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अंक की लम्बी कहानी

माटिल्डा की वह शाम - सुमन केशरी

प्रभा क्लास से बाहर निकली तो सामने सौरभ खड़ा था,बेचैन सा ।
वह उसके पास पहुँची, "हलो सौरभ क्या हुआ …..कुछ...."
सौरभ ने तुरन्त उसका हाथ थामा और एक कोने में ले जाकर फुसफुसाया,
"मिशेल के स्टैपफादर की डैथ हो गयी है,उसके घर जा रहा हूँ चलोगी?"  - आगे पढें
 
 

फेसबुक पर इस माह के चर्चित ब्लाग
पढ़ते - पढ़ते - मनोज पटेल
आपका साथ साथ फूलों का - अपर्णा मनोज
प्रतिभा की दुनिया - प्रतिभा कटियार

Antheia -
कनुप्रिया

Manisha Kulshreshtha

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वन्दना शर्मा की कविताएँ
स्त्री - अस्मिता की नई - अनूठी पहचान लिए, अपने लिए किसी विमर्श की माँग करने की जगह खुद अपने समय - समाज से बहस करती ये साफगो कविताएँ न केवल स्त्री रचनात्मकता के वर्तमान परिदृश्य का तेवर बदल डालती है, बल्कि एकदम नए मुहावरे की इज़ाद के साथ आती हैं वन्दना शर्मा की ये कविताएँ..

हम हैं संक्रमण काल की औरतें

धत्त्त ....

तुम्हारे प्रेम में हूँ...ये कुछ सबूत मुझको मिले हैं

गर्म तवे पर जल की बूँद सी ये औरतें ....

और अब हम विरोध के लिए सन्नद्ध हैं

हे सत्तासीन स्त्रियों

मैं इसे यूँ सुनूँगी

कहानियां
कागभाखा - एस. आर. हरनोट
कौआ जानता है, दादी कब उठती है। वह रोज सुबह आंगन के उस पार बीऊल के पेड पर आकर बैठा रहता। दादी बाहर निकलती तो उसके हाथ में रात के बचे रोटियों के टुकडे होते।वह उन्हें हथेलियों के बीच बारीक मसलती और आंगन में एक ओर पत्थर पर रख देती। जैसे ही वह भीतर आती, कौआ उडक़र उन्हें निगल जाता। फिर काफी देर पेड पर बैठा रहता चुपचाप।  --आगे पढें

अपत्नी - ममता कालिया
म लोग अपने जूते समुद्र तट पर ही मैले कर चुके थे। जहाँ ऊंची - ऊंची सूखी रेत थी, उसमें चले थे और अब हरीश के जूतों की पॉलिश व मेरे पंजों पर लगी क्यूटेक्स धुंधली हो गयी थी मेरी साडी क़ी परतें भी इधर उधर हो गयीं थींमैं ने हरीश से कहा, '' उन लोगों के घर फिर कभी चलेंगे''  
''
हम कह चुके थे लेकिन! ''
''
मैं ने आज भी वही साडी पहनी हुई है। ''
मैं ने बहाना बनाया।

क दिन का मेहमान - निर्मल वर्मा

उसने अपना सूटकेस दरवाजे के आगे रख दिया। घंटी का बटन दबाया और प्रतीक्षा करने लगा। मकान चुप था। कोई हलचल नहीं - एक क्षण के लिये भ्रम हुआ कि घर में कोई नहीं है और वह खाली मकान के आगे खडा है। उसने रुमाल निकाल कर पसीना पौंछा, अपना एयर बैग सूटकेस पर रख दिया। दोबारा बटन दबाया और दरवाजे से कान सटा कर सुनने लगा, बरामदे के पीछे कोई खुली खिडक़ी हवा में हिचकोले खा रही थी।  - आगे पढें

साक्षात्कार
रोमानिया में हिन्दी
- संजय कुमार

बाज़ार में ज़िंदा रहने की कोशिश कर रहा हूँ - महेश भट्ट


प्रेम की कविताएं  - डॉ.शशि पठानिया
चौथा पहर
चाँदनी रात

तेरी सूरत

लेख
हम इक उम्र से वाकिफ़ हैं -- अरुण प्रकाश
संस्मरण पर विशेष लेख

साहित्य कोष

इस्मत आपा की कहानियाँ और भारतीय मुस्लिम समाज

 

English Section

Poetry - Nand Chaturvedi
Translated by
Dr Ashutosh Mohan

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THE CALLOUS MOMENT OF CARNIVAL

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THE FORT 

LUMINOUS PEAKS


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