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नई कविताएँ
प्रेम-संगिनी -
डॉ शालिनी यादव

करती रही
इन्तजार
-सदानन्द शाही 
नेका के
किनारे : कुछ विचार
-सदानन्द शाही

मुझे
मालूम है - मधुप मोहता 
दुख
- अवनीश गौतम
वो और वो
- अवनीश गौतम
आपके जैसा
- अवनीश गौतम
मैं, तू और
सदियां -
अवनीश गौतम
छाता
- अवनीश गौतम
औरत
- अनुपमा तिवाड़ी
मलाला
- अनुपमा तिवाड़ी
मेरे पास की
औरतें
- अनुपमा तिवाड़ी
वैश्या
- अनुपमा तिवाड़ी
पिघल
रही है
बर्फ़
- दीपक मशाल
मैं नदी
हूँ
- अनुपमा तिवाड़ी
सपना
बुनती औरत
- अनुपमा तिवाड़ी
स्त्रियाँ कभी बूढी नहीं होती - अनुपमा तिवाड़ी
सियासत
-दिनेश कुमार
देस - परदेस
नमकीन रेगिस्तान में रंगीन शमों का डांडिया - अलका कौशिक

भारत के जिस छोर
पर जाकर सूरज दिनभर की थकान के बाद अपने बिस्तर पर लेटने की तैयारी
करता है, वहां दूर-दूर तक नमक का रेगिस्तान पसरा है और रोशनी के
प्रदूषणसे मुक्त होते ही वहां एक ऐसी नगरी उभरने लगती है जिसकी कल्पना
करना मुमकिन नहीं है। जंगल में मंगल की कहावत को गुजरात में कच्छ के इस
रेगिस्तान में नया नाम मिल गया है।
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एक कविता के
बनने की कहानी सा कुछ - रविकांत

टेसू राजा जब अड़ जाएं तो अच्छे अच्छो के नाक
में दम कर दें, फिर उनके सामने किसी ऐरे गैरे की तो बिसात ही क्या । आपने
अगर ''ब्लु अंब्रेला'' फिल्म देखी हो तो आपको याद होगा कि उसमें
बच्चों
की टोली के साथ टेसू गांव के हर घर व हर प्रमुख व्यक्ति के सामने अड़ जाता
है और उनसे खाने के लिए दही बड़ा यानी कुछ न कुछ मांगता है।
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छोटी व्यंग्य रचनाएं
एक कहानी-
मुकेश नेमा

ल तियाना
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मुकेश नेमा
मिजाज़ और
आप
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मुकेश नेमा
पद्म की
आकांक्षा
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मुकेश नेमा
लौकियाँ
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मुकेश नेमा

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कहानियाँ
अंतिम पड़ाव
-हरियश राय
पूरे वृंदावन में बादलों का एक भी टुकड़ा न था। सोना घोष अपनी झकी हुई कमर
के साथ सूरज की तेज़ धूप में चली जा रही थी, भजनाश्रम की ओर, रुकते-बैठते,
धीरे-धीरे चलते। वह घड़ी भर के लिए किसी पेड़ की छाँह में साँस लेने बैठ जाती,
तो उसके मन में आवाज़ें उठतीं, ‘हे राधे, ये कौना-सा दिन दिखाया तूने। अभी और
कितना और कब तक चलना है इस काया के लिए?’
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लापता पीली
तितली - मनीषा कुलश्रेष्ठ

एक पीली तितली लापता हुई थी।
ये उसके जीवन के उन दिनों की बात है, जब मौसम, वक्त और उमर की गिनती तक नहीं
पता होती थी। हर दिन एक उत्सुक रोशनी लिए उगता था। सूरज बतियाता, चाँद
कहानियाँ सुनाता. जब वह पाठशाला तक नहीं जाती थी तो हर दिन उसके लिए एक
पाठशाला होता था।
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गिल्टी मिथ
-प्रेमचंद गांधी
नींद के साथ उसका बदन भी टूटता जा रहा था। आंखें खोलकर देखा तो खिड़की में
तेज़ धूप का उजाला था। वह बिस्तर पर ही लेटा रहा। फिर से आंखें बंद कर लीं और
सिलसिलेवार ढंग से याद करने की कोशिश करने लगा कि वह इस अजनबी कमरे में कैसे
और कब पहुंचा?
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अमरीखान के
लमडे - प्रज्ञा
एक ढोलो दूजी
मरवण ...तीजो कसूमल रंग
- मनीषा कुलश्रेष्ठ
….उसका क़सूर क्या था?… -मधु अरोड़ा
नगरकीर्तन - विजय शर्मा
तारे -
अनुपमा तिवाड़ी
बदजात
-कंचन सिंह चौहान
लंबी कहानी
अंधेरों
से आती आवाज़ें
:
प्रेमचंद गांधी
भाग - 1
भाग -2
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