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जीन - काठी
(यह कहानी वरिष्ठ कवि-आलोचक श्री श्रीनिवास श्रीकान्त के लिए)

(भुंडाः पहाडी समाज का एक विचित्र, उत्कृष्ठ और विशेष उत्सव माना जाता है जिसे पुराने समय में हर बारह वर्ष के बाद मनाए जाने की परम्परा थी। लेकिन पहाडों में आज इसके आयोजन का कई कारणों से कोई निश्चित समय तय नहीं है। इसमें 'बेडा' नामक दलित जाति के परिवार से एक व्यक्ति का चुनाव करके उसे यज्ञोपवीत धारण करवाकर ब्राह्मण बना दिया जाता है। उत्सव में बेडा की देवता और ईश्वर की तरह पूजा होती है। पहाडों में इस जाति के अब गिने-चुने परिवार ही बचे हैं।)

सहज राम उर्फ सहजू अब दलित नहीं रह गया थाउसे ठण्डे पानी से नहलाया गया पूजा के उपरान्त सारे संस्कार ब्राह्मणों की तरह करवाए गऐ यज्ञोपवीत धारण करवा कर उसे द्विज बना दिया गया अब वह नीच जाति का न रह कर ब्राह्मणों की तरह पवित्र हो गया था लोग उसे देवता का रूप मानने लगे थे एकाएक अछूत से ब्राह्मण बन गया था सहजू अब उसे विशेष विधि-विधान का पालन भी करना था जिसमें एक समय खाना खाना, नख और केश न काटना तथा ब्रह्मचर्य का पूर्ण पालन करना इत्यादि शामिल था भोजन और कपडे उसे मन्दिर की तरफ से मिलने शुरू हो गए थे यहां तक कि आयोजन की अवधि तक उसके पूरे परिवार का खर्चा भी देवता कमेटी को ही उठाना था
'भुण्डा'उत्सव के लिए अब विशेष रस्से का निर्माण किया जाना था

लोग देवता के तमाम वाद्यों के साथ एक पहाडी पर सहजू को लेकर मूंज का घास काटने चले गए थे पहले सहजू ने ही दराटी से घास काटने की परम्परा का निर्वाह किया था इसके बाद सभी गावों वालों ने घास काटना शुरू कर दिया जब पर्याप्त मात्रा में घास काट लिया गया तो सभी ने घास की गड्डियों को मन्दिर के प्रांगण में लाकर रख दिया इसी घास से सहजू को भुण्डा के लिए रस्सा बनाना था उत्सव स्थल का मुआयना किया गया तो कुल लम्बाई 500 मीटर की निकली इतना ही लम्बा रस्सा बनना था मजबूती के लिए उसकी मोटाई लगभग 25-30 सेंटीमीटर रखनी ज़रूरी थी

सहजू को ब्रह्म मुहूर्त में उठ कर नहाना पडता था
पूजा-पाठ के पश्चात् वह मूंज के घास से रस्सा बनाने में जुट जाता यह कार्य अत्यन्त ही पवित्र माना जाता उस समय कोई दूसरा व्यक्ति न उसके सामने आता और न ही बात करता था कोई भी रस्से को छू तक नहीं सकता था यदि भूल से किसी ने ऐसा कर लिया तो वह अपवित्र माना जाता तत्काल उस पर एक भेड क़ी बलि चढाई जाती और नया रस्सा बनाना आरम्भ करना पडता रस्सा बनाते हुए सहजू के मन में तरह-तरह के ख्याल भी आते रहते वह सोचता कि उसका जो बुजुर्ग बरसों पहले भुंडा निभाते रस्से से गिर कर मर गया था उसने भी इसी तरह तिनका-तिनका घास के रेशे से मौत को बुना होगा वह इन्हीं ख्यालों में दिन भर खोया रहता उसकी पत्नी दूर बैठी उसे चुपचाप निहारती रहती कई बार निगाहें सहजू के चेहरे पर टिक जाया करती उसके चेहरे पर आते-जाते भाव को पढने की कोशिश करती कभी वहां मौत की परछाई रेंगती दिखती तो कभी अपार सम्पन्नता की लकीरें बनती-बिगडती नजर आतीं अपने खाविंद को एक दलित से बाह्मण होने के सुख को भी ह उसके चेहरे और आंखों पर तलाशने लगती लेकिन कभी-कभी वह चेहरा अपने पति का न लग कर एक पाखंडी या करयालची का जैसा लगता जिस पर जबरन ब्राह्मण का मुखौटा चढा दिया गया हो लोगों ने अपने मनोरंजन के लिए उसे एक स्वांगी बना दिया गया हो

