रांतियुग के संस्मरण मन्मथनाथ गुप्त १९३७ में ही लिख चुके थे पर जो महत्त्व और लोकप्रियता शिकार कथाओं के मशहूर लेखक/पत्रकार श्रीराम शर्मा की पुस्तक सन बयालीस के संस्मरण को मिली, वह आज भी संस्मरणकारों के लिए स्वप्न है। श्रीराम शर्मा की  शिकारसंबंधी संस्मरण पुस्तक शिकार १९३२ में प्रकाशित होकर धूम मचा चुकी थी। यहाँ गांधी जी पर लिखा घनयामदास बिड़ला की संस्मरण पुस्तक बापू (१९४०) का उल्लेख करना भी समीचीन होगा। रामनरेश त्रिपाठी की पुस्तक तीस दिन : मालवीय जी के साथ का प्रकाशन वर्ष १९४२ का है।
संस्मरण लिखने वालों में मोहनलाल महतों वियोगी, विष्णु प्रभाकर और प्रभाकर माचवे भी रहे हैं। लेकिन छठे दाक से आठवें दाक तक संस्मरण क्षेत्र प्राय: वीरान रहा। वैसे जगदीशचंद्र माथुर की लेखकों पर लिखे संस्मरण दस तस्वीरें या अज्ञेय की पुस्तक स्मृति लेखा (इसमें भी लेखकों के ही संस्मरण हैं) इसके अपवाद थे।

इन संस्मरणों को खंगालने से साफ़ हो जाता है कि संस्मरण के केंद्र में विशिष्ट ही रहे चाहे वे लेखक हों या राजनेता। तीन ऐसी पुस्तकें हैं जो मामूली लोगों के बारे में हैं। कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर, श्रीराम शर्मा और रामवृक्ष बेनीपुरी ने आम लोगों के बारे में लिखा और संयोग से ये तीनों पत्रकार थे। ये आम लोगों का महत्व समझ रहे थे जबकि शुद्ध साहित्यिक संस्मरण लेखक विशिष्ट को ही संस्मरण के योग्य मानते थे।

यूँ काशी पर अनूठी कृति बहती गंगा के लेखक रुद्र का शिकार ने संस्मरण को मरण से जोड़ दिया। मृतकों पर ही संस्मरण क्यों लिखे जाते हैं? जीवितों पर संस्मरण लिखना साहस का काम है। जीवितों पर संस्मरण लेखन प्राय: स्तुति से लबालब रहता है पर अज्ञेय, कमलेश्वर, काशीनाथ सिंह, राजेंद्र यादव, कांतिकुमार जैन साहसी संस्मरण लेखकों में गिने जाएँगे। इन सबों ने जीवित विशिष्ट जनों पर लिखा। खंडन-मंडन, प्रतिशोध और वैर झेला पर झमेले से बच निकलने की कलाबाज़ी नहीं दिखलायी। कांतिकुमार जैन जहाँ विशिष्टों पर कलम चलाते हैं वही काशीनाथ सिंह विशिष्टों के साथ-साथ वाराणसी के सामान्य जनों पर भी। यहाँ हरिशंकर परसाई को याद करने का उचित अवसर है। परसाई की संस्मरण पुस्तक में मामूली लोग भरे पड़े हैं। परसाई साधारण में असाधारण ढूँढ़ते हैं और क्या ख़ूब ढूँढ़ते हैं।

बहुधा संस्मरण काल्पनिक कथा साहित्य के ढाँचे का अनुपालन करते लिखे जाते हैं जबकि संस्मरण काल्पनिक साहित्य नहीं हैं। संस्मरण लेखकों द्वारा कथात्मक ढाँचे का संस्मरण लिखने वालों में मोहनलाल महतों वियोगी, विष्णु प्रभाकर और प्रभाकर माचवे भी रहे हैं। लेकिन छठे दाक से आठवें दाक तक संस्मरण क्षेत्र प्राय: वीरान रहा। वैसे जगदीशचंद्र माथुर की लेखकों पर लिखे संस्मरण दस तस्वीरें या अज्ञेय की पुस्तक स्मृति लेखा (इसमें भी लेखकों के ही संस्मरण हैं) इसके अपवाद थे।


