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जीन - काठी
(भुंडाः पहाडी समाज का एक विचित्र, उत्कृष्ठ और विशेष उत्सव माना जाता है जिसे पुराने समय में हर बारह वर्ष के बाद मनाए जाने की परम्परा थी। लेकिन पहाडों में आज इसके आयोजन का कई कारणों से कोई निश्चित समय तय नहीं है। इसमें 'बेडा' नामक दलित जाति के परिवार से एक व्यक्ति का चुनाव करके उसे यज्ञोपवीत धारण करवाकर ब्राह्मण बना दिया जाता है। उत्सव में बेडा की देवता और ईश्वर की तरह पूजा होती है। पहाडों में इस जाति के अब गिने-चुने परिवार ही बचे हैं।)
सहज
राम उर्फ सहजू अब दलित नहीं रह गया था।उसे
ठण्डे पानी से नहलाया गया।
पूजा
के उपरान्त सारे संस्कार ब्राह्मणों की तरह करवाए गऐ।
यज्ञोपवीत धारण करवा कर उसे द्विज बना दिया गया।
अब वह
नीच जाति का न रह कर ब्राह्मणों की तरह पवित्र हो गया था।
लोग
उसे देवता का रूप मानने लगे थे।
एकाएक
अछूत से ब्राह्मण बन गया था सहजू।
अब उसे
विशेष विधि-विधान का पालन भी करना था जिसमें एक समय खाना खाना,
नख और केश न काटना तथा ब्रह्मचर्य का पूर्ण पालन करना
इत्यादि शामिल था।
भोजन
और कपडे उसे मन्दिर की तरफ से मिलने शुरू हो गए थे।
यहां
तक कि आयोजन की अवधि तक उसके पूरे परिवार का खर्चा भी देवता कमेटी को ही
उठाना था।
लोग
देवता के तमाम वाद्यों के साथ एक पहाडी पर सहजू को लेकर मूंज का घास काटने
चले गए थे।
पहले
सहजू ने ही दराटी से घास काटने की परम्परा का निर्वाह किया था।
इसके
बाद सभी गावों वालों ने घास काटना शुरू कर दिया।
जब
पर्याप्त मात्रा में घास काट लिया गया तो सभी ने घास की गड्डियों को मन्दिर
के प्रांगण में लाकर रख दिया।
इसी
घास से सहजू को भुण्डा के लिए रस्सा बनाना था।
उत्सव
स्थल का मुआयना किया गया तो कुल लम्बाई
500
मीटर की निकली।
इतना
ही लम्बा रस्सा बनना था।
मजबूती
के लिए उसकी मोटाई लगभग
25-30
सेंटीमीटर रखनी ज़रूरी थी।
जब सहजू रस्से बनाने का काम बन्द करता तो गांव के लोग उनके पास आते जाते रहते। उनसे इज्जत से बतियाते। घास कम होता देख फिर काट कर ले आते। भुण्डा जैसे महा-उत्सव का आयोजन भगवान दत शर्मा के दिमाग की उपज थी। तहसीलदार के पद से शर्मा जी कुछ दिनों पूर्व ही सेवानिवृत हुए थे।
जिस
दिन वे सेवानिवृत हुए,
उन्होंने अपने गांव में पूरे ताम-झाम के साथ एक बडी धाम
दी थी।
इसमें
सगे-सम्बन्धियों के अतिरिक्त गांव-बेड
और
परगने
तक से लोग बुलाए गए थे।
दफतर
से तो उनके नए-पुराने साथी आए ही थे।
उन्होंने अपने चुनाव क्षेत्र के विधायक को भी विशेष रूप से आमन्त्रित किया
था।
विधायक
के साथ प्रशासन के भी सभी अधिकारीगण पधारे थे।
गांव
के देवता को भी बुलाया गया था।
शर्मा
जी जब अपने दफतर से गांव पहुंचे तो साथ दस-पन्द्रह छोटी-बडी ग़ाडियां थीं।
अंग्रेजी बाजे के साथ ढोल-नगाडा बजाने वाली पार्टी को बुलाना भी नहीं भूले
थे।
इससे
जहां उन्होंने तहसीलदारी की ठीस बरकरार रखने की कोशिश की थी वहां लोगों के
बीच अपनी छवि को एक धार्मिक दृष्टि देने का भी प्रयास किया था।