जब सहजू रस्से बनाने का काम बन्द करता तो गांव के लोग उनके पास आते जाते रहते उनसे इज्जत से बतियाते घास कम होता देख फिर काट कर ले आते भुण्डा जैसे महा-उत्सव का आयोजन भगवान दत शर्मा के दिमाग की उपज थी तहसीलदार के पद से शर्मा जी कुछ दिनों पूर्व ही सेवानिवृत हुए थे

जिस दिन वे सेवानिवृत हुए, उन्होंने अपने गांव में पूरे ताम-झाम के साथ एक बडी धाम दी थी इसमें सगे-सम्बन्धियों के अतिरिक्त गांव-बेड और परगने तक से लोग बुलाए गए थे दफतर से तो उनके नए-पुराने साथी आए ही थे उन्होंने अपने चुनाव क्षेत्र के विधायक को भी विशेष रूप से आमन्त्रित किया था विधायक के साथ प्रशासन के भी सभी अधिकारीगण पधारे थे गांव के देवता को भी बुलाया गया था शर्मा जी जब अपने दफतर से गांव पहुंचे तो साथ दस-पन्द्रह छोटी-बडी ग़ाडियां थीं अंग्रेजी बाजे के साथ ढोल-नगाडा बजाने वाली पार्टी को बुलाना भी नहीं भूले थे इससे जहां उन्होंने तहसीलदारी की ठीस बरकरार रखने की कोशिश की थी वहां लोगों के बीच अपनी छवि को एक धार्मिक दृष्टि देने का भी प्रयास किया था

धाम में कई प्रकार के पकवान बनाए गए थे
देसी और अंग्रेजी शराब उपलब्ध थी पांच बकरे भी काटे गए थे लोगों ने इससे पहले कभी ऐसा जशन नहीं देखा था इसीलिए इस कार्यक्रम की चर्चा काफी दिनों तक होती रही शर्मा जी ने इतना बडा आयोजन करके कई निशाने साधे थे लेकिन ये उनके मन की बातें थीं जिसकी वे किसी को भी भनक नहीं लगने देना चाहते थे वे जानते थे कि जिस ठाठ से उन्होंने नौकरी की है, सेवानिवृति के बाद वह ठसक कहां रहने वाली ? सभी कुर्सी को प्रणाम करते हैं बाद में तो कोई कुत्ता भी नहीं पूछता बैंक-बेलैंस भले ही लाखों में हो पर जब तक कोई कुर्सी का जुगाड नही ंतो आदमी आदमी रहता ही कहां है वैसे भी शर्मा जी तहसीलदार के पद से रिटायर हुए थे पैसा भी खूब कमाया था इज्जत-परतीत भी अच्छी-खासी बटोरी थी काम भी लोगों के बहुत किए ऐसा भी नहीं कि वे दूध के धुले हुए थे पर पैसा इस ढंग से बनाया कि अपने ऊपर कोई आंच तक न आने दी

अट्ठावन साल की उम्र में भी भगवान दत शर्मा चालीस के आसपास ही लगते थे अभी भी गाल लाल थे झुर्रियों का कहीं नामोंनिशां न था हालांकि बाल कई बरस पहले सफेद हो चुके थे लेकिन मेंहदी से उन्हें काले किए रखते थे माथा काफी चौडा था गोल चेहरा ठोडी तक आते-आते थोडा नुकीला था हल्की मूंछे उन पर खूब जचती थी माथे पर चंदन और कुमकुम मिश्रित टीका वे हमेशा लगाए रखते नौकरी में उन्होंने कभी टाई और कोट पहनना नहीं छोडा कोट की जेब में टाई के रंग से मिलता रूमाल वे हमेशा रखते इसीलिए ठाठबाठ देख कर उनके वरिष्ठ अफसरों का भीतर ही भीतर फूंके रहना स्वभाविक था लेकिन रिटायर होने के बाद उन्होंने अपना लिबास बदल लिया था अब फेरीदार पाजामे-कुरते के साथ वे नेहरूकट सदरी पहनते और जेब में बाहर झांकता लाल रूमाल सजा रहता इस चमक-धमक से भी उनका व्यक्तित्व कुछ अलग हटकर ही लगता था

