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प्रेरणा श्रीमाली से कथक और वर्तमान परिदृश्य, कथक व कविता पर लिया गया साक्षात्कार- मनीषा कुलश्रेष्ठ
मैं नर्तकी हूँ. नृत्य मेरी भाषा है. जीवन के इस बिन्दु और आयु में मैं सहज ही कह सकती हूँ कि नृत्य मेरे जीवन को निर्देशित करता है. मैं कुछ भी करुँ वह मेरी नृत्याभिव्यक्ति का ही दूसरा अनुभव बन जाता है. नृत्य महज नृत्य, एक सीखा हुआ हुनर मात्र नहीं हो सकता बल्कि जब एक नर्तक या नर्तकी अपनी मनो – मस्तिष्क की पूर्ण सजगता के साथ नाचता या नाचती है, वह नृत्य के रियाज़ के साथ आता है. क्योंकि उसे मुद्राओं, पद – संचालनों, गतियों और भावाभिव्यक्ति को हजार बार निरंतर दोहराना ही होता है. ताकि सम्पूर्ण अंग – संचालन में एक सहजता आ सके, और इस रियाज़ में नर्तक अपने शरीर के हर अंग के प्रति सजग हो ताकि वह नाचते समय अपने पूरे शरीर को भूल जाए. तभी संभव है कि दर्शक नर्तक को भूल नृत्य देखे. और साधना क्या है? - आगे पढ़ें

रक्स की घाटी और शबे फितना
वे तीनों रात भर हल्के हरे पत्तों के बीच अपने सफेद चेहरे और गुलाबी से बैंगनी पड़े होंठ छिपाए रहीं, बैंगनों और शलगमों के इस खेत में वे तीनों अविचल खेत का ही हिस्सा लग रही थीं, उनके गहरे सलेटी लबादे उनके जिस्म पर मटमैली, बारूदी चाँदनी की तरह लिपटे थे, सबसे छोटी ग़ज़ाला के चेहरे पर बन्धा स्कार्फ खुल कर उड़ा जा रहा था, उसे अपने दिल की धड़कनें तक अज़ाब महसूस हो रही थीं, मानो कि सीने में फूटते कोई छोटे - छोटे विस्फोट, अनवरत !
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मेरी डायरी - अनिरुद्ध उमट
‘वास्तव में कवि को अज्ञात रहना चाहिए। जिस क्षण जो शब्द लिखा, वही उसकी ध्वनि, मौन, नाद, उजाड़ था, उच्चारण था । बस। उसका दोहराव फिर कवि से भी संभव नहीं। फिर अगर कवि करता भी है तो वह कुछ और क्रिया होती है, असफल खोज, असफल दस्तक, अनसुनी पुकार, गूंगी.....कविता नितांत निजी कर्म है मित्र! अन्त्येष्टि की तरह। वह सार्वजनिक प्रदर्शन में अपनी काया...माया में बेगानी हो जाती है। उसका उलाहना हमारी आत्मा सुनती है। उसकी कलप हमारे भीतर टीस मारती है।’ - आगे पढ़ें
डायरी लेखन - एक तरल विधा   - अरुण प्रकाश

डायरी का एक पन्ना,  मुठभेड़ में मारे गये एक कुख्यात अपराधी के नाम - कंचन चौहान

एक फौजी की डायरी-1 - गौतम राजरिशी
एक फौजी की डायरी-2
एक फौजी की डायरी-3
एक फौजी की डायरी-4
एक फौजी की डायरी-5

डायरी का आखिरी पन्ना- विवेक मिश्र
आज अम्मा की अलमारी में प्राची का पत्र मिला। डेढ़ साल पुराना पत्र।…और इन दिनों, मैं यही समझता रहा कि औरंगाबाद से लौटने के बाद सब खत्म हो गया, कुछ नहीं बचा हमारे बीच। - आगे पढ़ें  

 

