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बिजनेस वेब डॉट कॉम
एकबारगी मैं तो पहचान ही नहीं पाया उन्हें।
कहां
वो अन्नपूर्णा भाभी का चिर - परिचित नितांत घरेलू व्यक्तित्व और कहां आज
उनका ये अतिआधुनिक रूप ! चोटी से पांव तक बदली - बदली सी लग रही थीं।
वे
कस्बे के नये खुले इस फास्टफूड कॉर्नर से जिस व्यक्ति के साथ निकल रही थीं
,
वह
सोसायटी का भला आदमी नहीं कहा जा सकता था।
मुझे
तो ऐसा अनुभव हुआ कि सिर्फ संग - साथ वाली बात नहीं,
यहां
कुछ दूसरा मामला है।
क्योंकि वे बात - बेबात उस भले आदमी से सट - सट जा रही थीं,
जैसे
उसे पूरी तरह रिझाना चाहती हों।
आज
उन्होंने बनने संवरने में कोई कोर कसर नहीं छोड रखी थी।
उनके
चमक छोडते गोरे बदन पर सब कुछ दिखता है नुमा कपडे सरसरा रहे थे।
हल्की
शिफॉन की मेंहदी कलर की साडी से मैच करता लो कट ब्लाउज,
ऌसी
रंग की बिन्दी और कलाई भर चूडियां,
पांव
में मेंहदी कलर की ही चौडे पट्टे की डिजाइनदार चप्पलें और ताज्जुब तो ये कि
हाथ के पर्स का भी वही रंग।
मैं ने
उन्हें गौर से देखा तो ठगा सा खडा रह गया।
मैं
ऐसी जगह खडा था,
जहां से उन्हें निकलना था।
मुझे
यहां पाकर वे कोई संकोच अनुभव न करें,
इसलिये मैं वहां से हटा और पीसीओ बूथ की ओट में आ गया।
यह
संयोग ही था कि वे दोनों पीसीओ बूथ में प्रविष्ट हो गये।
वे कह
रहीं थी, ''
आप गलत अर्थ मत लगाइये, किसी
के यहां जाने से पहले आजकल फोन कर लेना ठीक रहता है,
पता नहीं वे फुरसत में हैं या नहीं,
या फिर उन्हें कहीं बाहर जाना हो,
या ये भी हो सकता है कि वे बाहर ही चले गये हों।''
बूथ
में फोन डायल करने तक सन्नाटा रहा,
फिर कुछ देर बाद आवाज ग़ूंजी - ''
हलो सिमरमपुर से! पटेल साहब हैं क्या?
मैं मनीराम बोल रहा
हूं।
जरा
बात कराइये उनसे।''
'' ''
''
हलो पटेल
साहब,
मैं ने
कहा था न,
मैं आज मिलने आ रहा हूं। उन्हें साथ ला रहा हूं।''
कुछ
देर बाद वे लोग बाहर आ गये।
मनीराम
ने जेब से चाबी निकाल कर अपनी बाइक स्टार्ट की और पीछे देखने लगा।
अन्नपूर्णा भाभी अपनेपन की भीरती खुशी से मुस्कुराती हुयी लपक कर मनीराम के
पीछे बैठ गयीं।
गियर
डाल के मनीराम ने गाडी
आगे
बढाई तो वे मनीराम पर लद सी गयीं।मैं
निराश सा वहां से मुडा और अपने बीमा ऑफिस की ओर चल पडा।
अगले
दिन मेरा मन न माना तो मैं सुबह - सुबह उनके घर जा धमका।
उनके
सरकारी क्वार्टर के बाहर,
बाऊण्ड्रीवाल पर पुरानी नाम पट्टिका की जगह पीतल की नयी
चमकदार नेम प्लेट लग चुकी थी- भरत वर्मा,
क्षेत्रीय अधिकारी।
मैं
प्रसन्न मन से भीतर घुसा और सोफा की सिंगल सीट पर पसर के बैठ गया।
वर्मा
जी मेरे ऐन सामने बैठे फिर मुस्कुराते हुए बोले
- ''
और सुनाइये, आपकी प्रोग्रेस
कैसी चल रही है? अब तक डी एम क्लब के मैम्बर
बने या नहीं?''