शर्मा जी का परिवार गांव में सबसे सम्पन्न था वे तीन भाई थे तीन ही गांवों के मालिक उन्हें बडे ज़मींदार भी कहा जा सकता था अपने परिवार में उनकी पत्नी, दो बेटे, दो बहुएं और तीन पोतू-पोतियां थे दो लडक़ियों की शादी हो चुकी थी छोटा लडक़ा बी0डी00 लग गया था बडा कथ्थे का ठेकेदार था साथ जमींदारी भी संभालता था पानी लगती ज़मीन थी फसलों के साथ खूब सब्जियां भी होती थीं जिनसे अच्छी-खासी आमदनी थी दो क्वालिस गाडियों के साथ दो ट्रक भी थे गोरखों की एक लेबर लगातार खेती-बाडी क़े काम में लगी रहती थी

पहला काम शर्मा जी ने देवता कमेटी में घुसने का किया था कई दिनों तक देवता के कार्यक्रमों में आते-जाते रहे लेकिन जब कमेटी में सरपंच के चुनाव हुए तो लोगों के पास उनसे बढिया विकल्प कोई नहीं था सर्वसम्मति से सरपंच चुन लिए गए यह उनके धार्मिक जीवन की शुरूआत थी यहीं से ही ग्राम पंचायत की प्रधानी तक जाना चाहते थे इसके लिए उन्होंने अभी से जुगाड भिडाने शुरू कर दिए थे शर्मा जी अब कुछ ऐसा करना चाहते थे जिससे गांव-परगने में ही नहीं बल्कि दूर-दराज के इलाकों में भी उनकी साख का डंका पीटना शुरू हो जाए उनकी खूब वाह-वाह भी हो जाए और विधायक तथा मुख्य मन्त्री तक भी खूब पहुंच बन सके

उनका पूरा गांव ब्राह्मणों का था पांच गोत्रों के ब्राह्मण वहां रहते थे इसे एक प्राचीन सांस्कृतिक गांव भी माना जाता था कालान्तर से यहां बारह बरस के अन्तराल के बाद निरन्तर भुण्डा महोत्सव हुआ करता था गांव में कई प्राचीन मन्दिर अभी भी मौजूद थे जिनका धार्मिक ही नहीं बल्कि पुरातात्विक महत्व भी था गांव में चार-पांच परिवार दलितों के थे उन्हीं में एक परिवार ''बेडा'' जाति का भी था जो भुण्डा में मुख्य भूमिका निभाया करता था लेकिन बरसों पहले उनके परिवार का एक सदस्य भुण्डा का रस्सा टूटने से मर गया था शर्मा जी ने अपने दादा-पडदादाओं से इस कथा को सुन रखा था जो मन में आज भी तरोताजा थी जब बेडा को जीन-काठी पर बिठा कर रस्से पर छोडा गया तो कुछ दूरी पर वह रूक गई बेडा बेचारा न आगे खिसक पाया न ही पीछे हट सका रस्से में बाट पड ग़ए थे लोगों ने दोनों ओर से बहुत प्रयत्न किए कि बेडा की जीन-काठी आगे खिसक जाए लेकिन सभी प्रयत्न असफल हो गए उन्होंने जब रस्से को जोर-जोर से लकडी क़े डंडों से पीटना शुरू किया तो रस्सा टूट गया बेडा कई सौ फुट नीचे चट्टानों पर गिर पडा और मृत्यु हो गई उस गांव और परगने के लिए वह दिन बडे अनिष्ट का माना गया था उसके बाद गांव में भयंकर महामारी फैल गई गांव की आधी से ज्यादा जनसंख्या मौत के मुंह में चली गई इसीलिए गावों के ब्राह्मणों ने बेडा के परिवार के साथ दूसरे दलितों को भी गांव से भगा दिया और सारे अनिष्ट का ठीकरा उन्हीं के सिर फोड ड़ाला और सभी दलितों को वहां से चलता कर दिया था

अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए शर्मा जी को इससे बेहतर कोई दूसरा आयोजन नजर नहीं आ रहा था वे जानते थे कि उस हादसे के बाद गांव में कभी भुण्डा नहीं हो पाया था हालाकि दूसरे गांवों में कभी-कभार बीस-चौबीस बरसों के अन्तराल में यह आयोजन होता ही रहता था अपनी तहसीलदारी के रहते उन्होंने भी कई आयोजन करवाए थे परम्पराएं उसी तरह निभाई जाती थीं लेकिन 'बेडा' को जितने लम्बे रस्से पर उतारा जाता उसके नीचे उतनी ही लम्बी जाली भी बिछा दी जाती थी बेडा किसी कारण गिरे भी तो उसे तत्काल बचाया जा सकता था कई जगह 'बेडा' जाति का कोई व्यक्ति उपलब्ध न होने पर लोग बकरे को ही जीन-काठी पर बांध कर छोडते थे

शर्मा जी ने यह बात एक दिन देवता कमेटी के सदस्यों से की सभी को उनकी बात खूब जची थी देवता के गूर का विचार था कि उनके गांव पर अभी तक उस अनिष्ट का साया बरकरार है वह तभी मिट सकता है जब गांव में भुण्डा का आयोजन किया जाए इससे गांव पहले जैसा सम्पन्न और खुशहाल भी हो जाएगा लेकिन बात लाखों रूपए के व्यय की थी आज की महंगाई में इतना बडा आयोजन करना नामुमकिन था इसका समाधान भी शर्मा जी ने ही निकाल दिया था उन्होंने तत्काल एक लाख रूपए देवता कमेटी को दान देने का वादा कर दिया इससे सभी सदस्यों का मनोबल बढ ग़या दूसरा विकल्प यह निकाला गया कि देवता के पास जो बरसों का सोना-चांदी पडा है उसे अच्छी कीमत पर बेच दिया जाए देवता का धन यदि देवता के ही काम आए तो इसमें बुरा भी क्या? इस बात पर सभी की सहमती बन गई थी

अब समस्या ''बेडा'' को ढूंढने की थी गांव में किसी को भी पता नहीं था कि बरसों पहले निकाले जाने के बाद वे लोग कहां जा कर बस गए थे शर्मा जी ने ही इसका समाधान निकाल दिया था उन्होंने बेडा को तलाश करने और गांव में लाने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली थी देवता कमेटी उनकी सक्रियता को देख कर बेहद प्रभावित थी उन्हें खूब मान-प्रतिष्ठा भी मिलनी शुरू हो गई थी देवता से लेकर गांव-परगने के कई दूसरे छोटे-बडे क़ाम अब उन्हीं के सलाह-मशविरे से होने लगे थे यह सुख शर्मा जी को तहसीलदार की कुर्सी से कहीं बढ क़र लगने लगा था

शर्मा जी मन ही मन बहुत प्रसन्न थे उन्होंने आयोजन की पूरी रूप-रेखा अपने मन में तैयार कर ली थी यह भी तय कर लिया था कि प्रदेश के मुख्य मन्त्री को मुख्य अतिथि के रूप में बुलाया जाएगा गांव-बेड में जब देवता कमेटी के निर्णय का पता चला तो लोग हैरान-परेशान हो गए इतने बडे योजन के लिए वे तैयार नहीं थे लेकिन शर्मा जी और कमेटी के अन्य सदस्यों ने उन्हें समझा-बुझा कर मना लिया थाफिर इतने बडे पुण्य से वंचित भी कौन रहना चाहता था ?

शर्मा जी के लिए सबसे बडी मुश्किल बेडा' परिवार तलाशने की थी
'बेडा' जाति के लोग दूर-दूर तक भी अब नहीं रहे थे भीतर की बात यह थी कि जिस परिवार को अनिष्टकारी मानकर गांव से निकाला गया था उसी के सदस्य को लाना जरूरी था गांव के बुजुर्गों और कुल पुरोहितों का मानना था कि गांव पर उन लोगों का अभिशाप अभी तक भी बैठा है क्योकि जो 'बेडा' रस्से से गिर कर मरा था उसमें उसका तो कोई दोष नहीं था इसलिए यदि उसी परिवार का कोई रस्से पर उतरे तो दो काम सफल हो जाएंगे पहला कलंक और शाप से छुटकारा और दूसरा भुण्डा के सफल आयोजन से पुण्य ही पुण्य

शर्मा जी गांव के एक-दो लोगों को लेकर पहले विधायक जी के पास पहुंचे और इस सन्दर्भ में बात की ''देखो विधायक जी! हमारे गांव में लगभग डेढ सौ सालों बाद भुण्डा होगा मुख्य अतिथि तो आपको मुख्य मन्त्री जी ही लाने हैं इससे आपका भी भला और हमारे साथ गांव का भी फायदा'' शर्मा जी ने विनम्रतापूर्वक विधायक के आगे प्रस्ताव रखा था

