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बदहाल बचपन जो असमय ही बुढ़ापे में बदल गया

 

सरकारी दस्तावेजों में भले ही बाल श्रम एक अपराध हो और उसके लिए सजा या जुर्माने का प्रावधान हो मगर वास्तव में देश के अधिकांश भाग में बाल श्रम जबरिया तरीकों से व्याप्त है, और इसके अस्तिव का सबसे शर्मनाक पहलू तो ये है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक कल्याणकारी राज्य की राजधानी से चंद किलोमीटर की दूरी पर एक अलग ही दुनिया बसती है।

 

एक ऐसी दुनिया जहां विकास की किरणें फूटती और फिर मध्दिम हो जाती, और इस समाज की वास्तविक समस्या क्या है और इसकी शुरुआत जहां से करें ये भी एक दुविधा है।

 

इस क्षेत्र का मुख्य व्यवसाय कृषि रहा है मगर संपन्न खेती क्या होती है ये भी यहां के लोगों के लिए एक अंजाना सा नाम है। कृषि न होने के कारण इस क्षेत्र के लोगों ने ड्राइवरी को अपना मुख्य पेशा बना लिया। हालांकि इधर के दो -तीन वर्षों में मेवात में शिक्षा पर जोर शोर से काम शुरू हुआ है मगर यहां हुआ सर्वशिक्षा अभियान का सबसे बड़ा घोटाला सारी स्थितियों पर प्रश् चिन्ह है। मगर प्रथम (समाजिक संस्था) द्वारा युद्व स्तर पर काम किया जाना एक मात्र आशा की किरण है।

 

प्रदेश में व्याप्त आजाद मनुष्य के अधिकारों का हनन करती बंधुआ मजदूरी हो स्त्री -पुरूष के समान कार्य का असमान वेतन हो न्यूनतम मजदूरी से कम मजदूरी का भुगतान हो बेरोजगारी, लैंगिक असमानता अथवा मानवीय तस्करी या अशिक्षा, गरीबी ये तमाम समस्यायें इस क्षेत्र में अपने चरम अवस्था पर हैं। मगर अफसोस की बात यह है कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी व स्थानीय नेतृत्व के ना होने ने इस क्षेत्र को लगातार गर्त में धकेला जा रहा है।

 

बाल अधिकारों की घोर अपेक्षा और कदम दर कदम नजर आने वाले, बाल श्रमिकों ने हमारे संगठन को इस विषय को अपने हाथ में लेकर सच्चाई सामने लाने को मजबूत किया और तमाम तरह की समस्याओं को झेलने के बावजूद मने मेवात के 3 ब्लाक कूमष, पुनहाना, नगीना और फिरोजपुर झिरका में 14 वर्ष या उससे कम के कुल 498 बाल मजदूर चिन्हित किये, जिसके तीस प्रतिशत अर्थात 150 बाल श्रमिक को अध्ययन के दायरे में लाया गया ओर सर्वेक्षण नमूनों के अतिरिक्त समूह सम्मिलन व अवलोकन के माध्यम से अध्ययन संपन्न हुआ! आइयें अब जरा इन कारणों की असलियत से आपको भी परिचित कराते चलें।

 

अधिकांश समस्याओं को मेवों की अपनी या फिर अल्पसंख्यकों का मामला बताकर सरकारों की पल्ला झाड़ लेने व सुनियोजित तरीकों से वर्ग विशेष को मुख्यधारा से काट कर रखने की सरकारी कुचेष्टा स्पष्ट दिख जाती है। इन सब के बावजूद ये उल्लेखनीय है कि गुड़गांव व फरीदाबाद जैसे शहरों से लगा यह जिला हरियाणा का सबसे पिछड़ा जिला है। सर्व शिक्षा अभियान और विभिन्न स्ववंसेवी संस्थाओं की पोल खोलता देश में ये जिला शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़ापन में अव्वल है। मेवों पर एक बड़ा आरोप उनकों अधिक बच्चे पैदा करना है।