तभी
भीतर से अन्नपूर्णा भाभी की कौन है जी
,
मीठी आवाज
आयी
तो
मेरा दिल उछल कर हलक में आ गया,
मेरी निगाहें बैठक कक्ष के भीतरी दरवाजे पर टिक गयीं।
सुआपंखी रंग की जमीन पर गहरे काले रंग की छींट वाला,
सूती कपडे क़ा ढीला - ढाला गाउन पहने,
दोनों हाथ पीछे करके जूडा बांधती वे जब नमूदार हुईं,
तो मैं ठगा सा उन्हें देखता ही रह गया।
इस
अस्त - व्यस्त दशा में भी वे गजब की जम रहीं थीं।
मुझे
देखकर वे गहरे से मुस्कुराईं और हाथ जोड क़र बोलीं
- ''
अरे, गुप्ताजी आप आये हैं।
बडी
उमर है आपकी! मैं कल ही इनसे कह रही थी कि एक दिन आपसे मिलना है।
आप न
आते तो मैं आज ही आपके पास आ रही थी।''
हमें
बतियाता देख यकायक वर्मा जी चुपचाप खिसक गये।
और
जाने क्यों मैं खुद को सहज नहीं पा रहा था।
मुझे
सोच में पडा देख वे तपाक से बोलीं,
'' अरे, अमर किस टैन्शन में
फंसे हुए हो यार!''
मेरी
निगाह उनके मोहक चेहरे और ढीले - ढाले गाऊन में से उभरते उनके आकर्षक बदन
को ताकने का लोभ संवरण नहीं कर पा रही थीं और अब अपने को ताके जाने का
ज्ञान होने के बाद,
वे मुझसे नजरे नहीं मिला रही थीं,
छत को बेवजह घूर रही थीं और खुद को ठीक से ताकने का
मौका दे रही थीं।
शाम को
कार्यालय से लौटकर,
मैं बाथरूम से बाहर आया ही था कि पत्नी ने आंखें चमकाते
हुए कहा - '' जाओ,
बैठक में एक स्मार्ट और सुन्दर सी महिला आपसे मिलना चाहती है।''
शुभा
चाय लेकर आयी तो उन्होंने उठकर उससे नमस्ते की और बोलीं
- ''
आप भी बैठिये भाभी जी दरअसल मैं जिस काम से आयी हूं वो
आप दोनों पति - पत्नी मिलकर ज्यादा अच्छी तरह से कर सकेंगे।''
हमारी
चाय खत्म ही हुई थी कि उनके वे रिसोर्स परसन आ गये।
मैं ने
उनका स्वागत किया और अपना परिचय दिया,
'' मैं अमर गुप्ता, बीमा
एजेण्ट।''
मुझे
लगा खेल बिगड रहा है,
सो समझौते के स्वर में उससे कहा -
यार तुम भी बिना पढी - लिखी औरतों की तरह बातें करने
लगती हो।
वो
क्या हमारी जेब में हाथ डाल के रूपया निकाल लेगी?
अब कोई अपना माल दिखाये, तो
लो मत लो देखना तो चाहिये।
अपने
घर में हर सामान भरा पडा है,
हमको क्या खरीदना है? वो जो
बतायेगी, देख लेते हैं
।
बेचारी
को निराश काहे करती हो।''
मैं
बैठक में जाकर बैठ गया और उनके रिसोर्स परसन से बात करने के बहाने
मुस्कुराते हुए पूछने लगा
- ''
आप कहां रहते हैं मनीराम जी?''
इसके
बाद वे घर के अन्दर चली गयीं और कुछ देर बाद वे लौटी तो उनके साथ आंखों में
उलझन का भाव लिये शुभा भी थी।
मनीराम
जी ने उठ कर मेरी श्रीमति जी का अभिवादन किया बोला
- ''
भाभी जी मैं जम्बो कंपनी का एजेंट मनीराम
हूं।
माफी
चाहूंगा कि मैं आपके मूल्यवान समय में से दस मिनट ले रहा हूं।
आपको
अच्छा लगे तो आप मेर बिजनेस प्रपोजल पर विचार करें और न जमे तो कोई बात
नहीं।''
अब उसकी आवाज में मखमली अंदाज
आ
गया था,
'' सर, कभी आपने सोचा कि आप
दूसरों से हटकर यानि कि अलग हैं? दरअसल आपको
अपनी योग्यता के अनुरूप जॉब नहीं मिला है।
इसलिये
आप अपने वर्तमान व्यवसाय से पूरी तरह संतुष्ट नहीं होंगे मन में कहीं न
कहीं यह चाह रहती होगी यानि कि एक सपना होगा आपका भी कि आपके पास खूब सारा
पैसा हो! बडा सा बंगला हो शानदार कार हो! भाभी के पास ढेर सारे जेवर हों!
