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मेरी कोई तस्वीर नही
दरवाजे पर मेहता आंटी को देखते ही वह समझ गयी, कि क्यूं आई हैं? अब वह उंगलियों पर गिनकर बता सकती है कि पचास साठ बडे परिवारों और फिर उसी के अन्दर पैदा हुई रिश्तेदोरयों में कौन, कब किसके यहाँ आ रहा है और किसे उसकी जरूरत पडने वाली है? जरूरत जरूरत ही तो है वह एक  आवश्यकता अनुसार लोगों की आंखों में जलती बुझतीअब तो वह सिर्फ मुद्राओं से बता सकती है कि सामने वाले को किस चीज क़ी जरूरत है और वह क्यों आया है? इस शब्द का पर्याय है वह अपने घर के लिये मोहल्ले के लियेक्या मेरी मुद्राएं किसी से कुछ नहीं कहतीं या कि घिस घिसा कर मैं एक गोल मोढा बन गई हूँ, जिसे किसी भी तरफ लुढक़ा दोवह मेहता आंटी को निकट आते देख रही है और देख रही है अपने होंठों पर एक सूखी मुस्कान फैलते
'' नमस्ते आंटी
'' उसने कहा

यूं कोई फर्क नहीं पडता, आप नमस्ते करो न करो, अब वे आईं हैं तो ले जाये बिना मानेंगी नहींकिस्मत से मिलते हैं अच्छे पडोसीवे आपके जख्मों पर ठण्डा लेप लगाते हैं आपके माथे पर हाथ फेरते हैं बीच बीच में परत उघाडक़र देख लेते हैं  जख्म सूखा कि नहींफिर तो यहां पूरे मोहल्ले ने कसम खाई हुई है अच्छा पडोसीहोने कीमोहल्ले की मदद से ही यहां सब काम साधे जाते हैं  लडक़ी की सगाई हो या शादीबच्चे का मुण्डन हो या उपनयन संस्कार, घर में मेहमान आये हों या कोई त्यौहार होआप किसी भी वक्त किसी को बुला सकते हैं, उसमें भी कुछ खास बन्दे हर जगह, हर अवसर पर मौजूद रहते हैं,उन्हें हर घर की हर चीज क़ा इतिहास पता होता है, इसी से फिर वे उनके भविष्य का निर्धारण करने सहज और आसान काम करते हैंचीज मतलब लोग

'' नमस्ते बेटा, क्या कर रही हो?'' उन्होंने अत्यन्त मीठे स्वर में कहा। मीठे सोते के पीछे होता है क्या कहीं गर्म पानी का सोता, जब यही अपने पति से झगडती है तो घर की सारी चीजें बाहर निकल कर इनकी हाथापाई के लिये खुली जगह छोड देती हैं।
''
अभी तो सुबह हुई है आंटी, देखिये न, घर कैसा लग रहा है? ग्यारह बजे तक तो सांस भी नहीं ली जाती ठीक से। '' उसने पानी की बाल्टी में सर्फ घोलते हुए कहा। पास ही मैले कपडों का ढेर पडाहै।
''
मां कैसी हैं?'' अब वे सबके लिये पूछेंगी। हालांकि हम सबकी बाबत ये हम सबसे अच्छी तरह से जानती हैं। न्यूजपेपर हैं मुहल्ले का बिना नागा, सुबह - शाम - दुपहर निकलता हैइन्हें बांच लिया, सब बांच लिया। एक बार को सूरज महाराज दस्तक देना भूल जायें किसी घर की, ये नहीं भूलतीं।

'' पडी हैं बिस्तर पर।'' उसने फुर्ती से सफेद कपडे ग़र्म पानी में डालने शुरु कर दिये। छ: साल हो गये, बिस्तर से उतर कर नीचे नहीं आईं। अच्छा रास्ता खोज लिया जिम्मेदारियों से भागने का अब रहो चिल्लाते बिस्तर पर हे भगवान मुझे उठा ले। भगवान का दिमाग खराब है? क्या करेगा तुम्हारा? रहो लौटते इसी कीचड में हम भी, तुम भी।
''
भाभी उठीं नहीं सोकर?''
वह झल्ला गयी। अब असली बात कहती क्यूं नहीं? कुछ लोग नर्म जगहों को छू देते हैं अपने गन्दे हाथों से फिर तुम खुजलाते रहो सारा वक्त।
''
उठ गयीं हैं। बबलू रो रहा है सुबह से।''

