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लघु
कथा मिसेज पाल एबॉर्शन के बाद होश में आईं तो उन्हें लगा कि उनके भीतर का सब कुछ मर गया है। यों तो यह सब उनकी और मिस्टर पॉल की मर्जी से ही हुआ था। दोनों पहले से ही सोच बैठे थे, पहले एल् लडक़ी है, इस बार लडक़ा ही होना चाहिये। लडक़ा होगा तो परिवार भी पूरा हो जायेगा और वह कुलदीपक भी बना रहेगा। अल्ट्रासाउंड की रिर्पोट मिलते ही जब पता चला कि इस बार भी लडक़ी हुई है तो मिसेज पॉल एबॉर्शन के लिये तैयार हो गईं। जाने क्यों, कई बार वक्त निकल जाने के बाद व्यक्ति की आंखें खुलती हैं। जैसे जैसे मिसेज पॉल को होश आता चला गया, उनके सामने बडे भाईसाहब का चेहरा उभरता चला गया। विवाह के बाद किस तरह से वे पूरे परिवार से कटते चले गये थे। यहां तक कि मां बाबूजी के जीते जी उन्होंने अपने हिस्से की मांग कर डाली थी। इसी गम ने तो बाबूजी की जान ले ली थी। यह तो बडी दीदी थी जिन्होंने इस घर को संभाल लिया था। मिस्टर पॉल कह रहे थे, अच्छा हुआ इस मुसीबत से छुटकारा मिल गया। लेकिन मिसेज पॉल को लग रहा था, उन्होंने अपनी बच्ची की ही नहीं एक सहारा बनने वाली बहन की भी हत्या कर दी है।
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विकेश निझावन |
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