अट्ठावन साल की उम्र में भी भगवान दत शर्मा चालीस के आसपास ही लगते थे। अभी भी गाल लाल थे। झुर्रियों का कहीं नामोंनिशां न था। हालांकि बाल कई बरस पहले सफेद हो चुके थे लेकिन मेंहदी से उन्हें काले किए रखते थे। माथा काफी चौडा था। गोल चेहरा ठोडी तक आते-आते थोडा नुकीला था। हल्की मूंछे उन पर खूब जचती थी। माथे पर चंदन और कुमकुम मिश्रित टीका वे हमेशा लगाए रखते। नौकरी में उन्होंने कभी टाई और कोट पहनना नहीं छोडा। कोट की जेब में टाई के रंग से मिलता रूमाल वे हमेशा रखते। इसीलिए ठाठबाठ देख कर उनके वरिष्ठ अफसरों का भीतर ही भीतर फूंके रहना स्वभाविक था। लेकिन रिटायर होने के बाद उन्होंने अपना लिबास बदल लिया था। अब फेरीदार पाजामे-कुरते के साथ वे नेहरूकट सदरी पहनते और जेब में बाहर झांकता लाल रूमाल सजा रहता। इस चमक-धमक से भी उनका व्यक्तित्व कुछ अलग हटकर ही लगता था। शर्मा जी का परिवार गांव में सबसे सम्पन्न था। वे तीन भाई थे। तीन ही गांवों के मालिक। उन्हें बडे ज़मींदार भी कहा जा सकता था। अपने परिवार में उनकी पत्नी, दो बेटे, दो बहुएं और तीन पोतू-पोतियां थे। दो लडक़ियों की शादी हो चुकी थी। छोटा लडक़ा बी0डी0ओ0 लग गया था। बडा कथ्थे का ठेकेदार था। साथ जमींदारी भी संभालता था। पानी लगती ज़मीन थी। फसलों के साथ खूब सब्जियां भी होती थीं जिनसे अच्छी-खासी आमदनी थी। दो क्वालिस गाडियों के साथ दो ट्रक भी थे। गोरखों की एक लेबर लगातार खेती-बाडी क़े काम में लगी रहती थी। पहला काम शर्मा जी ने देवता कमेटी में घुसने का किया था। कई दिनों तक देवता के कार्यक्रमों में आते-जाते रहे। लेकिन जब कमेटी में सरपंच के चुनाव हुए तो लोगों के पास उनसे बढिया विकल्प कोई नहीं था। सर्वसम्मति से सरपंच चुन लिए गए। यह उनके धार्मिक जीवन की शुरूआत थी। यहीं से ही ग्राम पंचायत की प्रधानी तक जाना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने अभी से जुगाड भिडाने शुरू कर दिए थे। शर्मा जी अब कुछ ऐसा करना चाहते थे जिससे गांव-परगने में ही नहीं बल्कि दूर-दराज के इलाकों में भी उनकी साख का डंका पीटना शुरू हो जाए। उनकी खूब वाह-वाह भी हो जाए और विधायक तथा मुख्य मन्त्री तक भी खूब पहुंच बन सके। उनका पूरा गांव ब्राह्मणों का था। पांच गोत्रों के ब्राह्मण वहां रहते थे। इसे एक प्राचीन सांस्कृतिक गांव भी माना जाता था। कालान्तर से यहां बारह बरस के अन्तराल के बाद निरन्तर भुण्डा महोत्सव हुआ करता था। गांव में कई प्राचीन मन्दिर अभी भी मौजूद थे। जिनका धार्मिक ही नहीं बल्कि पुरातात्विक महत्व भी था। गांव में चार-पांच परिवार दलितों के थे। उन्हीं में एक परिवार ''बेडा'' जाति का भी था जो भुण्डा में मुख्य भूमिका निभाया करता था। लेकिन बरसों पहले उनके परिवार का एक सदस्य भुण्डा का रस्सा टूटने से मर गया था। शर्मा जी ने अपने दादा-पडदादाओं से इस कथा को सुन रखा था जो मन में आज भी तरोताजा थी। जब बेडा को जीन-काठी पर बिठा कर रस्से पर छोडा गया तो कुछ दूरी पर वह रूक गई। बेडा बेचारा न आगे खिसक