तूफान - 2

'' क्या क्या मिला ससुराल से?''
पति से फिसलकर वह उनके परिवार पर आ गई।
'' मतलब! हमने तो अपनी गृहस्थी स्वयं बसाई है,
उसकी तरह।'' डाल पर बैठी चिडिया की तरफ इशारा करके कहा मैं ने।
'' तो क्या गरीब थे तुम्हारे ससुराल वाले?''
'' नहीं! हमें लेने की आवश्यकता ही नहीं पडी।''

मेरी सहेली का खिलखिलाता चेहरा बुझ गयाउसकी आंखों में मचलती चंचलता की कौंध लुप्त हो गयी श्वेत रंग की कीमती साडी में उसका व्यक्तित्व बेहद निखरा हुआ लग रहा था कितना तो बदला था उसने स्वयं को कस्बाई संस्कृति बातचीत तथा जीवन शैली से दूर वह एकदम सुसंस्कृत समाज का हिस्सा लग रही थी उसकी भरी हुई गरदन में मोटी सी चेन, हीरे का लॉकेट ह्नगोल भूरी कलाइयों में कंगन और कानों में हीरे के टॉप्स पहने वह अब भी ताजातरीन फूल की तरह महकती हुई लग रही थीतीन बच्चे होने के बाद भी उसने अपने स्वास्थ्य तथा फिगर का ख्याल रखा था। झाँई झुर्रियों से साफ चमकता हुआ उसका चेहरा उसके आनन्दपूर्ण जीवन को प्रदर्शित कर रहा था उसको यूं हंसती मुस्कुराती मुक्त निर्भय देख कर मुझे अपार प्रसन्नता हुई अन्यथा जहाँ देखो वहाँ लडक़ियां ससुराल से तंग और परेशान रहती हैंया असमय ही बीमार और बूढी हो जाती हैं

'' और क्या क्या किया? मकान बनाया? प्लॉट तो खरीदा ही होगा। '' अब वह व्यक्तिगत बातों से निकल कर परिवार की व्यवस्था को टटोल रही थी। उसके भीतर अनुभव का समुन्दर जो समाया हुआ था।
'' नहीं, दोनों में से कुछ भी नहीं है मेरे पास।''
'' तब क्या किया तुमने?'' वह तुनक कर बोली, '' दोनों कमाते हो फिर भी अब तक मकान नहीं बना सकीं। क्या तुम्हें घिन नहीं लगती इस पुराने खंडहर होते मकान में रहते हुए? देखो तो कितना गन्दा है चिपचिपाता हुआ। छि: तुम सांस भी कैसे ले पाती होगी।'' वह आश्चर्यमिश्रित विराग भाव से बोली। मैं ने परदे हटा दिये। उजाले का टुकडा कमरे को जगमग करने लगा। मैं तो सोच रही थी कि वह मेरा कलात्मक ढंग से सजा हरा भरा फूलों से खिला घर देखकर मुग्ध हो जाएगी मगर।
'' बैंक बैलेन्स तो होगा कितना जमा कर लेती हो साल भर में? ''
'' अभी तक हिसाब नहीं लगाया। कुछ एल आई सी की पॉलिसी हैं उसीके बहाने जमा हो जाता है।''
'' झूठ बोल रही हो या बताना नहीं चाहती हो, कितने करोड क़ी पॉलिसी ले रखी है।'' उसने तीखे व्यंग्यात्मक लहजे में कहा।

मैं हताश सी बाहर देखने लगी। जहाँ चिडिया गेहूँ के दाने चुग रही थी

'' और गोल्ड कितने तोला मिला था? जो पहना हुआ है असली है या नकली?

मैं एक सवाल का जवाब देती तब तक वह दूसरा सवाल दन्न से दाग देती उसके पास सवालों का खजाना था और वह खजाना फूलों से नहीं वाणों से भरा था

'' सब असली है।'' मैं ने न चाहते हुए भी सहज होकर कहा।
'' यह अंगूठी भी?'' वह अचरज से बोली जैसे मुझ प्लॉटविहीन, मकानविहीन के पास हीरे की अंगूठी होना अनहोनी बात हो या होनी ही नहीं चाहिये।
'' हाँ।''