विधायक जी को तत्काल कुछ नहीं सूझ रहा था उन्होंने भी अपने बुजुर्गों से 'बेडा' के रस्से पर से गिरने से हुई मौत की बात सुन रखी थी वे खुद भी दलित वर्ग से थे उनका चुनाव-क्षेत्र आरक्षित था सिगरेट के कश लगाते हुए काफी देर मन ही मन में बैठकें करते रहे उनका विचार बरसों पहले घटी घटना की तरफ चला गया उसकी आड में अपने फायदे-नुकसान का हिसाब-किताब लगाया दलितों की वोटों की तरफ एक सरसरी नजर दौडाई जो उन्हें पिछले चुनाव में बहुत कम मिले थे दूसरी सबसे बडी ऌस इलैक्ट्रॉनिक युग में अपनी पुरानी परम्पराओं के साथ अपने को जोडने की लगी तीसरी जो मुख्य बात समझ में आई वह गांव से निष्काशित 'बेडा' और दलित परिवारों को पुनः इस बहाने सम्मान दिलाने की थी यह अवसर उन्हें 'ऑल इन वन' जैसा लगा

विधायक जी ने मन में खूब जोर का एक ठहाका लगाया लेकिन उसका भाव चेहरे पर नहीं आने दिया एक बनावटी मुस्कान चेहरे पर उतारते हुए कहने लगे, ''शर्मा जी! धन्य है आप नौकरी करते हुए भी अपनी परम्पराएं मन में बचा रखी हैं वरना रिटायरमैंन्ट के बाद तो लोग सठिया जाते हैं कोई तो इस गम से परेशान होकर दो साल भी नहीं निकाल पाते आपने तो इतना बडा बीडा उठाया है बडी समाज सेवा है भई मैं तो आपके साथ हूं मेरे लिए आप जो सेवा दें, सिर माथे'' शर्मा जी खुश हो गए मन में कुल देवता को नमन किया उसी के परताप से सब शुभ हो रहा है पर दूसरे पल कुछ चिन्ताओं की रेखाएं अनायास चेहरे पर उमडी तो विधायक जी ने टोक दिया,

'' कुछ परेशान दिख रहे हैं शर्मा जी ? ''
''
नहींनहीं विधायक जी ऐसी बात नहीं है।''
''
भई मैं आपके साथ हूं। कुछ है तो निःसंकोच बताएं। ''
साथ दूसरा व्यक्ति बैठा था। उसने पहले विधायक जी के चेहरे पर नजर दी। फिर शर्मा जी की तरफ देखा। चिन्ता का उसी ने समाधान किया था।
''
परेशानी उस बेडा परिवार को तलाशने की है जिन्होंने गांव छोड दिया था। ''
विधायक जी ने सुना तो आंखें लाल हो गईं। मन अपमान से तिलमिला गया। जैसे बरसों पहले गांव से उन्हें ही निकाला गया हो। लेकिन पल भर में सहज हो लिए।
''
उनकी फिक्र आप क्यों करते हैं शर्मा जी। कागज लाईए पता मैं बता देता हूं।हे तो बहुत दूर। लेकिन जब आप सभी ने इतने बडे आयोजन की ठानी है तो दूरियां कैसी। हां थोडी-बहुत मान-मनौती तो करनी पडेग़ी ही। बात भले ही बरसों पहले की है पर बेईज्जती के जख्म तो सदा हरे ही रहते हैं।''
शर्मा जी और उनके साथ बैठे दोनों आदमी थोडा झेंप गए। लेकिन शर्मा जी को सूत्र मिल गया था। झट से डायरी निकाली और विधायक जी के पास पकडा दी। उन्होंने सदरी की जेब से पेन निकाला और पता लिख दिया। शर्मा जी ने डायरी वापिस पकडी और पता पढते हुए टेलीफोन शब्द पर नजर पडी तो चौंक गए,  ''टेलीफोन भी है ?''विधायक जी अपना आपा खोते-खोते रह गए।
''
क्यों शर्मा जी इन लोगों के पास टेलीफोन या दूसरी सुविधाएं नहीं होनी चाहिए थी।'' बात हृदय में सुई की तरह चुभी। पर संभल गए।
''
कैसी बात करते हैं विधायक जी। मेरा इरादा कोई ऐसा-वैसा थोडे ही था। बस देख कर खुशी से चौंक गया था कि काम और आसान हो गया।''
''
ऐसा न करियो शर्मा जी। फोन से बात मत करना। वरना बना-बनाया खेल बिगडेग़ा। मान-सम्मान से जाना उनके पास। कठिन काम है। अब आपकी तहसीलदारी देखनी है कि कितनी काम आती है।''
शर्मा जी को विधायक जी चुनौती देते दिखे थे। लेकिन काम अपना था, चुपचाप उठे और विधायक जी को प्रणाम करके निकल आए।