 

मगर वास्तविकता योजनाओं के लागु न होने का ठीकरा स्थानीय राजनैतिक नेतृत्व के माथे फोड़ दिया जाता है। साथ ही इनसे संबंधित किसी भी मुद्दे को समाजिक समस्या के बजाय मेवों की अपनी समस्या के रूप में देखा जाना प्रशासन की दोहरी नीति का स्पष्ट उदाहरण है। एक ऐसा क्षेत्र जहां ना तो कोई संभावना है न ही कोई वर्तमान सकारात्मक स्थिति। कहते हैं कि किसी भी समाज को अनिवार्य रूप से रोजगार और रोटी की आवश्यकता होती है।

 

ये वो क्षेत्र है जो शून्य क्षेत्र है जहां संभावनाएं उपजने से पहले ही दम तोड देती। एक बात उल्लेखनीय है कि हरियाणा सरकार के श्रम मंत्रालय द्वारा घोषित न्यूनतम मजदूरी 93 रु. का दस प्रतिशत भी इन्हें नहीं मिल पाता। रोजगार की संभावनाओं के ना होने और परिवार का बड़ा आकार बच्चों को काम करने पर मजबूत किये जाने की एक बड़ी वजह तो अवश्य मानी जा सकती है। किन्तु ऐसा नहीं कह सकते कि बाल मजदूरों का परिवार उन्हें पढ़ाना ही नहीं चाहता।

 

इस क्षेत्र के अध्ययन के दौरान इन बाल मजदूरों के अभिभावकों में 80 फीसदी उनके पढ़ाई के लिए चिन्हित दिखे मगर इक्षाशक्ति की कमी स्पष्ट दिखी। एक सवाल जो अक्सर उन्होंने हमारे सामने रखा कि अगर बच्चे पढ भी जायें तो क्या होगा और क्या उन्हें नौकरी मिल जायेगी, और कि अगर शिक्षा उनके रोजगार में सहायक नहीं तो फिर पढ़ाई के बजाय काम सीखना और काम करना कहां से गलत है। बच्चों कि अधिक संख्या हो या ना हो मगर पहले तो खाना चाहिए दो बच्चे ही हों और खाने को एक रोटी तो पहले रोटी कमाना पड़ेगा ना।

 

वहां एक गैराज में काम करने वाला 13 वर्षीय बच्चा अकबर(बदला हुआ नाम, यहां बाल न्याय(बच्चों की देख -भाल एवं संरक्षण)अधिनियिम 2000 की धारा 21 के तहत बच्चों की पहचान गुप्त रखी गई है।)अपने अभिवावकों को जवाब कुछ यूं देता है। नौकरी का कया क्या करना है कुछ भी कर लेंगे, नौकरी मांगने से नहीं मिलती सर ! लेनी पड़ती है पहले पढ़ें फिर देखेंगे तीन साल का बच्चा क्या करता है। मगर जिन्दा रहता है ना और नहीं रहता तो क्या ऐसा जिन्दा रहना जरूरी है क्या बदमाशी कौन करता है। बच्चा या बड़ा आदमी? आगे कहता है हमारे साथ क्या क्या होता है, पता है किसी को? इसी लाइन में आदमी बिगड़ता है। कौन और किसको! छोड़िये जी हर महीने 150 रुपये बाप को देता हूं। जबकि मैं घर पर केवल रात में खाता हूं। हमारे साथी से बात करते अकबर अक्सर भावुक हो जाता है! वह यह जानता है कि आज वो जो जो झेल रहा है इन सबके बावजूद अपने हालात में कोई बदलाव नहीं ला पायेगा। हां कुछ दिनों बाद वह अपने अपने चेले या छोटू के साथ वहीं कर सकता है जो अबतक उसके साथ होता है।

 