कह तो दिया मगर मेरा सारा उत्साह ठण्डा पडने लगाचिडिया वहां से उड चुकी थीकुछ सूखे पत्ते बरामदे में हवा के संग इधर से उधर उड रहे थेमैं तो दूसरी ही बातें करना चाहती थीआज की नहीं...इस जिन्दगी की नहीं, इन सम्बन्धों की नहीं...अपितु उनकी जो छुपी पडी थीं काल की कन्दरा में, जिनमें जीवन का निथरा सौंन्दर्य तथा खुश्बू थी मगर यहाँ तो उन बातों की उन राग रंगों की झलक तक न थी

'' और हस्बैण्ड के साथ तुम्हारी कैसी बनती है? झगडे होते हैं? पहल कौन करता है?'' अब वह पति पत्नी सम्बन्धों पर आकर एक चिन्तक की मुद्रा धारण करके पूछ रही थी।
'' यह तो स्वाभाविक बात है। विचारों में तो मतभेद होता ही है जीवन की मूलभूत बातों को लेकर हमारा मतैक्य है। वैसे हमारी रुचियां समान हैं, संगीत सुनना, नाटक देखना पुस्तकें खरीदना। सच हमारे तो प्राण बसते हैं इन सबमें।'' मैं बडे उत्साह से बताने लगी।
'' ये कोई बात हुई। पुस्तकें खरीद कर क्या करोगी? चाटोगी क्या? कल के दिन कोई मुसीबत आ गई तो क्या करोगी? जमीन जायदाद होगी तो काम आएगी वक्त पर। ये तो कौडी क़े भाव भी नहीं जाएंगी।'' वह मेरे क्षणिक उल्लास को मुट्ठी में भींचते हुए निचोडते हुए बोली।

ओह! मैं ने कभी सोचा ही न था न ऐसा गणित बैठाया था उसने जीवन के अंतिम छोर पर खडी मृत्यु से मेरा सामना करवा दियाजीवन की लहराती नाचती...विराट... आलोकमयी ॠतु में अंधकार...आंधी तथा विपदाएं भी आ सकती हैं, इनका तो हमें अहसास तक न थाअब तक तो जीवन दौड रहा था द्रुत गति से निरापद, निर्द्वन्द्वपढने पढाने में आनन्द आता था, संगीत से मन की थकान दूर होती थीसमयसमाज तथा सम्पूर्ण संसार से जुडे होने का अहसास करवाती थीं पुस्तकें...बिना कुछ पढे नींद ही नहीं आती थी मगर आज ताम्बई रंग की खूबसूरत दोपहर में मेरी सहेली ने अनिश्चित भविष्य की चिन्ताओं का जाल फैला दिया थामैं ने देखा वही चिडिया आकर फुदक फुदक कर बारीक तिनके ले जा रही है

'' तुम तो निरी बुध्दू हो, जैसे पहले थीं। यह अलग बात है कि तुम नौकरी में आ गईं और मैं हाउसवाइफ बन कर रह गई। अपने अपने भाग्य की बात है। वैसे भी मेरे हस्बैण्ड को पत्नी का कमाना नहीं अच्छा लगता। उनका ईगो हर्ट होता है।'' चोट तथा कटाक्ष मेरे से हट कर अब पति के अस्तित्व तथा व्यक्तित्व पर की जा रही थी। फिर भी मैं सीधे सीधे जवाब देकर उसे मर्माहत नहीं करना चाहती थी सो टाल गई।
'' घूमने जाती हो या पूरे साल यूं ही पिसती रहती हो काम में। यह भी कोई जिन्दगी है नीरस बैरंग। कोल्हू के बैल की तरह जुते रहो।'' वह सहानुभूति जताते हुए बोली। दोपहर की उजली धूप के तमाम रंग उसके चेहरे को दमका रहे थे।
'' कई सालों से जाना नहीं हो पाया। घर की प्राथमिकताएं देखनी होती हैं।''
'' घर न हो गया खूंटा हो गया।'' उसने तपाक से कहा मुझे लगा कोई वजनदार चीज ग़िरी हो  दिल को प्रकम्पित करने वाली...ध्वनि अन्दर तक उतर गई।
'' सर्विस में हो कोई बॉय फ्रेण्ड तो होगा ही या कभी था?'' उसने अचानक ही विषयान्तर करते पूछा। अब वह घर से उछलकर बाहर की दुनिया को छू रही थी और देखना चाह रही थी कि मैं उस दुनिया में कहाँ हूँ? कैसी हूँ...क्या कर रही हूँ, उड रही हूँ या एक ही वृत्त पर बैठी विवश आहें भर रही हूँ।
'' यह उम्र पुरुष मित्र बनाने की नहीं, परिवार के लिये समर्पित होने के लिये होती है। लेकिन पुरुष कोई दुश्मन या जानवर नहीं होते कि उनके विषय में अलग से सोचा जाए।''
'' लगता है तुमने भाषा विज्ञान में पी एचडी की है इसीलिये इतनी घुमावदार बातें करके बात को ही उडा देती हो।'' अब वह मेरे बिलकुल पास खिसक आई और कान के पास मुंह ले जाकर बोली,
'' अच्छा ये बताओ तुम्हारी हस्बैण्ड के साथ कैसी बनती है, तुम उनसे संतुष्ट हो - मतलब तुम्हारे आन्तरिक सम्बन्ध कैसे हैं? कभी तुम पहल करती हो या नहीं? कौनसी बातें या चीजें ज्यादा लुभाती हैं तुम्हें और उन्हें। हमें तो लगता है इस आपाधापी भरी जिन्दगी में इन बातों के मायने भूल गई हो जबकि ये सम्बन्ध बहुत अहम होते हैं। तुम तो इतनी शर्म और संकोच जता रही हो कि बताओ नकुछ भी नहीं बताना चाहती हो क्यों?'' वह एकाएक गंभीर हो गई। उसकी मुखमुद्रा में कई वक्र रेखाएं तिनकों की तरह कांप रही थीं।
'' तुम तो बडी बोर निकलीं जबकि हम तो समझते थे कि तुम सर्विस में होने के कारण काफी स्वतन्त्र विचारों वाली हो गई होगी। यहाँ आकर तुम्हें कोई मिला था मतलब प्रेम हुआ था किसी से या इन्हीं के साथ बांध दी गईं? ''

