क्या यही है वैराग्य?        | दूसरा पन्ना | पहला पन्ना |         

आख्यान में भी वही दो भागते नादान घोडे वही आँखे उस पर आकर उलझ गईं बडे महाराजसा के पास वह बैठे थे। आँखे पहचान में आते ही बाकि चेहरा एक कोलाज सा आ जुडा थापतले भिंचे से कठोरता दिखाने का जबरन प्रयास करते होंठ, जिद्दी सी तीखी नाक मगर सारे संयमों से छूट भागती आँखे।

आख्यान आरंभ होने से पहले पुखराज ने मेरा परिचय बडे महाराजसा से करवाया, वे बडे उदारमना, स्नेहिल और ज्ञानवान व्यक्ति लगेसुमेधा ने इस बार जब उनके चरण स्पर्श किये उसमें औपचारिकता नहीं श्रध्दा थी

'' तुम तो डॉक्टर हो बेटा, जानती होगी कि अन्तरजातीय विवाहों से तो जातियों में नए गुण विकसित होते हैं। बस मेरे लिये इतना करना कि इस छोटे से पिछडे क़स्बे की सेवा करना। यँहा की स्त्रियाँ लेडी डॉक्टर के न होने से बडा कष्ट पाती हैं। पुखराज इतना पढ क़र भी इस छोटे कस्बे में अस्पताल खोल कर कल्याण का काम कर रहा है। जब इसका डॉक्टरी में सलेक्शन हुआ था तब मुझे विश्वास न था कि एक बार शहर में पढ क़र यह मेरी बात मानेगा। अब उसका साथ देकर अपना कर्तव्य पूरा करो। और एक बात और  यँहा स्थानक में साध्वी शान्ता जी बीमार हैं समय निकाल कर उन्हें दवा दे आना।

'' जैसी आपकी आज्ञा महाराजसा। ''

मेरे पीछे खडी सासू माँ के चेहरे का गर्व मुझे महसूस हो रहा थापुखराज ने राहत की साँस लीमहाराजसा से जरा दूर बैठे उस युवा मुनी की उत्सुक दृष्टि और कान इधर ही लगे थेमहाराजसा के पास से पांडाल में लौटते समय सुमेधा ने पुखराज से पूछ ही लिया

'' ये जो यंग से महाराज सा हैं न, वो कौन हैं? ''  
''
वो! मुनि सागरचंद्र जी हैं। अठारह साल का होते ही उन्होंने दीक्षा ले ली थी। बडे हाइली एजूकेटेड हैं, प्राकृत और इंग्लिश में दोनों में एम ए किया , पुरानी जैन स्क्रिप्टस का इंग्लिश ट्रान्सलेशन कर रहे हैं। पास के गाँव के ही हैं।''  

आख्यान कब आरंभ हुआ, कब खत्म सुमेधा को पता ही नहीं चलावह उसी अद्भुत व्यक्ति के बारे में सोचती रहीइतना सुदर्शन, शिक्षित व्यक्ति तमाम कामनाओं पर विजय पाने का दावा कर भिक्षु बन बैठा है? क्या यह इतना आसान है? क्या सचमुच वह इस ठाठे मारते उद्दाम यौवम के बीच स्वयं को जीत पाता होगा? पर इससे इसकी आँखे तो नहीं साधी जातींयही सोच लिये सुमेधा घर चली आई

रात थके होने के बावजूद वह सो न सकी पुखराज भी थके थेमगर सुमेधा की जिज्ञासा का कोई अन्त न था

'' तो पुखराज  कौन थे ये मुनि सागरचन्द्र जी महाराजसा, ये तो पच्चीस साल के भी नहीं लगते।
मुझसे भी छोटे हैं। पच्चीस के हैं भी नहीं।
तुम बता रहे थे अनाथ थे।
हाँ उनके पिता की डेथ ये जब छोटे थे तभी हो गई। सगे चाचाओं ने बिजनेस और रिश्तेदारों ने घर-वर अपने नाम करा लिया इन्हें , इनकी माँ और जवान बहन को निकाल दिया। तब महाराजसा की शरण में गए। महाराजसा ने समाज से आग्रह कर इनकी बहन की शादी कराई, इन्हें पढाने की व्यवस्था की और पूरी स्वतन्त्रता दी कि वे सामान्य जीवन जियें, नौकरी करें, शादी करें पर पिछले साल इन्होंने दीक्षा ले ली।

बडे महाराजसा के प्रति सुमेधा की श्रद्धा और बढ ग़ईसुबह-सुबह वह बैग लेकर स्थानक पहुँची। साध्वी शांता जी एक उम्र दराज साध्वीकाफी बीमार थींब्लडप्रेशर लिया काफी हाई था, जिन काम की दवाओं के सेम्पल पुखराज के बैग में मिले, वे तो शांता जी को दे दीं, और कुछ इंजेक्शन सेविका को पर्ची देकर मँगवा लियेइंजेक्शन देकर उनके सोने की प्रतीक्षा में वह उनसे बातें करने लगी