कहानियाँ
आत्मजा - रोहिणी अग्रवाल
कहानी कुछ साफ नहीं है दिमाग में। लगता है नैन-नक्श भी पूरे नहीं लिए उसने। लेकिन मिसेज अलका नंदा पता नहीं कैसे पूरी कद-काठी लेकर बाहर आने को बेचैन हैं। मैं बार-बार बरज रही हूँ - नहीं, प्रीमेच्योर डिलीवरी में रिस्क रहता है। मां और बच्चा दोनों के लिए। लेकिन मिसेज अलका नंदा शायद कुछ ज्यादा ही जिद्दी स्वभाव की हैं। अपने ज़माने की जानी-मानी एक्टिविस्ट। एक बार ठान लिया सो बस्स! पूरा घर थर्राता है उनसे।
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लिखते हुए कुछ ख़्वाब से - अनघ शर्मा 
लक-दक करके दामन से झाड़ो तो अनगिनत यादें झड जाती हैं। पर ये भी तो सच ही है कि इतनी आसानी से कभी कोई याद भी नहीं आता। दिली तौर पर याद करना और ज़हनी तौर पर याद करना दोनों अलग-अलग हैं, फिर भी कुछ यादें ज़हन और दिल के बीच कहीं अटकी रहती हैं। उसकी याद भी कुछ ऐसी ही थी, कहीं ज़हन और दिल के बीच सुस्त पड़ी। पर एक कोशिश तो करनी ही थी इसे निकालने की। सो ये तय हुआ कि यादों के तोशखाने में से एक रजाई निकाली जाये। फिर रात भर कोई याद ओढ़ो। पुरानी याद की धुंधली गंध रिसते-रिसते दिल के तहख़ाने में बैठ जायेगी। यूँ एक कहानी के जन्म की बात होगी …… शर्त ये कि पैदाइश तक रजाई तोशखाने में वापस न रखी जाए। - आगे पढ़ें

मि. वॉलरस - मनीषा कुलश्रेष्ठ   " मैं तमाशबीन महज था अब तक कि अचानक दायित्व आ गिरा. मन ही मन उलझन हुई. मगर दो ज़िन्दगियाँ असली क्लेश में थीं, एक बच्चा और दूसरी भी तो बच्ची. शिकारी कुत्ते से बच कर भागे, दो नन्हे ख़रगोश!" पहली बार उसे देखा, एक नाज़ुक – सी लड़की. वह अपनी छोटी – सी लाल कार में स्टियरिंग पर सर रखे फूट - फूट कर रो रही थी. बच्चा पीछे की सीट पर बेबी सेफ सीट में बँधा था, बेल्ट से और अन्दर की खींचतान से त्रस्त और माँ को रोते देख हिचकियों से रो रहा था. - आगे पढ़ें

रजनी मोरवाल की कविताएँ
संयम-जाल
सावन बहका है
जब से तुम परदेश बसे
 

अंक की विशिष्ट कहानी
सब कुछ नही - कृष्ण बलदेव वैद
 

Manisha Kulshreshtha

 


विरासत से विशेष
ताई ''ताऊजी, हमें लेलगाड़ी (रेलगाड़ी) ला दोगे?" कहता हुआ एक पंचवर्षीय बालक बाबू रामजीदास की ओर दौड़ा।
बाबू साहब ने दोंनो बाँहें फैलाकर कहा- ''हाँ बेटा,ला देंगे।'' उनके इतना कहते-कहते बालक उनके निकट आ गया। उन्होंने बालक को गोद में उठा लिया और उसका मुख चूमकर बोले- ''क्याक करेगा रेलगाड़ी?''
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पढ़ते हुए : मेरे कुछ नोट्स -शैलेन्द्र सिंह्
पोर्चिया इन्ही subtle सत्यों को पकड़ते हैं, उनके ‘one लाइनर्स’ जिन्हें विश्लेषित करने पर कई पन्ने रंगे जा सकते हैं , पोर्चिया एक मोमेंट में देख ली गयी ‘अनंतता’को एक स्टिल फोटोग्राफ की तरह पकड़ते हैं, न होने की शून्यता नहीं अपितु होने की शून्यता,एक इंटरव्यू में वे कहते हैं कि ऐसा कोई केंद्र नहीं है जहाँ जिंदगी को लोकेट किया जा सके.   - आगे पढ़ें

नहान - अरुण प्रकाश
मैं जब उस मकान में नया पड़ोसी बना तो मकान मालिक ने हिदायत दी थी - ''बस तुम नहान से बच कर रहना। उसके मुँह नहीं लगना। कुछ भी बोले तो ज़ुबान मत खोलना। नहान ज़ुबान की तेज़ है।  -
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निबन्
- अरुण प्रकाश

हम इक उम्र से वाकिफ़ है
इस बहाने
भारत में राष्ट्रीय अखण्डता : भाषायी समन्वय - डॉ. दिविक रमेश
सीमाओं के आर-पार करोड़ों के दिलों में बसते हैं भगत सिंह

साक्षात्कार
रोमानिया में हिन्दी - संजय कुमार
साहित्य कोष
इस्मत आपा की कहानियाँ और भारतीय मुस्लिम समाज

Poetry - Nand Chaturvedi
Translated by
Dr Ashutosh Mohan

ALL IN OUR FAVOUR  -

THE BOOK

THE CALLOUS MOMENT OF CARNIVAL

AH ! HUENTSANG

THE FORT 

LUMINOUS PEAKS

चर्चित ब्लाग
पढ़ते - पढ़ते - मनोज पटेल
आपका साथ साथ फूलों का - अपर्णा मनोज
प्रतिभा की दुनिया -
प्रतिभा कटियार
Antheia - कनुप्रिया


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