मुझे काटो तो खून नहींपूरी देह सिहर गई शर्म की तपिश से संकोच की आंच से यकायक इस हमले से निजी बातों को यूं जगजाहिर किया जाये, यह मेरे लिये अजीब बात थी

'' क्यों नहीं बताओगी? इस तरह की बातें तुम किसी के साथ तो शेयर करती होगी। मुझे तो तब तक चैन नहीं मिलता, जब तक कि मैं आपस में शेयर न कर लूं। वाकई मैं ने क्या सोचा था तुम्हारे बारे में और तुम क्या निकलीं। हमें तो साफ लग रहा है कि तुम पति की पूंछ और बच्चों के साथ चिपकी रहने वाली आया मात्र हो। जीवन का आनन्द लेना नहीं जानतीं। तुम जीवन को नहीं जीवन तुम्हें निचोड रहा है। कभी स्वयं को देखा है आयने में। देखो गौर से। खुली आंखों से। दिन में दिखाई देने वाले चन्द्रमा की तरह हो गई हो रूखी..शुष्क...दूर...अलग थलग।'' कह कर वह विद्रूप और व्यंग्य से हँस दी।

उसकी निर्मम उत्ताल लहर सी हंसी मेरी अन्तरात्मा में उतर गई मुझे अपने हृदय में गुब्बारा सा फूटता लगा, फस्स फस्स उसके चमकते हुए दांतों को देखकर भी मैं मुस्कुरा न सकीमुझे लगा जैसे कोई पेड क़ी छाल को बेरहमी से भोंथरी छुरी से छील कर उसका रस निचोड रहा होमैं ने आंखें बन्द कर लीं तेज धूप चुभ रही थी

'' तुमने तो अपने आस पास एक खोल बना रखा है। जिसमें से निकलना ही नहीं चाहती हो। तुम क्या समझती हो तुम्हारा हृदय सीपी है जिसमें से मोती निकलेंगे। मोतियों की चमक तो छोडो, तुम्हारी आंखों का सूनापन और वेदना का भाव बताता है कि तुम अपने भीतर कैद हो। कुण्ठित हो। सहज बनो। आम औरतों की तरह।'' उसने विश्लेषण कर फैसला देते हुए कहा, ''तुम क्या समझती थीं मैं बहुत प्रभावित हो जाऊंगी यह सब देख कर। नहीं, मैं वो नहीं हूँ। मेरे ऊपर ये बनावटी रंग नहीं चढते।'' उसने शरारती बच्चे की तरह चिढाते हुए कहा।

