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नई कविताएँ

पलायन - गार्गी

हामिला - गार्गी

घर - गार्गी

पौधा - सुधेश

साँस लेते पेड़ - सुधेश

बसंत का सपना - सुधेश

इस वक्त - आशीष दशोत्तर

परदेस में - गौतम कुमार सागर

ला - जवाब - गौतम कुमार सागर

खोई हुई आग की तलाश - मनीषा कुलश्रेष्ठ

व्यंग्य कविता

एन जी ओ

देस - परदेस

नागालैंड : जिसके सफर में आत्माएं तक ठिठककर
रह जाती हैं! - अलका कौशिक
लॉन्गैखुम एक बार फि‍र लौटना होगा। नागा किंवदंती के अनुसार हमारी आत्माओं वहीं ठहर गई है, उस पहले सफर में वो लॉन्गटखुम की पहाड़ी ढलानों पर उगे बुरांश के पेड़ों और उनके सुर्ख फूलों के मोहपाश में फंस चुकी है। और उसे वापस लाने के लिए हमें लौटना ही होगा! - आगे पढ़ें

संस्मरण

तारों छाई रात - ओम थानवी
न्यूयॉर्क शहर में चाहे जितनी धड़कन हो, मेरे लिए उसका दिल इस एक कृति में धड़कता है। ठीक वैसे जैसे पेरिस का तसव्वुर करते ही मन में विंची की ‘मोनालिसा’ या मैड्रिड के नाम से पिकासो की ‘गेरनिका’ की छवि उभरती है।   - आगे पढ़ॆं

 

अमूर्त में मूर्त ऐन्द्रिकता का संगीत : अशोक वाजपेयी की कविताएँ
अशोक जी की प्रेमकविताओं के अन्दर प्रतीक्षा के पलों में उभरे रहस्यमय बिम्ब करवट लेते हैं, सपनों, दिवा - स्वप्नों, भ्रमों, कोलाजों, प्रकाशपुँजों, धुंधलकों के माध्यम से इनमें इतनी अर्थबहुलता आ जाती है कि इन गलियारों में घूमता पाठक चमत्कृत होता ही होता है.  -
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निबंध

गायतोंडे के चित्रों का समकालीन पुरातत्व - मनीष पुष्कले
अमूर्तन और अमूर्त में वही अंतर है जो रज़ा और गायतोंडे में है ! एक अच्छा अमूर्तन चित्र अगर विषय, विचार और चित्र-शास्त्र के परस्पर मिलान से बना व्यंजन है तो अमूर्त चित्र व्यंजना है !  - आगे पढ़ें



कहानियाँ

प्रगल्भा - डॉ. लक्ष्मी शर्मा
“मेम, हमें नाम लिखवाना है.” घनानन्द की आंसुओं में डूबी कविताओं वाली क्लास खत्म हुई ही है. मैंने स्टाफ रूम में आ कर अभी राहत की साँस भी नहीं ली है कि ये सिरदर्द सिर पर आ खड़ी हुई.  - आगे पढें

लहुलुहान कौन - प्रतिभा

सपनों की इस सुनहरी नदी में नीली मछली की तरह पिन्टू राम भी तैर सकता है। उसकी मैडम का बेटा, बेटी, मैडम और साहब भी। पूरा परिवार और नौकर पिन्टू राम साथ-साथ भी हो सकते हैं। नदी के मुहाने पर कहीं बोर्ड नहीं लगा होगा कि पिन्टू नीली मछली की शक्ल अख्तियार नहीं कर सकता।  - आगे पढॆं

लंबी कहानी

विष वल्लरी :    कंचन सिंह चौहान
बचपन से चाचा जी की इतनी कहानियाँ सुनी हैं कि लगता है चाचाजी मेरे सामने ही पैदा हुए और बड़े हुए हैं। उनकी किंवदंतियाँ बताने वाली दादीजी यूँ भी अगर लिखतीं तो कम से कम मुझसे तो बहुत अच्छी ही कथाकार होतीं। और असल में मैं भी चाचाजी की ये कथा इसीलिये लिख पा रहा हूँ क्योंकि दादीजी ने हरबोलों की तरह उनकी कहानी नित्य प्रति के पाठ्यक्रम में बचपन से ही शामिल कर रखी थी। - आगे पढ़ें
भाग - 1
भाग -2

लघु कथाएँ

निमंत्रण - दीपक मशाल
जात-बिरादरी- दीपक मशाल
अंगुलियाँ - दीपक मशाल
निर्धारण - दीपक मशाल
हूर बनने का ख़ौफ़ - सुधीर मौर्य
एक दीवाने की मौत - सुधीर मौर्य

 

 


Manisha Kulshreshtha
 


भक्तिकाल

सीतायाश्चरितं महत - सदानंद शाही
रामायण और महाभारत भारतीय मन को निर्मित और नियनित्रत करने के स्रोत रहे हैं। इसलिए परिवर्तन के प्रत्येक दौर में इन महाकाव्यों को आधार बनाकर अपने विचारों और मान्यताओं को व्यक्त करने की कोशिशें हु हैं। स्त्री-पुरुष सम्बन्धों को निरूपित करने की दृष्टि से भी इन दोनों महाकाव्यों का काफी उपयोग हुआ है। इस नजरिये से देखें तो सीता के चरित्र का सर्वाधिक उपयोग हुआ है। - आगे पढ़ें

जीवनी - अंश


बालज़ाक के जीवन का एक रोज - स्टीफन स्वाईग ( अनुवाद - ओमा शर्मा)
शाम के आठ बजें हैं। पेरिस के बाशिन्दों ने अपना काम-काज कब का निबटा लिया है और दफ्तरों, दुकानों और फैक्ट्रियों से लौट आए हैं। रात का खाना खाने के बाद ये लोग अपने परिजनों, मित्रों या अकेले-अकेले ही मौज-मस्ती करने सड़कों पर जमघट लगाएंगे। कुछ लोग चौपाटी पर टहलेंगे तो कुछ कैफ़े में बैठे होगें। कुछ लोग सिनेमा या थिएटर देखने के लिए बन-संवर रहे होंगे। अकेला बाल्ज़ाक है जो अपने अंधेरे कमरे में सोया पड़ा है... अपनी मेज पर अदद सोलह-सत्रह घंटे काम करने के बाद उसे दुनिया की कोई खैर-खबर नहीं है। - आगे पढ़ें


अन्य भारतीय भाषा से

सिन्धी कहानी


जेल की डायरी:
 वीणा शिरंगी  
अनुवाद: देवी नागरानी

सुबह-सुबह चाय का प्याला अभी लबों तक लाया ही था कि मेरी नज़र अख़बार में छपी एक ख़बर पर अटक गई ।
‘जेल में नज़रबन्द क़ातिल औरत की आत्महत्या।’   - आगे पढ़ें

 

चर्चित ब्लाग

पढ़ते - पढ़ते - मनोज पटेल
आपका साथ साथ फूलों का - अपर्णा मनोज
प्रतिभा की दुनिया -
प्रतिभा कटियार
Antheia - कनुप्रिया
 

 

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