जब दलित परिवार उस गांव से निकाले गए तो वे कई दिनों भूखे-नंगे भटकते रहे उन्होंने मांग-मांग कर गुजारा किया था कई सदस्य मर भी गए बडी मशक्कत के बाद एक परिवार ने उनकी मदद की थी और उन्हें कुछ जमीन भी दे दी थी मेहनत से उन्होंने अपना एक छोटा सा गांव बसा लिया था शर्मा जी ने तो कभी उस गांव का नाम तक नहीं सुना था
गांव लौट कर देवता कमेटी से चर्चा हुई तो सभी खुश हो गए
शर्मा जी और कमेटी के दो अन्य कारदार तत्काल 'बेडा' को आमन्त्रित करने चल दिए जहां तक सडक़ थी वहां तक वे लोग गाडी से गए थे लेकिन वहां से लगभग सात मील का चढाई वाला रास्ता ''बेडा'' परिवार के गांव तक पहुंचता था शर्म जी को पैदल चलने की कतई आदत नहीं रही थी तहसीलदारी में तो ऐसे रास्तों के लिए पहले से ही घोडा उपलब्ध रहता लेकिन इस समय तो अपने पांव से ही काम चलाना पडा जैसे-कैसे शाम ढलने से पहले वे वहां पहुंचे गए थे

उसे गांव का नाम देना शर्मा जी को बेमानी लगा था
एक घाटी की ढलान की ओट में चार-पांच घर थे अनघडे पत्थरों से उनकी छतें छवाई गई थी उनमें दो-तीन घर दो मंजिला थे लेकिन थे साफ-सुथरे नीचे और ऊपर की तरफ छोटे-छोटे खेत थे जिनमें गेहूं और जौ की फसल लहला रही थी उन घरों के आंगन से एक चौडा रास्ता घासणी के बीचोबीच दूसरी तरफ कहीं गुम होता दिखाई दे रहा था एक घर के पास पहुंचते ही दो-तीन कुत्तों ने उनका स्वागत किया लेकिन तभी एक महिला आंगन में निकली और कुत्तों को चुप करवा दिया उसने कुछ अपनी पहाडी बोली में कहा था लेकिन शर्मा जी उसे नहीं समझ सके तभी भीतर से एक अधेड उम्र का आदमी निकला तो शर्मा जी ने उससे बात शुरू कर दी वह टूटी फूटी हिन्दी बोल लेता था जब यहां रह रहे बेडा परिवार के बारे में पूछा तो उसने घासणी के मध्य से आगे निकलती पगडंडी की तरफ इशारा कर दिया वे उधर निकल चल दिए थे

दूसरी तरफ पहुंचे तो उनकी नजर एक पक्के दो मंजिला मकान पर पडी
वे पगडंडी से नीचे उतरकर उस घर के आंगन में पहुंच गएएक बजुर्ग आंगन में बैठा तम्बाकू पी रहा था उसने हल्की काली ऊन का कुरता-पाजामा पहन रखा था सिर पर लाल रंग की गोलदार पहाडी टोपी थी दाईं तरफ एक किल्टा रखा था जिसके भीतर दो बिल्ली के बच्चे खेल रहे थे एक मेमना भीतर से भाग कर आता और किल्टे में सिर की डकेल मार कर फिर भीतर भाग जाता किल्टा रेंग कर इधर आता तो वह बजुर्ग हल्का सा धक्का देकर उसे दूर कर लेता सामने रखी टोकरी में कई सफेद-भूरी ऊन के फाएं रखे हुए थे कश लेते हुए वह एक फाया उठाता और तकली से कातने लग जाता शर्मा जी की नजरें कुछ पल उस तकली के साथ घूमती रही पास ही एक दराट भी पडा था शर्मा जी की नजरें उसके कान पर पडी बडे-बडे सोने के बाले देख कर वह चौंक गए