आपके बच्चे ऊंचे स्कूल में पढने जायें! आप लोग भी फॉरेन टूर पर जायें! यानि
कि आपके पास वे सारी सुख - सुविधाएं हों जो एक आदमी के जीवन को चैन से
गुजारने के लिये जरूरी हैं।
लेकिन
आप लोग मन मसोस के रह जाते हैं,
क्योंकि आपके सामने वैकल्पिक रूप में अपनी इतनी बडी
ऌच्छाएं पूरी करने के लिये कोई साधन नहीं है।
छोटी -
मोटी एजेंसी या नौकरी से यह काम पूरे नहीं होंगे,
हैं न! एम आय राईट?''
मैं ने
सहमति में सिर हिलाया
- ''
आप बिलकुल सही कह रहे हैं।''
मनीराम
द्वारा दिखाये गये सपने का जादू हम लोगों पर असर करने लगा था,
हम दोनों उसके चेहरे को मंत्रमुग्ध - से होकर ताकने लगे
थे, यह अनुभव करके वर्मा भाभी अब मनीराम की तरफ
बडे ग़र्व से देखने लगी थीं।
हठात्
शुभा ने मनीराम से पूछा,
'' आपके इन प्राडक्ट्स की कीमत क्या है?''
''
गुप्ता जी,
हमारे यहां कंज्यूमर अवेयरनेस अब भी उतनी ज्यादा नहीं है जितनी अमेरिका या
दूसरे यूरोपीय देशों में है। यह माल भी यूरोप में बनाया गया है,
इसलिये मैं दावा करता हूं कि उसमें मानव शरीर के लिये नुकसान देने वाला कोई
रसायन शामिल नहीं होता।''
''
इसकी
शुरुआत कैसे करनी पडती है?''
मुझे लगा कि प्रश्नों के बजाय मनीराम के सामने सीधा समर्पण कर दिया जाये तो
शायद इस बहस का अंत हो जायेगा।
''
देखिये
पहले मैं आपको गाइड लाइन समझा दूं। आपको सबसे पहाले घर में बैठ कर एक सूची
बनानी है,
जिसमें आप उन लोगों के नाम लिखेंगे जिनसे आपका धंधा हो सकता है। इस सूची
में आप फ्रैण्ड के नाम लिखेंगे।''
''
जाओ शुभा,
चाय ले आओ। आगे की चर्चा हम चाय के बाद करेंगे। मनीराम जी ने हमको मंत्र पढ
क़र मोहित सा कर दिया है,
शायद चाय उस जादू को तोडेग़ी।''
मैं ने शुभा से चिरौरी की,
तो
वह प्रसन्न मन से उठी और भीतर चली गयी। अन्नपूर्णा भाभी झट से उठीं और वे
भी उसके पीछे - पीछे भीतर जा पहुंची।
मनीराम
ने बैग में से एक कैसेट निकाली और कहा
- ''
इसे सुनकर आपको ग्राहक को डील करने की टैक्नीक ही नहीं,
इस तरह का काम करने वाले उन तमाम लोगों के विचार सुनने
को मिलेंगे, पहले जिनमें से हर कोई या तो छोटा -
मोटा दुकानदार था, या फिर छोटी - मोटी नौकरी
करके अपना गुजारा किया करता था और वे सब इस कंपनी को जॉइन करने के बाद आज
हर महीने लाखों में खेल रहे हैं।''
फिर
उसने वह सिस्टम समझाया जिसे अपना के हम भी लाखों में खेल सकते थे।
उसने
बताया कि हमको पहले ऐसे आठ लोगों को टारगेट बना के काम शुरु करना है,
जो एक्टिव हों और उनमें से हरेक आठ - आठ वितरक बना सके।
मनीराम
की बातें बडी
आकर्षक
थीं,
उनमें मोहक तथ्य थे, और
प्रमाणिक आंकडे भी, पर वह ऐसा प्लान था जिसे
हजारों - लाखों में शायद कोई एक चल पाता था।
उस दिन
हम लोगों ने विचार करने का समय मांगा और किसी तरह उन दोनों से मुक्ति पायी।
आठ दिन
बाद वर्मा भाभी एकाएक मेरे ऑफिस में आ धमकीं।
मैं उस
दिन अपने डैवलपमेन्ट ऑफिसर के पास बैठा था।
उन्हें
बैठा कर मैं ने मुस्कुराते हुए उनसे पूछा
- ''
कहिये भाभी जी, क्या हुकुम
है?''