व्यक्तियों की सीमाएँ होती हैं। उनकी अपनी अच्छाइयाँ भी होती हैं। इसी के योग से व्यक्ति के प्रति पाठक का रवैया तय होता है। मान लीजिए कि एक व्यक्ति दरिद्र है फिर भी मेहमानवाज़ी सहज भाव से करता है। मेहमान के समक्ष दिखावा नहीं करता। ऐसे व्यक्ति से पाठकों को सहानुभूति होती है पर यदि संस्मरण-लेखक उसका उपहार करे तो यह उपहास का टोन संस्मरण-लेखक के विरुद्ध ही जाएगा। उपहास की भाषा-शैली भी अलग होगी और रूप-ौली तो अलग होगी ही। इसलिए टोन से संस्मरण लेखक का व्यक्तित्व भी खुलता है। वस्तुत: संस्मरण का परिप्रेक्ष्य संस्मरण-लेखक ही होता है और उस तक उसके स्वर के ज़रिये ही पहुँचा जा सकता है। संस्मरण यदि टेक्स्ट है तो संस्मरण-लेखक कंटेक्स्ट है।

संस्मरण में तथ्य और सूचनाओं के उचित प्रतिपादन का कारक भी महत्त्वपूर्ण होता है। अधूरे असत्य तथ्य संस्मरण को अविश्वसनीय ही नहीं बनाते बल्कि संस्मरण लेखक को विवाद, मुकदमा, मानहानि, जुर्माना, जेल तक से रूबरू करा सकते हैं। जब किसी से बदला लेना होता है तो साहसी लेखक संस्मरण लिखता है। पर कायर और चालाक लेखक अपने वैरी पर कहानी लिख डालता है क्योंकि उसे पता है संस्मरण के तथ्यों को अदालत में चुनौती दी जा सकती है, कहानी को नहीं क्योंकि वह काल्पनिक साहित्य है। संस्मरण प्रमाण आधारित होता है।

हर संस्मरण में अनुभव कथाएँ भी होती हैं। अनुभव कथाओं का सजीव चित्रण कर संस्मरण लेखक पाठक का उसी अनुभव बोध से गुज़ारना चाहता है। यह अनुभव चित्रण जितनी खाँटी, जितना अनगढ़ होता है, उतना ही मौलिक और अनूठा लगता है। अनुभव हर किसी के पास होता है, लेकिन अनूठापन सब का अलग-अलग होता है। प्रथम चुंबन का अनुभव असंख्य बार वि ा संस्मरण साहित्य में आया है पर वह हर बार अनूठा लगता है क्योंकि वर्जन की तीव्रता, संलग्नता और भावना हर व्यक्ति की अलग अलग होती है। वस्तुत: अनुभव वर्णन ही संस्मरण की जान होते हैं। हर पाठक उस अनुभव से साझा करना चाहता है। अनुभव कथाओं का वर्णन उतना ही प्रभावी होगा जितना संस्मरण लेखक में लेखन की कला होगी। बहुधा ऐसे वर्णनों में संस्मरण लेखक साहित्य की ारण लेता है। ताकि वर्णन को प्रभावी और कलात्मक बना सके।

हिंदी के संस्मरण में विवरण प्राय: उपेक्षित क्षेत्र रहा है। विवरण में संस्मरण लेखकको सजीवता के कारकों, रूप, ध्वनी, गंध, स्वाद, र्स्पा को संतुष्ट ध्यान रखना पड़ता है। यही स्थिति बुनियादी भावों -- भाव, पीड़ा, उदासी और उल्लास के साथ दीखती है। लेकिन विवरण कौशल का अभाव को दरकिनार करके देखें तो विश्वनाथ त्रिपाठी का संस्मरण (इसे वे स्मृति आख्यान कहते हैं) नंगातलाई का गाँव बहुत अच्छा उदाहरण है। बिसनाथ को अपने पिता के पसीने से भीगे
कुर्ते और माँ के शरीर से आती दूध की गंध बहुत अच्छी लगती है। वस्तुत: विवरण में यह गुण लाने के लिए आवयक है कि लेखक स्मृति के रेशे रेशे खोले, स्मृति से सरसरी तौर पर गुज़रने से यह बारीकी नहीं आनेवाली।