बबलू का काम है रोना, बबलू न रोये तो मांओं को किचन से छुट्टी कैसे मिले? बबलू का हंसना - रोना मां की इच्छा परकुछ करने का मन नहीं, बबलू को बात - बेबात थप्पड मार दो या चिऊंटी काट दो, उसका पसन्दीदा खिलौन छीन लोबबलू को भी मालूम है, कब रोना, कब नहीं रोनाहे भगवान, उसे नफरत से सोचा - क्या इस सब से मुक्ति मिलेगी? मेरी शादी क्यूं नहीं कर देता कोई? ये चाहते भी हैं या नहीं मेरी शादी करना? भईया हर लडक़ा यह कह कर रिजेक्ट कर आते हैं कि हमारी रेशू के लायक नहींतुम्हारी रेशू, उसके भीतर घृणा का सैलाब उठाजब मैं तुमको बरदाश्त कर रही हूँ तो किसी को भी कर लूंगी इतने लोगों की गुलामी बजाने से तो अच्छा है कि एक की बजाओवैसे भी मैं ने क्या चुना अपने लिये? खाना और कपडे तक नहींतो मैं ये कैसे चुनूंगी कि मुझे किसके साथ सोना है? जो कुछ भी खा सकता है वह किसी के भी साथ सो सकता हैअपनी सोच पर वह सहम सी गई, क्या होता जा रहा है उसे? न कोई खूबसूरत सपना, न कोई खूबसूरत सोचहर वक्त यह नफरत का ठाठें मारता समन्दर! सुबह भाभी को बिस्तर छोडते देखती है तो एक गन्दा सा ख्याल आकर चिपक जाता है मन सेकितने मजे हैं शादी शुदा औरतों के? पांच मिनट साथ सोने की भरपूर कीमत वसूलती हैंएक अच्छे खासे छ: फुटे इन्सान को लल्लू लाल बना देती हैंशादी मतलब निठल्ली, मोटी, बेकार, बददिमाग, कुचकी औरतों के जीवनयापन का मजबूत जरियाउन्हें सिखाया जाता है कि कैसे इस रिश्ते से जुडे सारे लोगों का समूचा दोहन किया जायेनहीं, सिखाया नहीं जाताहर घर में यह सर्वसुलभ है - वे रक्त में इसे लेकर पैदा होती हैं

अपने गुस्से में उसने ध्यान नहीं दिया कि मिसेज मेहता क्या क्या कह गईं इस बीचवैसे उन पर ध्यान देने की जरूरत भी नहीं रहतीवे बोलती भी आप हैं, सुनती भी आप हैंउसने कहीं पढा था, औरतें सिर्फ कान होती हैं, पुरुष सिर्फ आंखेंगलत, औरतें सिर्फ जुबान होती हैं, पुरुष सिर्फ लार
'' किसी को ऐसे दिन न दिखाये, '' पहले शायद भगवान कहा होगा
वे कहती जा रही हैं

'' छ: साल हो गये इस लकवे को, अब तो सिर्फ याद रह गई है, कैसे झमाझम चला करती थीं वो। हम दोनों तो जानबूझ कर पैदल जाते थे फिल्म देखने।''

भगवान! क्या ऐसी सचमुच की कोई चीज होती है?'' कोई रूमाल जिससे आप अपना मैला चेहरा साफ कर सकें या कोई उंगली जैसी चीज, ज़िसे तुम लडख़डाते ही पकड लोउसने तो उसी दिन इस नाम को छोड दिया था, जब भाभी को जवाब देने की सजा में भईया ने कसकर एक झापड रसीद किया था
उसने सारे भगवान एक झोले में डाले और नदी में सिरा आई
गिरते ही वे भीतर डूब गये अब वह नहीं जाती कहीं रोते हुए भीतर ही गिर जाते हैं आंसू भीतर ही जम जाते हैं बर्फ के खारे पहाड ख़डे रहते हैं भीतर, दूसरी अनछुई चीजों की तरह जो वक्त की गर्द में अपना असली रंग खो चुकी हैं