पाया न ही पीछे हट सका। रस्से में बाट पड ग़ए थे। लोगों ने दोनों ओर से बहुत प्रयत्न किए कि बेडा की जीन-काठी आगे खिसक जाए लेकिन सभी प्रयत्न असफल हो गए। उन्होंने जब रस्से को जोर-जोर से लकडी क़े डंडों से पीटना शुरू किया तो रस्सा टूट गया। बेडा कई सौ फुट नीचे चट्टानों पर गिर पडा और मृत्यु हो गई। उस गांव और परगने के लिए वह दिन बडे अनिष्ट का माना गया था। उसके बाद गांव में भयंकर महामारी फैल गई। गांव की आधी से ज्यादा जनसंख्या मौत के मुंह में चली गई। इसीलिए गावों के ब्राह्मणों ने बेडा के परिवार के साथ दूसरे दलितों को भी गांव से भगा दिया और सारे अनिष्ट का ठीकरा उन्हीं के सिर फोड ड़ाला। और सभी दलितों को वहां से चलता कर दिया था। अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए शर्मा जी को इससे बेहतर कोई दूसरा आयोजन नजर नहीं आ रहा था। वे जानते थे कि उस हादसे के बाद गांव में कभी भुण्डा नहीं हो पाया था। हालाकि दूसरे गांवों में कभी-कभार बीस-चौबीस बरसों के अन्तराल में यह आयोजन होता ही रहता था। अपनी तहसीलदारी के रहते उन्होंने भी कई आयोजन करवाए थे। परम्पराएं उसी तरह निभाई जाती थीं लेकिन 'बेडा' को जितने लम्बे रस्से पर उतारा जाता उसके नीचे उतनी ही लम्बी जाली भी बिछा दी जाती थी। बेडा किसी कारण गिरे भी तो उसे तत्काल बचाया जा सकता था। कई जगह 'बेडा' जाति का कोई व्यक्ति उपलब्ध न होने पर लोग बकरे को ही जीन-काठी पर बांध कर छोडते थे। शर्मा जी ने यह बात एक दिन देवता कमेटी के सदस्यों से की। सभी को उनकी बात खूब जची थी। देवता के गूर का विचार था कि उनके गांव पर अभी तक उस अनिष्ट का साया बरकरार है। वह तभी मिट सकता है जब गांव में भुण्डा का आयोजन किया जाए। इससे गांव पहले जैसा सम्पन्न और खुशहाल भी हो जाएगा। लेकिन बात लाखों रूपए के व्यय की थी। आज की महंगाई में इतना बडा आयोजन करना नामुमकिन था। इसका समाधान भी शर्मा जी ने ही निकाल दिया था। उन्होंने तत्काल एक लाख रूपए देवता कमेटी को दान देने का वादा कर दिया। इससे सभी सदस्यों का मनोबल बढ ग़या। दूसरा विकल्प यह निकाला गया कि देवता के पास जो बरसों का सोना-चांदी पडा है उसे अच्छी कीमत पर बेच दिया जाए। देवता का धन यदि देवता के ही काम आए तो इसमें बुरा भी क्या? इस बात पर सभी की सहमती बन गई थी। अब समस्या ''बेडा'' को ढूंढने की थी। गांव में किसी को भी पता नहीं था कि बरसों पहले निकाले जाने के बाद वे लोग कहां जा कर बस गए थे। शर्मा जी ने ही इसका समाधान निकाल दिया था। उन्होंने बेडा को तलाश करने और गांव में लाने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली थी। देवता कमेटी उनकी सक्रियता को देख कर बेहद प्रभावित थी। उन्हें खूब मान-प्रतिष्ठा भी मिलनी शुरू हो गई थी। देवता से लेकर गांव-परगने के कई दूसरे छोटे-बडे क़ाम अब उन्हीं के सलाह-मशविरे से होने लगे थे। यह सुख शर्मा जी को तहसीलदार की कुर्सी से कहीं बढ क़र लगने लगा था।
शर्मा
जी मन ही मन बहुत प्रसन्न थे।