शर्मा जी कुछ पूछते, तभी एक आदमी भीतर से बाहर निकला
उसकी उम्र पैंतालीस के आसपास लग रही थी अचानक पखलों को आंगन में देख कर ठिठक गया शर्मा जी ने एक सांस में अपना परिचय दे दिया गांव का नाम सुनते ही बुजुर्ग जोर से खांसा और कई पल खांसता रहा खांसी कम हुई तो फटाफट किल्टा सीधा करके बिल्ली के बच्चों को उस के अन्दर कैद कर दिया भीतर से खटर-पटर की आवाजें आती रहीं तकली टोकरी में फैंक कर पास पडे दराट पर दांया हाथ चला गया उसने टेढी ग़र्दन करके उन लोगों को सिर से पांव तक देखा आंखों में खून तैर रहा था गुस्से से पूरा शरीर कांपने लगा था शर्मा जी ने सरसरी नजर उसके चेहरे पर डाली पर आंख मिलाने की हिम्मत न हुई एक बार लगा कि वह बूढा अपना हुक्का चिलम समेत उन पर फैंक देगा या दराट लेकर पीछे ही दौड पडेग़ा उसने एक साथ कई कश हुक्के की नडी से खींचे शर्मा जी इस अप्रत्याशित गुडग़ुडाहट के बीच जैसे फंस से गए थे

शर्मा जी ने डरते-डरते जैसे ही भुंडा की बात शुरू की वह बुजुर्ग हांपता हुआ खडा हो गया
देख कर ऐसा लग रहा था मानो उस पर किसी देवता की छाया आ गई हो उसने जैसे ही दराट का वार शर्मा जी पर करना चाहा भीतर से आए आदमी ने उसका हाथ पकड लिया उसे मुश्किल से संभाला और खींचते हुए भीतर ले गया अभी भी वह टेढी ग़र्दन से पीछे देख रहा था शर्मा जी और उसके साथियों की पांव तले जमीन खिसक गई मारे भय के वे घर के पिछवाडे हो लिए
भीतर कुछ देर उन लोगों का आपस में बोल-चाल होता रहा जिसकी आवाजें शर्मा जी के कान में गर्म तेल की तरह पडती रही
उनके न तो वहां रूकते बन पा रहा था न जाते आज शर्मा जी ने अपने को इतने विवश पाया जिसकी कभी कल्पना भी नहीं की थी भुंडा के आयोजन पर पानी फिरता नजर आने लगा था एक मन किया कि वहां से तत्काल खिसक लिया जाए लेकिन मन पर स्वार्थ की परतें इतनी गहरा गईं थीं कि पांव पीछे मुडने के बजाए आंगन की तरफ सरकने लगे थेवह आदमी गुस्से में बाहर निकलते ही उन पर चिल्ला पडा,'' यहां से चले जाएं आप लोग क्या सोच रखा है कैसे निकाला था हमारे बुजुर्गों को सब जानते हैं हम वहां दोबारा जलील होने जाएंआप लोगों ने यह सोचा कैसे हम बेवकूफ नहीं हैं आज की बात होती तो बताते हां''

शर्मा जी एक पल के लिए सकते में आ गए पर उसके खाली हाथ देख हिम्मत बटोर कर उसके सामने चले आए अपनी गरज थी, दोनों हाथ जोड दिए,'' देखो भाई! जो कुछ आपके साथ हुआ, उसमें हमारा क्या दोष? हम उसके लिए आप सभी से माफी ही मांग सकते हैं इसी खतिर आए भी हैं आज जो चाहें आप सजा दे सकते हैं भला-बुरा बोल सकते हैं सब कुछ सर-माथे हम ही नहीं सारा गांव उसके लिए शर्मिन्दा भी है हम चाहते हैं कि आप भुंडा निभाए हमारे साथ-साथ पुण्य के भागीदार भी बनें''

'' तुम्हारे गांव के बुजुर्गों ने अच्छा नहीं किया था। सब कुछ उजाड दिया हमारा। आज किस मुंह से आप यहां आए। सच, कैसे सब्र हो गया। बाबा कुछ बीमार है। ठीक होते तो पता नहीं क्या कर देतेहे भगवान!''यह कहते-कहते उसने दोनों हाथों से अपना सिर पकड लिया। जैसे कोई बडी अनहोनी टल गई हो।
शर्मा जी आगे बढे और आत्मीयता से उसके दोनों हाथ अपने हाथों में भर लिए। अति विनम्र और स्नेह से कहने लगे,