सारे कपडों को ब््राश लग गयाअब कामवाली बाई आकर फींच देगी अब वह नाश्ते की तैयारी करे बबलू अभी तक रो रहा है और दोनों उसे बहलाने के लिये घर भर में नाच रहे हैंछोटा शायद किसी काम से निकला हो ये सब ठीक उस वक्त दिखेंगे, जब वह पूरा नाश्ता तैयार कर चुकेगीकोई उसे देख ले बस, झट कोई न कोई काम टिका देगाएक वही नौकर है घर भर की कॉलेज जो नहीं जातीहर मां को दो चार लडक़ियां पैदा करके रख देना चाहियेकम खर्च में पल भी जाती हैं, बाकि वक्त काम भी आती हैं

'' तो मैं कह रही थी रेशू, कितने बजे तक निपट जाओगी इस सबसे? ''अब वे असली बात पर आ रही हैं।
''
ग्यारह बजे तक तो हो नहीं पाती आंटी। फिर आज मुझे एरीना भी जाना है।वह संभलकर बोली।
''
आज नहीं आओगी तो काम नहीं चलेगा बेटा! अब मैं भी बताओ किसको बोलूं? एक इसी फैमिली से तो मुझे इतना लगाव है। तुम्हारे अंकल की जिम्मेदारियां निभाते निभाते तो मैं तंग आ गई हूँ। रोज कोई न कोई टपक पडता है। हम गांव छोड आये पर गांव वाले हमें नहीं छोड रहे। ज्वाइंट फैमिली निभाना सचमुच अपने आपको बर्बाद करना है। लगे रहो सारा दिन। मैं तो तुम्हारी मां से भी कहती हूँ, दूसरा समझौता कर लेना पर अपनी लडक़ी को ज्वाइंट फैमिली में मत देना। मेरी मां भी बाबूजी से यही कहती थी, पर क्या हुआ, कुछ नहीं। आज देखो न, सुबह से मेरा सिर दुख रहा है और छ: लोग दुपहर के खाने पर आ रहे हैं। बेटा, मैं तेरी भाभी से बोल देती हूँ।''

भाभी से क्या बोलेंगी? वो कहेंगी, यहां का काम करो, फिर मरो जाकर कहीं भी, मुझे क्या? ब्रेकफास्ट बनने तक बबलू भी चुप हो जायेगाबबलू तीनों वक्त एकदम समय पर रोता है, जैसे अलार्म घडी बजती हैवैसे भी उसने पेट में आते ही मां का ख्याल रखना शुरु कर दियाभीतर से भी, अब बाहर से भीलगभग उसी की उम्र की है भाभी और किस्मत में फर्क देखोपांच मिनट की करामात

'' आंटी, एरीना से मैं एक बजे सीधे आपके घर आ जाऊंगी।'' जानती है, वे छोडेंग़ी नहीं। दो घंटे की यह फुरसत मिल जाती है, यही क्या कम है? फैशन डिजायनिंग कर रही है। हमेशा दूसरों के लिये तैयार की हैं ड्रेसेज। आजकल मॉडलिंग की तैयारी चल रही है। जो लडक़ियां रैम्प पर उतरेंगी, उनके लिये कपडे तैयार करना है। उसने अपने लिये कभी कुछ तैयार नहीं किया। दो ड्रेसेज ईसके पहले तैयार की थी। एक भाभी ने झटक ली, एक छोटी बहन ने।
''
तू क्या करेगी? तेरे ऊपर यह डिजायन अच्छा नहीं लगेगा।'' जाने कितनी बार सुन चुकी है वह यह सब। उस पर क्या अच्छा लगेगा, कभी सोच नहीं पाती है। न अपने बनाये डिजायन में खुद को देख या सोच पाती है। मेरी कोई अपनी तस्वीर मेरे पास नहीं है। हर आदमी के पास अपनी एक तसवीर होनी चाहिये। नंगी तसवीर। जिसे वह जैसे चाहे सजाये - संवारे। उसे कपडे पहनाये या उतारे।
हमें तो पहनाता भी कोई और है, उतारता भी कोई और ही।