'' कब से बीमार हैं आप?
 साल भर से यही चल रहा है बेटा। अब कहीं आती-जाती भी नहीं। यहीं जो भोजन मिला जीम लिया। ज्यादातर दूध-फल।
 लेकिन ऐसे तो आप बहुत कमजोर हो गई हैं। ठीक से खाया करें। अब उपवास बन्द कर दें।
कब तक संभालूं यह देह, अब मिट्टी होने का समय है।

दवाओं के असर से वे धीरे-धीरे नींद में डूब गईंसुमेधा को ममता हो आई एकाकी, वृध्दा साध्वी परनंगे फर्श पर सोई शांताजी बडी निरीह लग रही थीं मन तरल हो उठापर यही तो सन्यास है, वैराग्य है जीवन भर त्याग, फर्श पर सोना, भिक्षा ले अंजुरी में खाना, नंगे पैर यात्राएं करना  और अंत में एकाकी वृध्दावस्था? मन ने चाहा इन्हें हवेली ले चले और पूरी देखभाल करे आखिर पुखराज हार्टस्पेश्लिस्ट हैंलेकिन धार्मिकता को चुनौती देने और आहत न करने की पुखराज की सख्त हिदायत याद आ गईवह एक घण्टे बाद बी पी फिर से लेने की प्रतीक्षा में वहीं बैठ गई। स्थानक का फर्श ठण्डा था और वातावरण एकदम शान्त

हवेली की चहल-पहल से दूर स्थानक में सचमुच समस्त तनावों को हर लेने वाली शांति और सुकून हैअगर अन्य कुछ आधारहीन से बंधन न हों तो क्या बुरा है वैराग्य? जैन मतावलम्बी मुनी और साध्वियां सही मायनों में वैराग्य लेते हैं, अन्य आडम्बरी साधुओं की तरह महज आडम्बर, प्रचार, ऐश्वर्यमय जीवन तो नहीं जीते साधु के दिखावटी बाने के साथ ऐसी ही बातें सोचते हुए सुमेधा कुछ पलों को अपनी प्राइवेसी और ठण्डे फर्श का आनंद ले रही थी कि एक क्षीण सी पदचाप के साथ एक दुबली-पतली सुन्दर तेजोमय चेहरे वाली साध्वी आईंसुमेधा के प्रणाम के उत्तर में आर्शिवचन दे कर वहीं पास बैठ गईंब्रह्मचर्य के कठिन व्रत से मानो उनकी वय स्थिर होकर रह गई थीकाली-काली शान्त आँखे, स्निग्ध त्वचा। प्रथम दृष्टि में अनायास उन्हें देख पश्चाताप में डूबी रत्नावली का सा भान हुआमानो रूपमती देह के मोह की व्यर्थता का ताना मार किसी तुलसी को हमेशा के लिये खो चुकी होंथोडी देर चुप बैठने के बाद वे संकोच कर बोलीं

''मंदा ने बताया तुम डॉक्टरनी हो , बेटा एक तकलीफ है।''
''
कहिये? ''
''
नि:संकोच कहिये महाराजसा, मैं औरतों की ही डॉक्टर हूँ।''
''
कई दिनों से सीने में एक गाँठ सी है।''
''
दर्द होता है उस गाँठ में?''
''
नहीं दर्द तो नहीं होता, पर काँख तक बढ ग़ई है तो हाथ उपर नीचे करने में तकलीफ होती है।''
''
महाराजसा ये तो सीरीयस बात है, आप अभी चैकअप कराईये। हाँ अभी।''

दर्दहीन गांठ की गंभीरता को सुमेधा से अधिक कौन समझ सकता था? घने संकोच के साथ उन्होंने चैकअप करवाया, अच्छा संकेत तो नहीं था, पर तुरंत इलाज शुरू करने पर स्थिति को संभाला जा सकता था

'' मैं दवा भिजवा दूंगी अगर साधारण गांठ हुई तो ठीक हो जाएगी और अगर.. ''
''
और अगर क्या?''
''
दवा से ठीक नहीं हुई तो आपको बडे शहर में जाकर टेस्ट और फिर इलाज करवाना होगा।''
''
बेटा मुझे तो तेरी ही दवा से काम चलाना होगा, मेरा भाग्य जो तू स्थानक में आ गई, दवा मिल जाएगी। हमें तो रोगों से भी अकेले जीतना होता है, न जीते तो नश्वर देह ही तो है।''

