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नई कविताएँ

निकोला की माँ - रति सक्सेना

अमजद अली का सरोद वादन और चीख - रति सक्सेना

देहान्तर - रति सक्सेना

दृष्टिविरोध- रति सक्सेना

मेरी चदरिया - रति सक्सेना

कुछ बचा कर रख लेती थी, माँ - रति सक्सेना

विक्षिप्ता - 1 - सुनीता सनाढ्य पाण्डेय 
विक्षिप्ता - 2 -
  सुनीता सनाढ्य पाण्डेय

हाईकू : माँ -
सरस्वती माथुर

सरकारी अफ़सर - मंजरी भान्ती

चेहरा - मंजरी भान्ती

लड़की नहीं खबर है वह - मंजरी भान्ती

भुवन मोहिनी सन्यासिन  - मंजरी भान्ती

बड़ा हुआ बच्चा - शिखा वार्ष्णेय

पॉश खेल - शिखा वार्ष्णेय

चीखते प्रश्न - शिखा वार्ष्णेय

रूमानियत - मनीषा कुलश्रेष्ठ

लाल - अपर्णा अनेकवर्णा

एक बार फिर - अपर्णा अनेकवर्णा

प्रेम में प्रैक्टिकल होना - अपर्णा अनेकवर्णा

प्रदूषण के गुबार - संजय वर्मा "दृष्टि"

अभियोगिनी गंगा - डॉ. अनिल कुमार दीक्षित

विलुप्त होने तक - डॉ अनिल कुमार दीक्षित

 मरुस्थल के भीतर से - अनिरुद्ध उमट

थोड़ा वक्त और बरबाद करें - नीरज मिश्रा

संस्मरण

तारों छाई रात - ओम थानवी
न्यूयॉर्क शहर में चाहे जितनी धड़कन हो, मेरे लिए उसका दिल इस एक कृति में धड़कता है। ठीक वैसे जैसे पेरिस का तसव्वुर करते ही मन में विंची की ‘मोनालिसा’ या मैड्रिड के नाम से पिकासो की ‘गेरनिका’ की छवि उभरती है। इसका मतलब यह नहीं कि मोमा में पिकासो या मातीस की तरफ ध्यान नहीं जाता या अपने अत्यंत पसंदीदा पॉल क्ले, गुस्ताव क्लिम्ट और होन मीरो को फिर-फिर नहीं देखता।  - आगे पढ़ॆं

 

मेरी डायरी - अनिरुद्ध उमट
‘वास्तव में कवि को अज्ञात रहना चाहिए। जिस क्षण जो शब्द लिखा, वही उसकी ध्वनि, मौन, नाद, उजाड़ था, उच्चारण था । बस। उसका दोहराव फिर कवि से भी संभव नहीं। फिर अगर कवि करता भी है तो वह कुछ और क्रिया होती है, असफल खोज, असफल दस्तक, अनसुनी पुकार, गूंगी.....कविता नितांत निजी कर्म है मित्र! अन्त्येष्टि की तरह। वह सार्वजनिक प्रदर्शन में अपनी काया...माया में बेगानी हो जाती है। उसका उलाहना हमारी आत्मा सुनती है। उसकी कलप हमारे भीतर टीस मारती है।’ - आगे पढ़ें


निबंध

गायतोंडे के चित्रों का समकालीन पुरातत्व - मनीष पुष्कले
अमूर्तन और अमूर्त में वही अंतर है जो रज़ा और गायतोंडे में है ! एक अच्छा अमूर्तन चित्र अगर विषय, विचार और चित्र-शास्त्र के परस्पर मिलान से बना व्यंजन है तो अमूर्त चित्र व्यंजना है !  - आगे पढ़ें

अमूर्त में मूर्त ऐन्द्रिकता का संगीत : अशोक वाजपेयी की कविताएँ
अशोक जी की प्रेमकविताओं के अन्दर प्रतीक्षा के पलों में उभरे रहस्यमय बिम्ब करवट लेते हैं, सपनों, दिवा - स्वप्नों, भ्रमों, कोलाजों, प्रकाशपुँजों, धुंधलकों के माध्यम से इनमें इतनी अर्थबहुलता आ जाती है कि इन गलियारों में घूमता पाठक चमत्कृत होता ही होता है. वे जानते हैं कि कौनसा संस्कृतनिष्ठ शब्द किस तरह से रखा जाए कि, आधुनिक कविता के गलियारे में वह किसी एंटीक सा खूबसूरत ‘इफेक्ट’ पैदा करे. उनकी प्रेम कविता की अमूर्तता में मूर्त संसार के कई वलय हैं, जो परस्पर समानांतर, सहजीवन जीते हैं -
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कहानियाँ

