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कविताएं
आतंकवाद पर रूह से निकली कुछ बेआवाज आहें
कुछ बेवा आवाजें अक्सर,
मस्जिद
के पिछवाडे आकर..
ईटों की
दीवार
से लगकर,
पथराए
कानो पे,
अपने होठ
लगाकर,
इक बूढे
अल्लाह का मातम करती
हैं,
जो अपने
आदम की सारी नस्लें उनकी कोख में रखकर,
खामोशी
की कब्र में जा
कर लेट गया है-
-गुलज़ार
आज़ादी का त्योहार- महेंद्र भटनागर
अधिकारों
के
नाम
पर-
रुचि
चंद्रा
पप्पू पास हो गया
-प्रदीप
मानोरिया
काश ऐसा होता - सुशील कुमार पटियाल
खुला सा
आसमान हो - सुशील कुमार पटियाल
कब होंगे
आजाद हम -सुशील कुमार पटियाल
वक्त कभी
तो.......... -सुशील कुमार पटियाल
गजलें
फिर ज़रूरत है वतन को इन्कलाब
चाहिए - अखिलेश
सोनी
आंधी में
दीपक बुझे होंगे -
प्राण शर्मा
बादल इक जैसा ही बरसा करते हैं - प्राण
शर्मा
निबंध
विजय तेन्दुलकर
का ‘होना’ आज उनके ‘न होने’ से बहुत बडा है...
-सत्यदेव
त्रिपाठी
दृष्टिकोण
बाजार की मार
से
बेजार किताबें
- संजय
द्विवेदी
साहित्यकोष
पुस्तक समीक्षा
शैलेंद्र
चौहान की कविता प्रचलित मानदंडों
के विरोध में खड़ी है
- सूरज पालीवाल
फीचर
जारी है हिन्दी की सहजता को
नष्ट करने की साजिश
-आईएएनएस
मनोरंजन की दुनिया

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