संस्मरण स्मृति आधारित है। लेकिन वह सिर्फ स्मृति नहीं है। संस्मरण की मजबूरी है कि वह है तो अतीत पर, लिखी जाती है वर्तमान में। इस बीच लेखक के सोच, रुझान, परिप्रेक्ष्य, विलेषण क्षमता, जीवनानुभव, प्राथमिकता सबमें तब्दीली आ चुकी होती है। बचपन में पेंसिल चुराने की एक घटना तब बचपना लगी होगी। शायद सहज भी। पर पचास वर्ष बाद (हिंदी के अधिकांश संस्मरण-लेखक पचास पार के होते हैं) वही घटना लेखक को महत्त्वपूर्ण लग सकती है। उसे अपने उस कृत्य पर पछतावा हो सकता है, वह अपनी भर्त्सना भी कर सकता है। जो घटना छोटी थी, मामूली थी वही महत्त्व प्राप्त कर सकती है। संस्मरण-लेखक का यह आत्मिक चिंतन संस्मरण का आख़िरी महत्त्वपूर्ण कारक है। आत्म चिंतन लेखक को अपना नज़रिया अपनाने में सहायक होता है। अखिलेा का संस्मरण वह जो यथार्थ था में यह आत्मिक चिंतन बहुत मज़बूती से उभरा है। संस्मरण में अतीत और वर्तमान के बीच संतरण और आवाजाही का माध्यम संस्मरण-लेखक ही होता है। यदि यह आवाजाही र्निावघ्न या सहज नहीं होती है तो संस्मरण वैसे ही फट जा सकता है जैसे एक बूँद सिरके से एक लीटर दूध फट जाता है।

स्मृति प्रकृति का एक ऐसा वरदान है जिसके सहारे आप असंभव अतीत को संभव वर्तमान बना सकते हैं। जब आप भूखे हों तो अतीत खाये छप्पन भोग को याद कर तृप्ति का एहसास कर सकते हैं। कुछ लोग स्मृति में कल्पना को भी जोड़ देते हैं। फिर क्या है? चमत्कार होने लगता है। स्मृति सिऱ्फ स्मरण का परिणाम होती तो वह गणित के सूत्रों की तरह याद आती। स्मृति में स्मरण और हार्दिकता दोनों का मेल है। कुछ संस्मरण-लेखक उदात्तता को आसंग बनाते हैं और पाठकों का दिल जीत लेते हैं। इधर कड़वे, वैर साधक संस्मरण लिखने का चलन शुरू हुआ है। जिसके जीवित रहते खाँसी न निकली उसके मरते ही संस्मरण लिखकर लेखक अपना विरेचन करने लगे हैं। ऐसे संस्मरणों में भाषा माध्यम के बजाय चाकू बन जाती है। लेखक यह भूल जाता है कि किसी के बारे में न्याय के भाषा में निर्णय सुनाने का अधिकार उसे नहीं है क्योंकि संस्मरण में स्मृत का पक्ष शामिल नहीं है।

पहले संस्मरण से संबंधित एक युग्म प्रचलित था ''प्रेरक प्रसंग''। संस्मरण को प्रेरक होना ही चाहिए, ऐसा मानते रहे होंगे। अब संस्मरण का प्रेरक हुआ तो पिछड़ा माना जाएगा जिसको पढ़कर मुँह का ज़ायका जितना बिगड़े, कुछ संपादक उसे उतना ही नया और अच्छा संस्मरण मानते हैं, उसे छापते हैं, विज्ञापित करते हैं। संस्मरण में अनूठे व्यक्तियों, स्थितियों के बारे में लिखने का भी एक निचित उद्देश्य होना चाहिए, यह नहीं कि वैसा व्यक्ति या स्थिति है, सो लिख दिया। लेखक यह न सोचे कि जीवन सेतु उसी ने जिया है। हर पाठक जीवन के अनुभवों से लबरेज़ होता है। वह भी संस्मरण लेखन की लोक-कला में पारंगत होता है। इसलिए घिसी पिटी स्थिति, रोज़मर्रापन और विशेषताहीन व्यक्तियों के बारे में महज़ वैर या अतिरेकी प्रांसा से लदा-फदा संस्मरण लिख कर संस्मरण-लेखक पाठक को भरमा लेगा। साधारण को अनूठा बनाकर पेश करने का हुनर संस्मरण पर क्या छाप छोड़ेगा? जिसके जीवन से पाठक का मन आलोकित न हो, उसे लिखने का क्या अर्थ है? संस्मरण लेखक के बुढ़ापे की लाठी नहीं। यदि कोई संस्मरण लेखक ऐसा करता है तो उसे फ़ैज़ का यह शे'र याद करा देना चाहिए :

हम इक उम्र से वाकिफ़ हैं, अब न समझाओ
कि लुत्फ़ क्या है मेरे मेहरबां, सितम क्या है!




-- अरुण प्रकाश
संपादक, समकालीन साहित्य
 

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