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  दूसरा ताजमहल

हवाई जहाज में बैठी नयना किसी परिंदे की तरह सहमी और निराश थीजिसको उडान भरते हुए बीच में ही बहेलिये ने झपट लिया थानियति का यह खेल उसकी समझ में नहीं आया

दिल्ली पहुँच कर वह हवाई जहाज क़ी सीट पर बेहिस सी बैठी रहीभीड छंटने पर एयरहोस्टेस ने उसकी हालत देखी और पास आकर बोली, '' मैम, आपकी मदद कर सकती हूँ? ''

'' नहीं मैं ठीक हूँ।''

बडी देर तक वह कुर्सी पर बैठी खाली नजरों से मुसाफिरों को बाहर निकलते देखती रहीउसके दिमाग से सब कुछ पुछ सा गया थाकौनसा घर, कौनसा शहर और कौनसा पता जहाँ उसको जाना था?

एयरहोस्टेस ने उसकी अटैची निकाली वह उठी, सीढियां उतरी और इमारत में दाखिल हुईप्रिपेड टैक्सी काउंटर पर वह बडी देर तक चुप रहीफिर बडी मुश्किल से उसने सडक़ का नाम बतायाटैक्सी पर बैठी तो लगा सर के अन्दर झनझनाहट सी हैघर का नम्बर याद ही नहीं आया टैक्सी बडी देर तक उस सडक़ पर दांये बांये घूमती रही फिर ड्राईवर ने झुंझला कर कहा कि मेम साहब, मुझे घर भी लौटना हैनयना की चेतना लौटी बहुत देर तक ढूंढने के बाद उसने पर्स से अपना विजिटिंग कार्ड निकाला और बडी क़ठिनता से पता पढाघर पहुंच कर उसको अजीब घुटन का अहसास हो रहा थासर में शदीद दर्द उठ रहा था उसकी हालत देख कर नौकर परेशान थे वह सर दोनों हाथों से पकडे बेडरूम में जा बिस्तर पर लुढक़ गयी

सारी रात नयना के दिमाग में फोन की घंटी घनघनाती रहीउसी के साथ रोजी क़े शब्द तपकन बन उसके दिल को मसलते रहे, '' मुझे कभी कभी लगता है कि सर अपने सारे दु:खों को नशे की हालत में तरतीब दे लेते हैंबडे बडे प्राेजेक्ट तक, जो उनकी अभिलाषा रही है, मगर पूरे नहीं हो पायेअनजाने में ही सही मुझे उनका यह अन्दाज बडा निर्मम लगाआपको देख कर मैं समझ सकती हूँ कि आपका विश्वास कहाँ पर टूटा हैप्लीज मैम हो सके तो सर को भूल जाईये।।'' एयरपोर्ट पर विदा देते हुये रोजी ने बहुत धीमे सुर में कहा था

नयना को अच्छी तरह याद है कि वह जून का तपता महीना था, जब उसकी मुलाकात रविभूषण से हुई थी, शादी की उस पार्टी में ढेरों मर्द - औरतों का जमघट थाकुछ चेहरे जाने पहचाने थे कुछ कुछ अजनबी थेउन्हीं में से एक चेहरा रविभूषण का थाकुमकुमों की रंगीन झालरों से सजे पेड क़े पास खडा वह बेतहाशा सिगरेट फूंक रहा थाधुंए से डूबा उसका चेहरा उसे और भी रहस्यमय बना रहा थाजब किसी के परिचय कराने पर उसने होंठों में सिगरेट दबा कर परम्परागत अंदाज से दोनों हाथ जोडक़र नमस्ते की तो, नयना को हल्का सा झटका महसूस हुआवह हलो या हाय की आशा कर रही थी मगरउसने गौर से रविभूषण को देखा, चेहरे पर खोयापन, माहौल से लापरवाह उसकी बडी बडी आँखें अपने ही सिगरेट के धुंए से अधमुंदी हो रही थींउसने संवाद शुरु करना चाहा, मगर जाने क्यों रुक गयीवह भी खामोश खडा सम्पूर्ण वातावरण का जायज़ा लेता रहानयना को वह आदमी कुछ अलग सा लगा, बल्कि यूं कहा जाये कि उस आदमी के व्यक्तित्व से कोई और शख्स अन्दर बाहर होता नजर आ रहा था, भीड क़े बावजूद नयना की नजरें कई बार रविभूषण पर पडीं