'' भाई ! मत समझो कि हम यहां अपनी मर्जी से आए हैं। यह देव आज्ञा है। हम कौन होते हैं। हमारी औकात ही क्या? सभी उस देवता-ईश्वर की मर्जी है। हम तो आपके आगे हाथ ही जोड सकते हैं। आपके बुजुर्ग के पांव ही पड सकते हैं।''

शर्मा जी को अपने काम के लिए ''गधे को मामा' बोलने वाली कहावत इस वक्त बिल्कुल उचित जान पड रही थीदेवता का वास्ता सुनकर वह थोडा सा सहज हुआ कहा कुछ नहीं उल्टे पांव भीतर लौट गया दरवाजे पर पहुंचते ही एक लडक़े ने उसे पानी का बडा सा डिब्बा पकडा दिया उसने खडे ग़ले सारा पानी गटक लिया शर्मा जी की समझ में कुछ नहीं आ रहा था उन्हें एक पल लगा कि किए-किराए पर पानी फिर गया है भीतर वह बुजुर्ग जोर-जोर से अपनी बोली में गालियां बक रहा था काफी देर बाद वह आदमी जब दोबारा बाहर आया तो हाथ में तीन प्लास्टिक की कुर्सियां थीं शर्मा जी ने देखा तो जान में जान आई कुर्सियां आंगन में पटका दीं

अब तक इधर-उधर से कुछ मर्द और आरतें भी आंगन के उस तरफ इकट्ठे हो गए थे पंडितों का उनके आगे इस तरह गिडग़िडाना सभी को अकल्पनीय लग रहा थावातावरण में भरी उमस जैसे हल्की हें गई उसने तीनों को कुर्सी पर बैठने का इशारा किया वे चुपचाप बैठ गए फिर किल्टा उठाया बिल्ली के दोनों बच्चे भाग खडे हुए ऊन की टोकरी और हुक्का एक किनारे रखते हुए अपना नाम बताने लगा,'' मैं सहज रामघर में सहजू ही बोलते हैं वो मेरे पिता जीसौ पार कर गए है'' '' सौ पार?''
शर्मा जी और दोनों कारदार स्तब्ध रह गए
बुजुर्ग इतनी उम्र का दिखता ही नहीं था

सहज राम की बातचीत करने के ढंग से लग रहा था कि वह कुछ पढा लिखा भी है शर्मा जी लम्बी भूमिका नहीं बांधना चाहते थे उन्होंने उससे सीधी बात की और पहले की घटना पर दोबारा अफसोस ही नहीं जताया बल्कि गांव और देवता की तरफ से माफी भी मांग ली थी सहजू ने कुछ देर मन में विचार-विमर्श किया फिर भीतर चला गया बाहर खडे लोग भी भीतर हो लिए उन सभी की काफी देर खुसर-फुसर होती रही काफी देर बाद बाहर आया और भूंडा में आने के लिए अपनी स्वीकृति दे दी शर्मा जी और उनके साथी हाथ जोड क़र खडे हो गए उन सभी का आभार जताया और वहां से खिसक लिए तीनों के चेहरे पर इसका सुख तो झलक रहा था लेकिन मन पर पडी चोटें इतनी गहरी थीं कि सडक़ तक किसी ने कोई बात ही नहीं की
देर रात वे गांव पहुंचे थे
पर कोई भी रात भर सो न पाया था सुबह जब देवता कमेटी के सदस्यों और लोगों को शर्मा जी ने बताया कि 'बेडा' मिल गया है तो सभी की खुशी का ठिकाना नहीं रहा इसके बाद गांव के हर घर में भुण्डा उत्सव प्रवेश कर गया था सभी तैयारियों में जुट गए थे अपनी-अपनी तरह से सोचते-विचारते लोग जैसे-कैसे भी अपने खोए हुए पुण्य को फिर से कमाना चाहते थे अपने घर-परिवार, पशु और खेती को विपत्तियों से सदा-सदा के लिए मुक्त कर देना चाहते थे

भुण्डा उत्सव की प्रक्रियाएं प्रारम्भ हो गईं थीं सबसे पहले गावों वालों की एक सभा बुलाई गई सभा का आयोजन मुख्य देवता के मन्दिर के प्रांगण में हुआ था मन्दिर के मुख्य द्वार के सामने लगभग डेढ मीटर ऊंचाई