वह बड़ी मासूमियत से पूछता है कि आखिर वो अपने मां बाप को जेल कैसे भेज सकता है। वो ये जानना चाहता है कि आखिर अपनी शिकायत कहां करे ताकि भले ही उसके मां- बाप जेल चले जायें मगर उसकी पढ़ाई का इंतजाम हो सके। वो जानता है कि शिक्षा उसके जीवन को और आने वाली पीढ़ी को भी दिशा दे सकता है। उसके गुस्से का कारण उसका पढ़ पाना ही नहीं बल्कि  बार-बार अपना इशारा कहीं और करता है।

 

वह अपने उस्ताद को मार देना चाहता है और किसी भी हाल में गैराज में रात गुजराना नहीं चाहता। ओवर टाइम करने पर कुछ पैसा मिलता है खाना भी अच्छा मिलता है। मगर ओवरटाइम बड़ा भारी पड़ता है क्यूंकि उस्ताद उसका यौन शोषण करता है और उसके मना करने पर पीटता है। वो आगे कहता है कि जब उसके साथ पहली बार उस्ताद ने गलत काम किया तो उसने बाप से शिकायत की  कि उस्ताद बहुत मारता है तो बाप का कहना था कि उस्ताद की मार से ही काम सीखता है। बार-बार आनाकानी करने पर जमके पिटाई हुई और तभी से वह ये सब झेल रहा है, और अब इस बात पर अड़ा हुआ है कि मौका मिला तो अपने बाप व उस्ताद से बदला जरूर लेगा।

 

वह यह भी कहता है कि अगर आज नहीं तो कभी और लेंगे, जवान होकर बदला तो लेंगे। उसे अफसोस है अपने जन्म पर! कहता है बच्चे गरीबी की वजह से काम नहीं करते बल्कि उनकी किस्मत ही खराब होती है कि वो ऐसे मां बाप के बच्चे होते हैं।

 

वह बताता है कि सबके साथ ये शोषण होता है, मगर कुछ शिकायत क्यूं नहीं करते के जवाब में वह बताता है क्या कहें और किससे कहें मां बाप ही नहीं समझते तो कौन समझेगा। ये तो काम करवाने के लिए पैदा करते हैं। हमारे साथ क्या होता है या क्या होगा इससे इनको कोई फर्क नहीं पड़ता। इसीलिए मुझे नफरत है।

 

छोटी सी उम्र में लगातार 10 से 12 घंटे तक काम करने वाले बच्चों की स्वास्थ्य की स्थिति का अनुमान लगाना कोई मुश्किल नहीं फिर भी आइये एक नजर देखें, मानसिक प्रताड़ना से हमारा अभिप्राय बच्चों के साथ जबरदस्ती करना, उनके अंगों से छेड़छाड़ करना, गोद में बिठाना, गाल मलना या फिर बच्चें को पकड़ कर उसके परिवार की महिला सदस्यों के संदर्भ में आपत्तिजनक बात करना। अशील चित्र दिखा कर उत्तेजित करना आदि है। वहीं इन समूहों में हस्त मैथुन का बढ़ता चलन अपने आप ही तमाम स्थितियों को स्पष्ट करता है।

 

मेवात में बाल श्रमिकों का परिचय एक बदहाल बचपन जो असमय ही बुढापे में बदल गया से कुछ अधिक नहीं! एक सा बचपन जिसे समाज ने अपनी अकांक्षाओं के भारी कदमों के तले रौंद दिया है। आवश्यकता है व्यापक जनांदोलन की उसे रोकने के लिए सरकारी इच्छाशक्ति की ताकि मेव मुख्यधारा के सभ्य नागरिक हो सकें और पुलिस को मेवात से गुजरने वाली सड़कों पर सोने की ईंट बेचने वालों से सावधान सूचना वाले बड़े होर्डिग लगाने से मुक्ति मिलेगी।

 

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस

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