मैं निरुत्तर सी उसकी बातें सुनती जा रही थीक्या बताती उसे कि जीवन के रंग उसकी गंध उसका पराग...आनन्द और सुख कहाँ...किस रूप में बिखरे पडे हैंयह तो अव्यक्त अनुभूति है अन्तरतम में डूबा हुआ जीवनानुभव है और वे परागकणों से बनी हुई दीवारें हैं, जिनमें बाहर - भीतर का निषेध थावह लगातार जगह जगह से मेरे शरीर को छूकर गुदगुदाकर इशारे करके एकमात्र विषय पर आकर अटक गई थीउसका अंतिम अस्त्र यहीं से छूटना शेष थाउसके हाथों में मेरा हाथ थाउसकी पकड से ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वह शर्त बांधकर बैठी हो और उसके लिये ये बातें किसी रहस्यमयी वस्तु से कम चमत्कृत व उत्तेजित करने वाली नहीं होंगी

'' बताओ न क्यों नहीं बताना चाहती हो? दिशा तो एक एक बात बता देती है। तुम क्यों नहीं बताना चाहती हो? क्या तुम अलग हो हमसे? अनोखी हो? मैं ने जितनी भी बातें पूछीं सब का गोल मोल जवाब दिया तुमने। सब ठीक तो है? पति पर निगाह रखती हो या किताबें ही पढती रहती हो।''

आह! मैं न चाहते हुए भी सोचने पर विवश हो गई कि भौतिक सुखों की विपुलता में यदि मानसिक तथा बौध्दिक विकास पूरा न हो तो मनुष्य की सोच सिर्फ बाह्य सुख साधनों तक सिमट कर रह जाती है और दैहिक सुख उसकी कसौटी बन जाते हैं उसने मेरा हाथ झटका तो मैं चौंक पडी -

'' मत बताओ।''
'' कुछ हो तो बताऊं। हमारा जीवन एकदम खुला हुआ है। जो है जैसा है उसी में ऊपर वाले का हार्दिक धन्यवाद देते हुए खुश रहते हैं।''
'' तो ऊपरवाले ने क्या दिया तुम्हें ? जीवन की उपलब्धियों के नाम पर क्या है तुम्हारे पास? ढेर सी किताबें, जो रद्दी के भाव बिकती हैं। ये सुन्दर शब्द जो खोखले हैं। वे मूल्य जो बासी पड चुके हैं। बेहद गैरजिम्मेदार हो तुम। एकदम अपने में डूबी। बन्द डिब्बी की तरह।''

वह लगातार बोलकर मुझे कम से कमतर आंक रही थीमुझे काट रही थीप्याज क़े छिलकों की तरह एक के बाद एक परत उतारती जा रही थी मैं उसकी नजरों में नाकामयाब मूर्ख तथा सीधी थी जिसने जीवन को नहीं समझा था, जीवन का सत्य नहीं पहचाना

'' तुमने तो मकान बनाया है, पर रहती हो क्या उसमें? जहां तुम्हारे हस्बैण्ड की पोस्टिंग होगी वहीं तो रहोगी।'' मैं ने समझाना चाहा उसे ताकि वह मेरी ओर से पूर्ण निराश होकर न जाये।
'' पर बना तो लिया है। चिन्ता तो नहीं रहेगी। कभी भी जाकर रह सकते हैं। किराये का पैसा मिल जाता है। मकान मालिकी का रुतबा रहता है सो अलग। भई हम तो परमात्मा को नहीं पति की कमाई को धन्यवाद देते हैं।''

वह अपनी सफलता पर गर्व से भर कर बोलीउसके चेहरे पर टमाटर का रंग उतर आया था

मुझे चारों तरफ सघन सन्नाटा तथा उस सन्नाटे में घुले अवसाद की अनुभूति होने लगीचिडियाँ जा चुकी थीं और वह जगह खाली पडी बेरौनक लग रही थीमैं चुप हो गई पराजय का बोध मेरे हृदय को स्पर्श करने लगाअफसोस तो इस बात का हो रहा था कि वर्षों के उपरान्त मिली सखि को मैं खुश नहीं कर पा रही थीमेरी उपस्थिति...मेरा व्यक्तित्व...मेरे पद की गरिमा  मेरी गृहस्थी  मेरे बच्चे  मेरा शहर किसी ने भी उसे जरा सा भी सुख नहीं दिया थाहमारा मन भी तो कैसा होता है जो खुशियों की खोज में बाहर घूमता हैउडता है तितली की तरह और बाहर हासिल होता है...दु:ख अभीप्साएं असन्तोष! मैं क्या करुं? स्कूल के दिन सिर्फ दिन नहीं थे जीवन के खूबसूरत हिस्से की पूंजी थे जिन्हें समेटकर वह आई थी, लेकिन अब सब धुंधला और उडता हुआ लग रहा थावह क्यों नहीं समझती कि जीवन एक बहती धारा है, जिसके किनारों पर फूलों की क्यारियां ही नहीं होतीं, बबूल के वृक्ष भी होते हैं लेकिन दुर्भाग्य कि मेरी सखि को मेरा जीवन ठहरे तालाब के पानी के समान लग रहा था जिसमें न कोई उत्तेजित रौरव करती तरंगें थीं न स्वतन्त्र बहाव के रास्ते निरर्थक था सब वह ऊब गई थी - बोर हो गई थी मेरे साथमेरी बातें मेरा वर्तमान सबकुछ शुष्क तथा अधखिला लग रहा था