उनके स्वरों में न जाने क्या था तिक्तता या वैराग्य? सुमेधा समझ न सकीफिर भी उसने अंतिम प्रयास किया, महाराज सा, अस्वस्थ रह कर धर्म का निर्वाह कैसे होगा, बाद में यह गांठ बढ क़र बहुत तकलीफ देगीमेरी मानें आप, मैं आठ-दस दिन बाद उदयपुर जा रही हूँ। मैं वहीं पढती हूँ मेडिकल कॉलेज में, आप मेरे साथ चलें कुछ टेस्ट करवाएं और इलाज होने तक वहीं रहें।वहाँ भी स्थानक तो होगामैं आपके पास आती जाती रहूँगी

''असंभव सी बात है यह। उदयपुर स्थानक तो मैं जा कर रहती हूँ। पर अस्पताल जाना नहीं बेटी।''
सुमेधा लौट आई उसके बाद दो-तीन बार और स्थानक गई शांता जी तो ठीक हो रही थीं, और आर्शिवचनों से उसका आँचल भर देतीं थीपर उन दूसरी साध्वी जी को मैमोग्राम करवाने के लिये न मना सकीउसने पुखराज को भी कहा, मम्मी जी को भी पर सब असमर्थता व्यक्त कर के रह गए, धर्म, त्याग, वैराग्य की आचारनीति में उलझ कर रह गया प्रश्न स्वास्थ्य का

सुमेधा स्वयं से उलझती तो सास से बात करतीउनका तर्क होता कि इतने नेम-नियम से जीने वालों को स्तन कैंसर जैसी बीमारी कैसे हो सकती है?

वह कैसे समझाती कि स्तन कैन्सर नेम-नियम नहीं देखतारिसर्च से सिध्द हो चुका है कि यह कैन्सर आनुवांशिक कारणों से भी होता है, अगर किसी स्त्री की माँ, दादी, मासी या अन्य करीबी रिश्तेदार को हुआ है तो उसे भी केयरफुल रहना चाहियेयह भी सिध्द हो चुका है कि बिना बच्चों वाली विवाहिताओं, अविवाहित महिलाओं और जरा भी स्तनपान न कराने वाली माताओं को स्तन कैन्सर होने की संभावना अधिक हो जाती हैअन्तत: उसने नियति पर छोड दिया सब कुछ

जब साध्वी शान्ता जी पूर्ण स्वास्थ्य लाभ कर एक दिन हवेली पधारीं तो सबसे ज्यादा प्रसन्नता उसे ही हुई

जून अंत के दिन थे, लम्बे फुरसत भरे दिनशाम के चार बजने वाले थे बाहर गर्म लू का असर अब भी कम नहीं हुआ था मगर हवेली के कमरे बिना कूलर के भी आरामदेह और ठण्डे थेसुमेधा अपने कमरे के जालीदार गोखडे में बैठ कर ससुर जी की लाइब्रेरी से एक बेहद पुराना सीला-सीला सा मगर क्लासिक सा दिखने वाला उपन्यास निकाल लाई थी और दोपहर से उसमें डूबी थी सास-ससुर आज सुबह ही पास के कस्बे में किसी शादी में गए थेपुखराज आकर न जाने कब चम्पालाल से खाना लगवा कर खा कर भी न जाने कब अपने क्लिनिक चले गए थे, वहाँ से उन्हें नए अस्पताल की साईट पर भी जाना था

उपन्यास रोचक था, किसी पुराने क्लासिक ऑथर हॉथोर्न का था, शीर्षक था द स्कारलेट लैटर एक स्त्री को चरित्रहीन साबित कर प्रीस्ट उसे चर्च के नियमानुसार चरित्रहीनता का प्रतीक सुर्ख लाल रंग के धागों से कढा हुआ अंग्रेजी वर्णमाला का अक्षर ए अपने कपडों पर पहनने को और कस्बे की बाहरी सीमा में अपने तीन बच्चों के साथ रहने का फरमान जारी कर देता हैजबकि वह स्वयं कस्बे के उन तमाम सफेदपोशों की तरह ही उस गरीब स्त्री के चारित्रिक पतन में बराबर से शरीक रहा होता हैतो यूरोप भी इन सब सडी ग़ली मान्यताओं से घिरा था एक समय में?

तभी बडे दरवाजे की सांकल बजी, लगता है चम्पालाल भी आढत पर चला गया हैसुमेधा ने गोखडे से झाँका पर गली में उसे कोई नहीं दिखा, एक बार और खडख़डाहट सुन वह उठी और नीचे उतार आईलकडी क़े विशाल द्वार में बना एक छोटा खिडक़ी नुमा दरवाजा खोला, सामने मुनि सागरचन्द्र जीअब सुमेधा दुविधा में, क्या करे कह दे कोई नहीं है! या ये भिक्षु का अपमान होगा, वाद में सब नाराज हो गए तो!

पधारिये महाराजसा

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