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कविताएं
फगुनाहट 
- श्यामल सुमन
बुद्धम शरणं गच्छामि...........- दीपक शर्मा
कवितायें - डॉ.मनीष मिश्रा
डायरी के फाड़ दिए गए पन्नों में भी

साँस ले रही होती हैं अधबनी कवितायें
फड़फड़ाते हैं कई शब्द और उपमायें!
विस्मृत नहीं हो पाती सारी स्मृतियाँ
सूख नहीं पाते सारे जलाशय
शब्दों और प्रेम के बावजूद
बन नहीं पाती सारी कवितायें! - आगे पढे
किताबें -
डॉ.मनीष मिश्रा
सब कुछ नहीं होता समाप्त - डॉ.मनीष मिश्रा
उम्र के चालीसवें वसंत में - डॉ.मनीष मिश्रा
तुम - डॉ.मनीष मिश्रा

दृष्टिकोण

साहित्य में आशावादी संकेत - स्वयं प्रकाश
चाय की चाह - डॉ.वीरेद्र अग्रवाल
बाजार की मार  से बेजार किताबें - संजय द्विवेदी

पुस्तक अंश

वन नाइट एट कॉल सेंटर
फाइव पॉइंट समवन

नये ब्लाग
फिलहाल -
बोलो जी - मनीषा कुलश्रेष्ठ

लघु उपन्यास
पहचान - अनवर सुहैल
उन नवयुवकों को
जो ज़िन्दगी में
अपने दम
कुछ बनना चाहते हैं
और किसी संस्था का
नहीं बनना चाहते
'भोंपू'
या कोई 'टूल्स'....
- आगे पढें

कहानियां

दुक्खम् शरणम गच्छामि! - धीरेन्द्र अस्थाना
अंधेरा पूरा था और सन्नाटा संगदिल। उस विशाल कैफे के ठंडे हॉल में मेरे कदम इस तरह पड़े जैसे आश्चर्य लोक में एलिस। हॉल सिरे से खाली था और मैं निपट अकेला। उढ़के हुए शानदार दरवाजे को खोल कर भीतर आने पर सबसे पहला सामना काउंटर के ऊपर वाली दीवार पर टंगी घड़ी से हुआ। सुबह के चार बजकर बीस मिनट हो रहे थे। घड़ी के ठीक ऊपर एक मर्करी बल्ब जल रहा था, सिर्फ घड़ी के लिए।
- आगे पढें

दुःख अपरिमित - दिनेश कुमार माली
(मूल कहानी उङिया में लेखिका - सरोजिनी साहू)   अगर सोनाली ने उस दिन मेरे हाथ से वह कलम नहीं छीनी होती ,तो वह कभी भी नीचे नहीं गिरी होती . उस कलम को स्कूल साथ ले जाने के लिए मेरी माँ ने मुझे कई बार मना किया था. पर कलम थी ही उतनी सुंदर , आकर्षक व उतनी ही अजीबो-गरीब किस्म की, कि मुझे अपने आप ही उसे अपने दोस्तों को दिखलाने कि इच्छा हो जाती थी. मैं हर दिन उस कलम के साथ थोडा बहुत खेलती थी. फिर खेलने के बाद उसे अलमीरा में छुपा कर रख देती थी. वह एक विदेशी कलम थी, जिसे मेरी आंटी ने मुझे उपहार में दिया था. माँ कहती थी, " बहुत ही कीमती है यह कलम. सम्हाल कर रखना ".लिखते समय कलम से रोशनी निकलती थी. - आगे पढें

ब्लू टरबन - मनमोहन भाटिया
एक का चार... एक का चार...  अनूप मणि त्रिपाठी

याञा वृत्तांत
सतपुड़ा के भीतर से -गोविन्द मिश्
 

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लेख
बोल री कठपुतली डोरी कौन संग बांधी  - शिरीष खरे

व्यंग्य
एक शाम की बर्थ डे पार्टी का आमंत्रण - डाँ वीरेन्द्र सिंह यादव
आई पी एल बनाम चुनाव -पंकज प्रसून
हाल-ए- दिल  -पंकज प्रसून
एक्सपर्ट निंदक  -पंकज प्रसून
हिट कवि बनने के नुस्खे
-पंकज प्रसून

निबंध
विजय तेन्दुलकर का ‘होना’ आज उनके ‘न होने’ से बहुत बडा है... -सत्यदेव त्रिपाठी

 

  • कैंसर कोशिकाओं से बेहतर ढंग से निपटेगा नया जीन
  • फंफूद संक्रमदृणों के इलाज के लिए प्रभावी दवा का आविष्कार
  • स्टेम कोशिका खुद को नया रूप देने में सक्षम
  • 'टूटे' दिल को जोड़ने के करीब पहुंचे वैज्ञानिक
  • मुंहासों से छुटकारा चाहिए, तो करें चाकलेट से तौबा!
  • कैंसर और ह्रदय संबंधी रोगों से बचने के लिए हंसना है जरूरी
  • दिल का आकार बिगाड़ सकता है सिगरेट का धुआं
  • जर्मनी में एड्स के मरीज का सफल इलाज

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