उन्होंने आयोजन की पूरी रूप-रेखा अपने मन में तैयार कर ली थी।
यह भी
तय कर लिया था कि प्रदेश के मुख्य मन्त्री को मुख्य अतिथि के रूप में
बुलाया जाएगा।
गांव-बेड में जब देवता कमेटी के निर्णय का पता चला तो लोग हैरान-परेशान हो
गए।
इतने
बडे
आयोजन
के लिए वे तैयार नहीं थे।
लेकिन
शर्मा जी और कमेटी के अन्य सदस्यों ने उन्हें समझा-बुझा कर मना लिया था।फिर
इतने बडे पुण्य से वंचित भी कौन रहना चाहता था
? शर्मा जी गांव के एक-दो लोगों को लेकर पहले विधायक जी के पास पहुंचे और इस सन्दर्भ में बात की। ''देखो विधायक जी! हमारे गांव में लगभग डेढ सौ सालों बाद भुण्डा होगा। मुख्य अतिथि तो आपको मुख्य मन्त्री जी ही लाने हैं। इससे आपका भी भला और हमारे साथ गांव का भी फायदा।'' शर्मा जी ने विनम्रतापूर्वक विधायक के आगे प्रस्ताव रखा था। विधायक जी को तत्काल कुछ नहीं सूझ रहा था। उन्होंने भी अपने बुजुर्गों से 'बेडा' के रस्से पर से गिरने से हुई मौत की बात सुन रखी थी। वे खुद भी दलित वर्ग से थे। उनका चुनाव-क्षेत्र आरक्षित था। सिगरेट के कश लगाते हुए काफी देर मन ही मन में बैठकें करते रहे। उनका विचार बरसों पहले घटी घटना की तरफ चला गया। उसकी आड में अपने फायदे-नुकसान का हिसाब-किताब लगाया। दलितों की वोटों की तरफ एक सरसरी नजर दौडाई जो उन्हें पिछले चुनाव में बहुत कम मिले थे। दूसरी सबसे बडी ऌस इलैक्ट्रॉनिक युग में अपनी पुरानी परम्पराओं के साथ अपने को जोडने की लगी। तीसरी जो मुख्य बात समझ में आई वह गांव से निष्काशित 'बेडा' और दलित परिवारों को पुनः इस बहाने सम्मान दिलाने की थी। यह अवसर उन्हें 'ऑल इन वन' जैसा लगा। विधायक जी ने मन में खूब जोर का एक ठहाका लगाया लेकिन उसका भाव चेहरे पर नहीं आने दिया। एक बनावटी मुस्कान चेहरे पर उतारते हुए कहने लगे, ''शर्मा जी! धन्य है आप। नौकरी करते हुए भी अपनी परम्पराएं मन में बचा रखी हैं। वरना रिटायरमैंन्ट के बाद तो लोग सठिया जाते हैं। कोई तो इस गम से परेशान होकर दो साल भी नहीं निकाल पाते। आपने तो इतना बडा बीडा उठाया है। बडी समाज सेवा है भई। मैं तो आपके साथ हूं। मेरे लिए आप जो सेवा दें, सिर माथे।'' शर्मा जी खुश हो गए। मन में कुल देवता को नमन किया। उसी के परताप से सब शुभ हो रहा है। पर दूसरे पल कुछ चिन्ताओं की रेखाएं अनायास चेहरे पर उमडी तो विधायक जी ने टोक दिया,
''
कुछ
परेशान दिख रहे हैं शर्मा जी
? ''
जब
दलित परिवार उस गांव से निकाले गए तो वे कई दिनों भूखे-नंगे भटकते रहे।
उन्होंने मांग-मांग कर गुजारा किया था।
कई
सदस्य मर भी गए।
बडी
मशक्कत के बाद एक परिवार ने उनकी मदद की थी और उन्हें कुछ जमीन भी दे दी थी।
मेहनत
से उन्होंने अपना एक छोटा सा गांव बसा लिया था।
शर्मा
जी ने तो कभी उस गांव का नाम तक नहीं सुना था।
शर्मा जी एक पल के लिए सकते में आ गए। पर उसके खाली हाथ देख हिम्मत बटोर कर उसके सामने चले आए। अपनी गरज थी, दोनों हाथ जोड दिए,'' देखो भाई! जो कुछ आपके साथ हुआ, उसमें हमारा क्या दोष? हम उसके लिए आप सभी से माफी ही मांग सकते हैं। इसी खतिर आए भी हैं। आज जो चाहें आप सजा दे सकते हैं। भला-बुरा बोल सकते हैं। सब कुछ सर-माथे। हम ही नहीं सारा गांव उसके लिए शर्मिन्दा भी है। हम चाहते हैं कि आप भुंडा निभाए। हमारे साथ-साथ पुण्य के भागीदार भी बनें।''