मेहता आंटी चली गयीं दूसरे द्वार पर दस्तक देनेउसने आलू बना लिये हैं और अब पूरियां निकाल रही हैआज उसे जाना है और वह एक एक गर्म पराठा देने के लिये ठहर नहीं सकतीभाभी बबलू को दूध देने के बहाने झांक गयी हैं कि सब कुछ ठीक चल रहा है या नहींबबलू को दूध पिलाने के बाद वे उसे नहलाने का प्रोग्राम बनायेंगीगर्म पानी के टब में उसे देर तक बैठाये रखेंगीफिर भैया जायेंगे नहाने कमरे का दरवाजा बन्द हो जायेगा कम अज कम आधे घण्टे के लियेहम हैंन बंद कमरों का अंजाम उसने छन्न से पूडी ड़ाली और गर्म घी उछलाहाथ जल गया जरा सापरवाह नहीं, रोज क़हीं न कहीं जलता हैकोई जगह खाली नहीं

नाश्ता तैयार कर वह नहाने भागी साढे दस बज गयेकभी इतना वक्त भी नहीं मिलता कि आराम से नहा लेसोते - जागते, उठते बैठते हर वक्त में जल्दीबाल्टी भर रही है, वह जल्दी जल्दी साबुन घिस रही है, जो हाथ लग जाये वहीउसके जाने के बाद भाभी बडे राम से चन्दन का लेप पूरे शरीर पर लगायेंगी और तख्त पर लेट जायेंगी, उसके सूखने तकउनके पास से गुजरो तो चंदन की महक आती हैविषधर तभी लिपटा रहता है हमेशा एक अदद मुझे भी चाहिये, जिसे कांख में दबाये आप लेटे रहो हमेशा

आईने में उसने अपने आपको देखा सांवली - धुंधली एक तस्वीर कोई रंग नहींवह देख नहीं पाती ठीक से, डर लगता हैसुन्दरता भाग्य और आत्मविश्वास भी लाती है क्या? मुझे तो कुछ भी नहीं मिला, कुछ भी नहींउसने अपने खाली हाथों को देखा और जल्दी जल्दी उन्हें चलाने लगीवे चलते रहते हैं तो ध्यान बंटा रहता हैबाहर आकर चलते चलते दो पूडियां ठूंसी और अपनी स्कूटी पर भाग छूटी

सुबह पांच बजे से शुरु होता है यह चक्र
'' उठ रेशू उठ, पांच बज गये, देर हो जायेगी फिर
'' मां कभी प्रेम से उठातीं, कभी झिडक़ करउसे याद नहीं आता, कभी जो वह चैन से सोयी होरोज बाहर बज जाते हैं फिर रात में मां कई बार पेशाब के लिये उठातीं, हर बार उन्हें पॉट देना, पेशाब करवाना, बाथरूम में जाकर उसे धोना, लाकर रखनासुबह भी वहीटट्टी - पेशाब, नहलाना - कपडे पहनानाइतने बरस तो मां ने भी नहीं धोया होगा उसका गू मूतबेटे की शादी की कि बहू आकर सेवा करेगीपहले ही साल पहला बच्चा, वह भी बेटाऔर इस यातना का नया अध्याय शुरु

