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होली पर कुछ छींटे उस रोज अजातशत्रु जी से फोन मिलाया तो उधर से उनकी पत्नी की आवाज थी- हैलो! -अजातशत्रु जी घर पर हैं क्या? हमने पूछा. -क्या कहा? -हमने कहा - अजातशत्रु जी घर पर हैं क्या? -आपकी बात समझ में नहीं आ रही. -हमने कहा - आपके शत्रुजी घर पर हैं क्या? -हां हैं! अभी बुलाय देती हूं. 00000000000000000000 कृष्णकिशोर जी को हमने लिखा था- आपकी पत्रिका के लिए एक कहानी 'चूहेदानी' लिखी है.इसमें आज की व्यवस्था पर करारा व्यंग्य है.मुझे आशा है कहानी आपको पसन्द आएगी. जवाब आया- आपकी चूहेदानी मिली.हम इसे उपयोग में ला रहे हैं.कुछ चूहेदानियां और भिजवाइयेगा.
कथाबिंब से अरविंद जी का पत्र आया था.लिखा था- हम अपनी पत्रिका का विशेषांक निकालने जा रहे हैं.आपकी एक पूर्वचर्चित रचना 'वनवास' का पुनः उपयोग करना चाहते हैं.कृपया अनुमति भेजें. हमने लिखा- आप वनवास ले रहे हैं यह जान कर अच्छा लगा.यदि मुझसे बिना अनुमति के भी ले लेते तो मैं आपत्ति न करता.
हंस में अपनी कहानी भेजते हुए हमने सन्लग्न पत्र रखा- प्रिय सम्पादक जी अपनी नवीनतम रचना बिल्ली भेज रहा हूं.आदमी की मनःस्थिति का कितना स्वाभाविक चित्रण हमने इसमें किया है देखिए तो. यादव जी का पत्र आया- आपकी बिल्ली मिली.हमें खेद है कि हम इसका उपयोग नहीं कर पा रहे.आप इसे अन्यत्र उपयोग में ला सकें इसलिए हम इसे लौटा रहे हैं.यह मत सोचिएगा कि आपकी बिल्ली आपको ही म्याऊं.भविष्य में कुछ और भी भेजते रहिएगा.
डा.श्याम सखा जी को हमने लिखा था- आपकी पत्रिका 'मसि कागद' के लिए अपनी एक ताजा रचना 'लाश' भेज रहा हूं.कृपया निर्णय से अवगत कराएं. उत्तर आया- आपकी लाश मिली.बहुत पसन्द आई. हम इसे उपयोग में ला रहे हैं.सहयोग के लिए धन्यवाद.
विकेश निझावन
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