हबल
चाय पीते हुए भाभी ने बताया कि दिल्ली में जम्बो कम्पनी की एक दिवसीय
सेमिनार है,
इसमें जिस वितरक को जाना हो वह सोलह सौ रुपए का टिकट
लेकर शामिल हो सकता है।
पता
लगा कि वे खुद के साथ मेरा भी टिकट ले आयी हैं।
मैं ना
नुकर करने वाला था कि वे बोलीं
- ''
दरअसल मनीराम जी के घर में गमी हो गयी है,
सो वे नहीं जा पा रहे, इस
कारण आपसे इसरार करने आयी हूं कि आप मेरे साथ चलें।''
मैं ने
अपनी जिन्दगी में अब तक बटेर नहीं देखी थी,
आंख मूंद कर बटेर की कल्पना करने लगा।
जब भी
मैं अपने स्मृतिफलक पर बटेर की छवि सृजित करने की कोशिश करता,
मुझे हर बार वर्मा भाभी की सूरत याद आ जाती तो मैं अनाम
और मीठी सी अनुभूतियों से भर उठता।
घर
पहुंचा,
तो शुभा चाय पकडाते हुए बडे प्रसन्न मन से सुना रही थी-
'' पता है, आज अपनी चिंकी की
टीचर कुलकर्णी मैडम आयी थी।
पैरेन्ट टीचर मीटींग में तो वे प्राय: मिलती रहती हैं।
पर इस
बार उनके आने की वजह वही जम्बो कम्पनी थी।''
मैं ने
जम्बो कंपनी के काम से ही वर्मा भभी के साथ दिल्ली जाने की सूचना दी तो
यकायक शुभा जिद करने लगी कि वह भी दिल्ली जाना चाहती है।
मेरी
सारी उमंग समाप्त हो गयी।
लेकिन
दिल्ली तो जाना ही पडा।
अलबत्ता दिल्ली यात्रा में मुझे वो आनंद नहीं आया,
जैसी कि मैं कल्पना कर रहा था।
हां,
ग्राहक को डील करने की कला,
नये प्रोडक्ट्स का परिचय और नयी स्कीमों के बारे में बहुत कुछ सीखने को
मिला।
कुछ
बातें ऐसी भी सीखने को मिलीं जो बीमा एजेंट होने के नाते मेरे जॉब के लिये
लाभदायक हो सकती थीं।
एक दिन
रात आठ बजे मैं अपने एक पॉलिसी हॉल्डर से प्रीमियम लेने वर्मा जी के
मोहल्ले की तरफ जा निकला और वहां से लौट ही रहा था ेल् अन्नपूर्णा भाभी से
मिलने का मन हो आया।
वर्मा
जी दरवाजा खोल कर बैठे थे और मेरी गाडी क़ो उन्होंने मनीराम की गाडी समझा।
पहले
तो मायूस हुए फिर मुझे देख कर मुस्कुराये।
मैं ने
भाभी के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि सुबह से वे मनीराम के साथ गयी
हैं,
और अब तक लौटी नहीं हैं।
मैं ने
दुखी से स्वर में उनसे कहा
- ''
इस तरह बिजनेस के लिये भाभी के प्राय: घर से बाहर रहने
पर आपको दिक्कत तो होती होगी!''
''
कहिये आप
कैसे पधारे?''
वर्मा जी ने सहसा मुझे सकते की स्थिति में डाल दिया था।
मैं ने
उडती नजर से देखा वर्मा जी के घर में बैठक ही नहीं,
स्टोर, किचन और यहां तक कि
बेडरूम में भी यानि कि हर जगह अन्नपूर्णा भाभी की कंपनी की चीजें बिखरी पडी
थीं।
लग रहा
था कि इस नयी तरक्की यानि भूमण्डलीकरण के इस नये दौर में बहुत कुछ बदला है।
जिस
चीज क़े लिये जो जगह निश्चित की गयी है,
अब वो केवल वहीं नहीं मिलती,
सब जगह मिल जाती है! चीजें तेजी से अपनी जगह बदल रही हैं! बाजार केवल
बाजार तक सीमित नहीं रह गया! अब वर्मा जी जैसे कई घरों में बाजार स्वयं घुस
आया है - अपने पूरे संस्कार,
आचरण, आदतों और बुराइयों के
साथ!
घर
लौटते वक्त मैं मन ही मन तरक्की के लाभ - हानि का बहीखाता तैयार कर रहा था,
जिसमें मैं और मेरी पत्नी शुभा भी शायद अपनी प्रविष्टि
के लिये आतुर थे।
राजनारायण बोहरे |
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