सुरमयी - ममता सिंह

नींद खुलते ही प्रज्ञा का हाथ रोज़ की तरह तिपाई पर रखे रेडियो के स्विच की ओर गया। गाना बज उठा --'हम तुम्हेंक चाहते हैं ऐसे'......वो झट उठकर बैठ गयी। मुस्कुराहट के साथ बुदबुदा उठी-- ओफ़, तो आ गए जनाब रेडियो पर। ये गाना तो मेरे लिए बजाया जाता है। सांस रोके गाना ख़त्म होने और उसकी आवाज़ सुनने का इंतज़ार करने लगी। ऐसा अकसर होता है कि प्रज्ञा रेडियो…गाने सुनने के लिए नहीं लगाती, बल्कि अभय की आवाज़ सुनने के लिए लगाती है। इस मायने में वो रेडियो की सबसे अनूठी श्रोता है। - आगे पढ़ें

आत्मजा - रोहिणी अग्रवाल
कहानी कुछ साफ नहीं है दिमाग में। लगता है नैन-नक्श भी पूरे नहीं लिए उसने। लेकिन मिसेज अलका नंदा पता नहीं कैसे पूरी कद-काठी लेकर बाहर आने को बेचैन हैं। मैं बार-बार बरज रही हूँ - नहीं, प्रीमेच्योर डिलीवरी में रिस्क रहता है। मां और बच्चा दोनों के लिए। लेकिन मिसेज अलका नंदा शायद कुछ ज्यादा ही जिद्दी स्वभाव की हैं।
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Manisha Kulshreshtha
 

भक्तिकाल

सीतायाश्चरितं महत - सदानंद शाही
रामायण और महाभारत भारतीय मन को निर्मित और नियनित्रत करने के स्रोत रहे हैं। इसलिए परिवर्तन के प्रत्येक दौर में इन महाकाव्यों को आधार बनाकर अपने विचारों और मान्यताओं को व्यक्त करने की कोशिशें हु हैं। स्त्री-पुरुष सम्बन्धों को निरूपित करने की दृष्टि से भी इन दोनों महाकाव्यों का काफी उपयोग हुआ है। इस नजरिये से देखें तो सीता के चरित्र का सर्वाधिक उपयोग हुआ है। - आगे पढ़ें

 

जीवनी - अंश


बालज़ाक के जीवन का एक रोज - स्टीफन स्वाईग ( अनुवाद - ओमा शर्मा)
शाम के आठ बजें हैं। पेरिस के बाशिन्दों ने अपना काम-काज कब का निबटा लिया है और दफ्तरों, दुकानों और फैक्ट्रियों से लौट आए हैं। रात का खाना खाने के बाद ये लोग अपने परिजनों, मित्रों या अकेले-अकेले ही मौज-मस्ती करने सड़कों पर जमघट लगाएंगे। कुछ लोग चौपाटी पर टहलेंगे तो कुछ कैफ़े में बैठे होगें। कुछ लोग सिनेमा या थिएटर देखने के लिए बन-संवर रहे होंगे। अकेला बाल्ज़ाक है जो अपने अंधेरे कमरे में सोया पड़ा है... अपनी मेज पर अदद सोलह-सत्रह घंटे काम करने के बाद उसे दुनिया की कोई खैर-खबर नहीं है। - आगे पढ़ें


अन्य भारतीय भाषा से

सिन्धी कहानी


जेल की डायरी:
 वीणा शिरंगी  
अनुवाद: देवी नागरानी

सुबह-सुबह चाय का प्याला अभी लबों तक लाया ही था कि मेरी नज़र अख़बार में छपी एक ख़बर पर अटक गई ।
‘जेल में नज़रबन्द क़ातिल औरत की आत्महत्या।’   - आगे पढ़ें

 

पढ़ते हुए : मेरे कुछ नोट्स -शैलेन्द्र सिंह्
पोर्चिया इन्ही subtle सत्यों को पकड़ते हैं, उनके ‘one लाइनर्स’ जिन्हें विश्लेषित करने पर कई पन्ने रंगे जा सकते हैं , पोर्चिया एक मोमेंट में देख ली गयी ‘अनंतता’को एक स्टिल फोटोग्राफ की तरह पकड़ते हैं, न होने की शून्यता नहीं अपितु होने की शून्यता,एक इंटरव्यू में वे कहते हैं कि ऐसा कोई केंद्र नहीं है जहाँ जिंदगी को लोकेट किया जा सके.   - आगे पढ़ें

 

निबन् - अरुण प्रकाश
हम इक उम्र से वाकिफ़ है
 

 

चर्चित ब्लाग

पढ़ते - पढ़ते - मनोज पटेल
आपका साथ साथ फूलों का - अपर्णा मनोज
प्रतिभा की दुनिया -
प्रतिभा कटियार
Antheia - कनुप्रिया
 

 

 

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