रविभूषण से नयना की यह पहली मुलाकात बडी सरसरी सी थी सो धुंधला गयीमगर चंद माह बाद जब लंच पर उससे दूसरी मुलाकात हुई तो वह गुमनाम चेहरा गर्द झाड क़र साफ नजर आया सिगरेट, धुंआ, खोयापन और लापरवाह अन्दाजचूंकि यह बिजनेस लंच था सो बाकायदा परिचय हुआ और कार्ड का आदान प्रदान भीनयना ने तब जाना कि एक साथ दो व्यक्तित्व की झलकियां दिखाने वाला यह इंसान बंबई शहर ही नहीं बल्कि देश का जाना माना वास्तुविद् रविभूषण है तो उसने रवि से अपनी पहली मुलाकात का कोई जिक़्र नहीं कियारवि को वैसे भी कुछ याद नहीं था, वरना वह कह सकता था कि हम पहले मिल चुके हैंइंटीरियर डेकोरेशन को लेकर यह मीटींग बम्बई के मशहूर उद्योगपति द्वारा बुलवाई गयी थी उसके पोते का ऑफिस जिसको रवि ने डिजाईन किया था, वह ईंट गारे की मदद से बन कर अब साकार रूप ले चुका थाउसकी सजावट को लेकर सलाह मशविरा चल रहा थालंच के बाद कॉफी पीते हुए नयना को रविभूषण बहुत हँसमुख व मिलनसार आदमी लगाखासकर काम को लेकर उसका नजरिया और राय जानकर महसूस हुआ कि इतनी शोहरत पाने के बावजूद आदमी काफी सुलझे स्वभाव का है, दंभ या ओछापन उसमें नहीं है

नयना को दूसरे दिन दिल्ली लौटना था वह लौट आईसप्ताह भर बाद उसको रविभूषण का फोन मिलाबस यूं ही हालचाल पूछने की नीयत से और नयना को उसका बात करना बुरा नहीं लगापांच मिनट की यह बात अगले सप्ताह दस मिनट में बदली तो नयना को कुछ अटपटा सा लगा, बात में वही दोहराव थाऔपचारिकता के अतिरिक्त कोई और स्वर की गुंजाईश नहीं थी, क्योंकि वह एक इंटीरियर डेकारेटर जरूर थी, मगर रविभूषण जैसे आर्किटैक्ट से वह क्या बात कर सकती थी? जब तीसरा, चौथा फोन आया, तो नयना सोच में पड ग़ई कि आखिर बिना किसी योजना पर बात किये यह बार बार क्यों फोन कर रहा है! फिर ख्याल गुजरा, शायद उसको कोई बडा प्रोजेक्ट दिल्ली में मिला हो और उस सिलसिले से वह सम्वाद की भूमिका बना रहा होआखिर बंबई शहर का मामला है, दो शहर के बीच दूरियां काफी हैं मगर एक प्रोफेशनल को तो साफ साफ बात करना ज्यादा पसन्द आता है, फिर? इस फिर का जवाब नयना के पास नहीं थावह फोन करने के लिये मना भी नहीं कर सकती थी, आखिर वह देश का सम्मानित वास्तुविद् था और बेहद शालीन स्वर में बातचीत करता थास्वयं नयना सारे दिन अपने ऑफिस में नये नये लोगों से प्रोजेक्ट को लेकर मिलती थीआखिर उसका काम ही ऐसा था मगर बिना काम के फोन का मौसम तो कब का बीत चुका है, वह स्कूल के दिन जब दोस्तों से बातें ही खत्म नहीं होती थीं, उन दिनों के मुकाबले में आज कम्प्यूटर का दौर है, जहां सम्वेदनाओं के लिये समय ही नहीं बचा है

वह अगस्त का उमस भरा महीना था, जब रविभूषण किसी मीटिंग के सिलसिले में उसके शहर आया थापता नहीं क्यों नयना ने महसूस किया कि रविभूषण काम का बहाना बना केवल उससे मिलने आया हैदिमाग के इस शक को यह कह कर उसने झटक दिया कि यह बेवकूफी का खयाल उसको टेलीफोन पर होती बातों के कारण आया है, वरना एक व्यस्त आदमी बिना कारण यात्राएं नहीं करता हैमगर वह आँखे उनकी भाषा क्या अलग सी इबारत की तरफ इशारा नहीं कर रही थी? शाम की चाय पीकर जब रविभूषण उसके बंगले से निकला तो पोर्टिको में आन खडी हुईजाते जाते रविभूषण ने उसकी तरफ मुडक़र देखा और उसने हाथ उठा कर बाय कहा, फिर चौंक कर उसने अपने उठे हाथ के नर्म इशारे को ताका और नजर उठा कर जो रविभूषण की तरफ देखा, तो धक् सी रह गईउन आँखों में सम्मोहन थागहरा आकर्षण! उसने हाथ नीचे किया और स्वयं से पूछा, कहीं यह तेरा भ्रम तो नहीं है नयना?

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