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हर्फे ताज़ा नई खुश्बू में लिखा चाहता है बाग एक और मुहब्बत का खुला चाहता है - परवीन शाकिर

परवीन शाकिर की ग़ज़लें
कुछ तो हवा भी सर्द थी, कुछ था तेरा ख्याल भी
पाबागिल सब हैं

अहले किताब ने मगर क्या तेरा हाल कर दिया
मौसमे बहार मेरे गुलसितां में है
 
कविताएँ
जैसलमेर - सेमंत हरीश
मैं आज अपने गाँव लौट जाऊँगा - सेमंत हरीश

फेसबुक पर इस माह के चर्चित ब्लाग
पढ़ते - पढ़ते - मनोज पटेल
समालोचन -
अरुण देव
जानकी पुल - प्रभात रंजन
आपका साथ साथ फूलों का -
अपर्णा मनोज
प्रतिभा की दुनिया - प्रतिभा कटियार

Antheia -
कनुप्रिया

Manisha Kulshreshtha

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कहानियां
विजेता - सुषमा मुनीन्द्र
कभी-कभी यह होता है, जो कुछ अनुभव में घटित हो रहा है वह नामालूम तरीके से एक रूटीन के तहत गुजर जाता है और बाद में वह गुजरा हुआ बार-बार हर क्षण महसूस होता रहता हैअनुभव बीत जाता है अनुभूति का एहसास भीतरी तहों में दुबक कर बैठ जाता हैपहली और दूसरी, शायद तीसरी बैठक तक वह मरीज थी, वे चिकित्सक --आगे पढें

प्रेम से पहले - लवलीन
पार्टी की भीड पर उसकी नजरें फिसल रही थीं उन्हें खोजना मुश्किल मालूम हुआ जहां आंखों को अटना था वहीं चेहरा ओझल था फुरफुरी की तरह निराशा व्यापने लगी तो  तो वे आए नहीं! ऐसा कैसे हो सकता है? --आगे पढ़ें


मोहे अगले जनम फिर औरत कीजो
- सीमा शफ़क
रात-भर पागल कुत्तों की तरह रिरियाते, लार टपकाते शरीफजादों ने इस मण्डी की कोठरियों में गुरबत और मजबूरी के साथ जो जिस्मानी तजुर्बे चन्द सिक्कों के एवज में किये थे वो दुनिया पे फाश न हो जायें इसका होश उन्हें पागलपन के पूरे सुरूर में भी क्या खूब रहता है, तभी तो पौ फटने के वक्त वो इसी नीम अँधेरे की चादर ओढ बस्ती से चुपचाप खिसक लेते हैं । बडा फरटाईल धन्धा है ये साला जिस्मफरोशी भी! --आगे पढ़ें

लेट अस ग्रो टुगेदर -
मनीषा कुलश्रेष्ठ 
तुम यह भी बता रहे थे कि बोन्साई ठहराव का प्रतीक है, जिस घर में रखो वहां विकास थम जाता है। वैसे भी नितान्त अप्राकृतिक व क्रूर है यह बोन्साई बनाना या रखना। कैक्टस विशाद का प्रतीक है। गुलाब, चम्पा व सुगन्धमय पौधे शान्ति व प्रेम का प्रतीक हैं। इसी तरह तो फिर सिलसिले जुडते जाते हैं बातों के और
--- आगे पढ़ें

धरोहर

धागे - निर्मल वर्मा  
उस रात खाने के बाद कॉफी पीते हुए हम केशी के नये रिकॉर्डों की चर्चा करने लगे।
'' मुझे तो रात को नींद नहीं आती. मैं ने ग्रामोफोन लायब्रेरी में रखवा दिया है।'' मीनू ने कहा।
'' क्या वह अब भी पीते हैं?'' मैं ने धीरे से पूछा।
                        
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उपन्यास ( धारावाहिक)
आगे खुलता रास्ता - नंद भारद्वाज भाग 3
 
गीता एक धीमे स्वभाव वाली औरत थी। उसे न अपने जेठ-जेठानियों से ज्यादा अपेक्षाएं थीं और न कोई शिकायत। पीलीबंगा वाले घर में उसे कोई कठिनाई नहीं थी। अपने ब्याह के बाद के इन दो सालों में वह अपनी सास और घर-परिवार के सभी लोगों से पूरी तरह घुल-मिल गई थी। - आगे पढें

संस्मरण

यात्रा-संस्मरण : पाकिस्तान
असी लाहौर वेख्या ऐ
- प्रेमचन्द गाँधी
जाते हुए दिसम्बर की दोपहर के तीन बजे थे, लेकिन कोहरा इतना गहरा था कि वाघा सीमा पर हमारे इस्तकबाल में पचासेक गज पर नारे लगाते लोग भी दिखाई नहीं दे रहे थे। सिर्फ आवाजें सुनाई दे रही थीं- 'पाक-भारत दोस्ती जिन्दाबाद-जिन्दाबाद।'  - आगे पढें


अंक की विशिष्ट कहानी

वह आँगन और लालटैन - राजेन्द्र कृष्ण
15 वर्षीय रूपमती जब भारत के विभाजन से कुछ महीने पहले 25 वर्षीय प्रेमचन्द की दुल्हन बनी तो वह एक ब्याहता स्त्री के अलावा अपने घर की बडी बहू और एक ननद और तीन देवरों की भाभी भी बनी। अपनी विधवा सास के साथ कंधे से कंधा मिलाकर रूपमती नें एक उजडते परिवार को सहेजना शुरू किया। विभाजन होने से पहले ही भविष्य की भयावह अनिश्चितता भांप प्रेमचन्द अपने छोटे भाई मदन के साथ फ्रंटियर के एक छोटे से कस्बे को छोड दिल्ली आ पहुंचे। - आगे पढ़ें

साहित्य कोष

इस्मत आपा की कहानियाँ और भारतीय मुस्लिम समाज

साहित्य समाचार
शताब्दी के बहाने संवाद की पहल करती पत्रिका 'कुरजाँ'  

शीर्षस्थ आलोचक सुरेन्द्र चौधरी पर केन्द्रित ''बया'' का आयोजन

 


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