कभी - कभी वह शिद्दत से सोचती हैऐसा नहीं हो सकता कि एक सुबह वह उठे और मां को निर्जीव अपने बिस्तर पर पडा पाये सारे झंझटों से एक साथ मुक्ति देखती है, खिचडी बाल लिये, झुर्रियों से अंटा चेहराकुछ महीने पहले सिर में इतनी जूएं पड ग़यीं थीं कि सारे बिस्तर पर रेंगा करती थींबाबूजी ने सारे बाल कटवा दिये और फिर जूंए मारने वाला पावडर मलवा दिया उनके सर परदो दिन में सब साफवह टेढे मेढे बालों वाली आधी निर्जीव कुरूप सी स्त्री कितनों का जीवन तबाह किये दे रही हैकहती है रेशू की शादी के बाद चैन से मरूंगीमरो तो चैन से शादी हो किसको पडी है बेताल अपने कंधों पर ढोये एक मेरे ही कंधे दिखते हैं सबको कभी कभी रात को बाबूजी उनके कमरे में आते तो वे उसके रिश्ते की बात पूछतीं - कहां गये थे? वहां? क्या हुआ? खासकर जब वह सामने हो तब
'' अभी बात जम नहीं रही
'' वे अनिश्चित स्वर में कहते और जरा सी देर बैठ अपने कमरे में चले जातेवह उन सबको शक से देखती है, क्या वे सचमुच उसका ब्याह करना चाहते हैं? उसके बाद फिर किस की बारी है? छोटी बहन की? जब तक राक्षस का पेट है, तब तक बलि भी है

उसने अपनी मॉडल के लिये तीन ड्रेसेज तैयार की हैं, जिन्हें पहन कर वह रैम्प पर उतरेगीलडक़ियों में चर्चा है कि उसकी ड्रेसेज सबसे अच्छी हैंहो सकता है बेस्ट ड्रेस उसकी चुनी जायेरात रात भर अपनी कल्पनाओं की चिन्दी चिन्दी जोडक़र उसने वे ड्रेसेज तैयार की हैं, किसी और के लियेखुद तो वह बिलकुल साधारण कपडे पहनती हैदो चार जो अच्छे से हैं, उसके अपने नहीं, भाभी के हैंडिलेवरी के बाद वे मोटी हो गयी और उदारतापूर्वक अपने कपडे उसे दे दिये- जिन्हें पहनते वक्त उसे सूखे पुआल की सी महक आतीऐसी महक उसे कपडे धोते वक्त मैले कपडों में से आती है और इस महक से उसे सख्त नफरत थीअपने तैयार किये हुए कपडे उसने सूंघकर देखेकुछ नहीं था उसमें, गंधविहीन थे वे

उसकी मॉडल रितिका सिन्हा आ गयी है लटीम शटीम सांवला फिगर सुतवां नाक काली आंखें और खूब लम्बे बालसांवले - औसत चेहरे को भी ये लडक़ियां लीप पोत कर कुछ और बना लेती हैंरैम्प पर चलती हैंकैट वॉक करती हुई तो सामने वाले को निमंत्रण देती सी लगती हैंक्या इस सारे कारोबार का एक ही मुख्य बिन्दु है, जिसके इर्दगिर्द ये समूची सृष्टि नाचती है?

वह उससे बहस करती हैयह नहीं, वहयहां से छोटा करो, यहां से टाइटजरा सा और दिखना चाहिये जो बाहर है, वह भी, जो भीतर है, और ज्यादाकोई भी लडक़ी अगर अपनी मूल प्रवृत्ति को नहीं जगाती, बेकार हैसाथ होने का रस, बगैर साथ हुए बेहतर ढंग से लिया जा सकता हैये क्या सोचे जा रही है वह? उसके भीतर कितनी नफरत है? कभी किसी चीज क़ो बेहतर ढंग से लिया जा सकता हैरितिका सिन्हा उसे समझा कर चली गई तो वह पुन: अपने काम में जुट गयीनहीं करना चाहती थी वह यह काम वह तो क्लीनीकल सायकोलॉजी करना चाहती थी उसने बडे मन से बीए में यह सबजेक्ट लिया था और इसके लिये उसे बाहर जाना पडताघरवाले उस जैसा मुफ्त का नौकर कहां से लाते, सो उसे घर बैठा दिया गयाअब किसी को सौंपे जाने को उसे तैयार किया जा रहा है, जो भी कोने कुतरे दिख रहे हैं बाहर उन्हें छील करइसी सब का बदला लेते हैं हम दूसरों से, क्या वह भी लेगी? वह भी तो सोचती है, मां का मैला धोते वक्त कि काश, अभी इसी क्षण यह घृणित शरीर उसके हाथ से फिसलकर जमीन पर गिर जायेभाभी के कमरे का दरवाजा बन्द होते हीर् ईष्या और द्वेष से भर जाती हैओ शिटउसने जल्दी जल्दी अपना काम खत्म करना जारी रखा