'' बहुत ज्यादा बोर कर दिया तुमने तो। मैं वापस होटल जाऊंगी।''
'' कहीं घूमने चलो न या किसी होटल में खाना खाने।'' फिर भी मैं ने मुस्कुरा कर कहा।

लेकिन वह रुकी नहींदूसरे दिन मैं उसको स्टेशन पर मिलने गई

''तुम कब आओगी? अरे तुम क्यों आने लगीं? तुम्हें मतलब क्या है हमसे? उसने फिर मुझे कचोटा।
'' जरूर आऊंगी।यकीन करो। कहीं भी जाने से पहले सब कुछ जमाना पडता है।'' मैं इधर उधर देख कर बोली मगर वहतैश में आकर बोली, '' हाँ तुम्हीं अकेली तो नौकरी करती हो''
'' अब तुम्हारा आना कब होगा?'' मैं ने उसका हाथ छूते हुए कहा।
'' जब तक कि तुम्हारा मकान नहीं बन जाता, गाडी नहीं आ जाती तब तक मैं नहीं आऊंगी।'' उसने मुझे धमकाते हुए अपनी चिरपरिचत शैली में कहा।
'' मकानगाडी! तो क्या तुम मकान और गाडी से मिलने आओगी? चलो इसी बहाने सही इस बारे में सोचूंगी।''

मैं ने हंसते हुए अपने मनोभावों को बल्कि वेदना को छुपाते हुए कहा जबकि मैं जानती हूँ कि आने वाले कई वर्षों तक मेरे लिये इन चीजों के बारे में सोचना व्यर्थ है क्योंकि मेरे लक्ष्य और सपने कीं और हैं - कुछ और हैं - न मेरे पास ये चीजें होंगी न तुम आओगी जानती हूँ तुम्हारा स्वभाव ऐसा ही थादूसरों पर हावी होकर अपनी बात मनवानामेरा मन गहरे विषाद में डूब गयाबात दिल की नहीं वस्तुओं की हैतब से लेकर अब तक वह इन्हीं बातों की पगडण्डियों पर चल रही हैआत्मा से निकले दोस्ती के भावों को कुहासे ने ढक लिया थाट्रेन का समय हो गया थामैं गले लगी तो मुझे उसके हृदय की वही ध्वनि सुनाई दी जो गहरे कुंए में खाली बाल्टी डालने पर गूंजती हैमैं ने उसका हाथ छोड दिया और पर्स में रखी अपनी किताबें टटोलीं, जो मैं उसे भेंट करना चाहती थीलेकिन याद आया, किताबों के बारे में तो उसने कहा थाइन्हें क्या चाटोगी? इतनी किताबों के बदले कुछ और खरीद लेतींये तो दो तीन रूपये किलो के भाव बिकेंगी या दीमक खा जायेगी

मैं ने जोर से अपना पर्स पकड लिया जैसे कोई हीरे जवाहरात संभालता हैमैं ने देखा उसने सीट पर बैठते ही अनमना सा चेहरा बना लियाकुछ बोली नहीं आंखों पर चढाया चश्मा उसकी सुरमई आंखों के भाव छुपा रहा थापता नहीं क्या देखने या पाने या उडलने या जताने आई थी ट्रेन के जाते ही मैं भीड से गुजरते हुए लौट पडी अपनी उसी दुनिया में, जहाँ जीवन के सत्य और संघर्ष खडे थे अनायास ही मैं मुस्कुरा दी, लगा कोई तूफान मेरे ऊपर से गुजर कर गया है

उर्मिला शिरीष
10, 2002

   पहला पन्ना