''
तुम्हारे
गांव के बुजुर्गों ने अच्छा नहीं किया था। सब कुछ उजाड दिया हमारा। आज किस
मुंह से आप यहां आए। सच,
कैसे सब्र हो गया। बाबा कुछ बीमार है। ठीक होते तो पता नहीं क्या कर देतेहे
भगवान!''यह
कहते-कहते उसने दोनों हाथों से अपना सिर पकड लिया। जैसे कोई बडी अनहोनी टल
गई हो। '' भाई ! मत समझो कि हम यहां अपनी मर्जी से आए हैं। यह देव आज्ञा है। हम कौन होते हैं। हमारी औकात ही क्या? सभी उस देवता-ईश्वर की मर्जी है। हम तो आपके आगे हाथ ही जोड सकते हैं। आपके बुजुर्ग के पांव ही पड सकते हैं।'' शर्मा जी को अपने काम के लिए ''गधे को मामा' बोलने वाली कहावत इस वक्त बिल्कुल उचित जान पड रही थी।देवता का वास्ता सुनकर वह थोडा सा सहज हुआ। कहा कुछ नहीं। उल्टे पांव भीतर लौट गया। दरवाजे पर पहुंचते ही एक लडक़े ने उसे पानी का बडा सा डिब्बा पकडा दिया। उसने खडे ग़ले सारा पानी गटक लिया। शर्मा जी की समझ में कुछ नहीं आ रहा था। उन्हें एक पल लगा कि किए-किराए पर पानी फिर गया है। भीतर वह बुजुर्ग जोर-जोर से अपनी बोली में गालियां बक रहा था। काफी देर बाद वह आदमी जब दोबारा बाहर आया तो हाथ में तीन प्लास्टिक की कुर्सियां थीं। शर्मा जी ने देखा तो जान में जान आई। कुर्सियां आंगन में पटका दीं।
अब तक
इधर-उधर से कुछ मर्द और आरतें भी आंगन के उस तरफ इकट्ठे हो गए थे।
पंडितों का उनके आगे इस तरह गिडग़िडाना सभी को अकल्पनीय लग रहा था।वातावरण
में भरी उमस जैसे हल्की हें गई।
उसने
तीनों को कुर्सी पर बैठने का इशारा किया।
वे
चुपचाप बैठ गए।
फिर
किल्टा उठाया।
बिल्ली
के दोनों बच्चे भाग खडे हुए।
ऊन की
टोकरी और हुक्का एक किनारे रखते हुए अपना नाम बताने लगा,''
मैं सहज रामघर में सहजू ही बोलते हैं।
वो
मेरे पिता जीसौ पार कर गए है।''
'' सौ पार?''
सहज
राम की बातचीत करने के ढंग से लग रहा था कि वह कुछ पढा लिखा भी है।
शर्मा
जी लम्बी भूमिका नहीं बांधना चाहते थे।
उन्होंने उससे सीधी बात की और पहले की घटना पर दोबारा अफसोस ही नहीं जताया
बल्कि गांव और देवता की तरफ से माफी भी मांग ली थी।
सहजू
ने कुछ देर मन में विचार-विमर्श किया।
फिर
भीतर चला गया।
बाहर
खडे लोग भी भीतर हो लिए।
उन सभी
की काफी देर खुसर-फुसर होती रही।
काफी
देर बाद बाहर आया और भूंडा में आने के लिए अपनी स्वीकृति दे दी।
शर्मा
जी और उनके साथी हाथ जोड क़र खडे हो गए।
उन सभी
का आभार जताया और वहां से खिसक लिए।
तीनों
के चेहरे पर इसका सुख तो झलक रहा था लेकिन मन पर पडी चोटें इतनी गहरी थीं
कि सडक़ तक किसी ने कोई बात ही नहीं की। भुण्डा उत्सव की प्रक्रियाएं प्रारम्भ हो गईं थीं। सबसे पहले गावों वालों की एक सभा बुलाई गई। सभा का आयोजन मुख्य देवता के मन्दिर के प्रांगण में हुआ था। मन्दिर के मुख्य द्वार के सामने लगभग डेढ मीटर ऊंचाई |