वापस लौटी तो अपने घर की बजाय मेहता आंटी के घरअपने घर जाने की भी तो इच्छा नहीं होतीनहीं रहेगी तो भाभी जैसे तैसे निबटा लेगी, उसके पहुंचते ही बबलू रोना शुरु कर देगा या फिर वे फोन से चिपक जायेंगी

मेहता आंटी ने काफी तैयारी करके रखी हुई थीपहुंचते ही उसने कमान संभाल ली तीन बजे तक सब तैयार हो जायेगा उन्होंने निश्चिन्तता की सांस ली अब वे ड्राईंगरूम की सज्जा पर ध्यान दे सकती हैंउन्होंने क्या क्या बनाना है, बताकर छुट्टी पा ली और बाहर निकल गयींसिर्फ मेहता आंटी ही नहीं, हफ्ते के पांचों दिन कोई न कोई उसे बुलाने आ जाता है - किसी की डिलेवरी हो गयी या कोई हॉस्पीटल में हैकिसी का बच्चा बीमार है, कोई खुदवैसे बीमारी का बहाना ही सबसे आम हैवह जानती है, औरतें न खुश रहना चाहती हैं न स्वस्थसारी बीमारियों की जड वे स्वयं हैंबहुत जल्दी उनके भीतर सब कुछ मर जाता है, किसी भी सपने या इच्छा के अभाव में

अब कहीं भी खटो,क्या फर्क पडता है? वह भी यह सोच सकती है कि उसे किसी की जरूरत है, किसी का काम उसके बिना रुक सकता है!

'' अरे जब इसकी शादी हो जायेगी तो क्या करोगी तुम?'' मि मेहता प्रशंसात्मक ढंग से उसे देखते हुए कहते हैं मिसेज मेहता से।
''
क्या करुंगी? सबको मना कर दूंगी, मेरे घर मत आओ, मैं अकेली हूँ। फिर इसकी छोटी बहन रागी भी तो है! अपनी ही बच्ची है।''

हां कोई न कोई हैउसके पापा सात भाई हैं, सात चाचियां, उनके बच्चे, उनके बच्चे बच्चों के बच्चेकहने को सब अलग, पर एक दूसरे की संभावनाओं को लपकने को हरदम तैयारऔर फिर मोहल्ला भी तो है सब अपने हैंअपनेपन की यह बेस्वाद पुडिया वह रोज पानी के साथ निगलती है

उसने ग्रीन पुलाव बना लिया है और अब पनीर तलने के लिये तेल की कडाही गैस पर रख दी हैजब तक तेल गर्म हो वह सलाद तैयार कर लेपनीर के बाद बूंदी भी तो तलनी है, रायते के लियेइच्छाओं का पिटारा है यह जिस्म हर वक्त कुछ न कुछ इस भट्टी में झौंकते रहोसारी सोच यहीं से शुरु यहीं पर खत्म

बाहर से बातें करने की आवाजें रही हैंमि मेहता मेहमानों के साथ आ गये हैं शायदउसने सलाद की दो बडी प्लेट्स सजाकर दूर रख दी और पनीर तलने लगी
'' अरे क्या - क्या बना रही है हमारी बिटिया
'' मि मेहता किचन में आ गये हैंउसने नमस्ते की और काम में जुटी रही
'' तुम्हारे बिना तो इस घर में कभी कुछ नहीं होगा
मैं कहता हूं तुम्हारी आंटी से बेटियां बडे क़ाम की चीज होती हैंदेखो न तीनों लडक़े हमें छोड क़र बाहर पढने चले गयेबेटी होती तो जी बहलाती मैं तो अब भी कहता हूँ तुम्हारी आंटी से, कुछ देर नहीं हुई है, अभी भी सोचा जा सकता है'' और वे हंसने लगे, निर्लज्ज हंसी उसने अपनी आंखें ऊपर नहीं उठायीं, लगी रही अपने काम मेंवे दनादन सलाद खाते जा रहे हैं, वहीं प्लेटफा&