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ये रात
कितनी लंबी
है
आज स्कूल का वार्षिक फंक्शन है,
सुबह सात बजे से मैं यहीं
हूं...
सारी तैयारियां अपने चरम पर
हैं। रिहर्सल जितनी होती थी,
हो चुकी। पिछले महीने तो
मैंने पांच-पांच,
छ:-छ: घंटे रिहर्सल करवायी है,
जब तक बच्चे थककर चूर नहीं हो
जाते। सुबह सात से शाम
छ: बजे तक...। आज तो बस बारी-बारी तैयार कर इन्हें स्टेज पर
भेजना है। मैं नहीं
चाहती, मेरी क्लास के
बच्चे किसी से भी पीछे रहें। पीछे रहने की
सजा मैं अभी तक भुगत रही
हूं...। हम मेकअप रूम में हैं... चारों तरफ बच्चों का शोर,
नये कपड़ों की जगमगाहट और ढेर
सारी खुशबुएं हैं...। कुछ कत्थक की रिहर्सल कर रहे
हैं,
कुछ क्लासिकल सिंगिंग की...।
क्लास सिक्स की बच्ची अजीत कौर गा रही है... `मधाणियां,
हाय... ओ मेरे डाडेया रब्बा
कीनां जम्मियां किनां ने ले जाणीयां,
हाय।
`मेंहदी लगदी सुहागणं नु नहींयो
मरदे दमां तक लहंदी।'
मैं उसकी तरफ
प्यार से देखती हूं,
यह तो ठीक-ठाक जानती ही नहीं,
इन शब्दों का अर्थ...। यह गीत
इसकी मां ने तैयार
करवाया है, मैंने सिर्फ
रिहर्सल करवायी है।
`वाहे गुरु,
जे
मेरा ए कम ठीक-ठाक हो
गया, तां मैं तेरे दर ते
मथ्था टेकणं आवांगी।'
मैंने मन
में कहा। सब कुछ
अस्त-व्यस्त... किसी को कुछ नहीं मिल रहा,
किसी को कुछ...। मेरी
बेटी अपर्णा भी क्लासिकल
डांस में है, मात्र दस
साल की है अभी, बार-बार
कुछ न कुछ
पूछने चली आती है। भीड़ में उसे
अपने खो जाने का अहसास होता है। इतना अच्छा
परफार्मेंस वह पिछले तीन साल से
दे रही है, जब मैं उसे
अपने साथ इस स्कूल में ले आई
हूं। पुराने स्कूल की प्रिंसिपल
का हर शनिवार फोन आता, `आपकी
बेटी को क्या कोई
मेंटल प्राब्लम है?
सारे दिन में एक भी शब्द नहीं
कहती। न हंसती है, न
रोतीज्ञ् बस
टक लगाकर एक तरफ देखती रहती है।
कुछ पूछो तो सिर झुका लेती है। आप कृपया इसे कहीं
और ले जाइये।'
मेरे भीतर कुछ सुलगने लगता...
जी चाहता कहूं...हां है,
सभी को
होती है। आपको भी है,
मुझे भी। अपनी तो कमी पता ही
नहीं चलती, दूसरे की चल
जाती है। `कहीं और'
से क्या मतलब है आपका?
आखिर मैं उसे निकाल लाई। स्कूल
से भी, उससे
अपने भीतर से भी। आसान
नहीं होता कुछ भी, करना
पड़ता है आसान, मानना
पड़ता है कि
आसान है,
इसमें क्या है?
`मम्मा... मम्मा...। मुझे
देखो...।' वह तैयार होकर
आई
है,
विभिन्न मुद्राआें में खुद को
दिखा मेरी आंखों में अपना वजूद ढूंढ़ती है...।
मुझे उस पर लाड़ आता है,
पास खींचकर उसका माथा चूम लेती
हूंज्ञ् `आज अपने आप
करो।
आज मम्मा को और भी बहुत काम हैं
ना' मैंने पंजाबी में
कहा।
जब सारे तैयार हो गये
तो प्रोग्राम शुरू होने
में बस एक घंटा बाकी था। मैंने बारी-बारी सबको बुलाया सबके
ड्रेसेस ठीक-ठाक किये,
उन्हें उनका काम फिर से याद
दिलाया, पीठ थपथपाकर
हौसला
बढ़ाया,
सिर पर हाथ फेरा। वे मुस्कराने
लगे। एक स्पर्श और आपके भीतर जाने कितने
दरवाजे खुल जाते हैं। यह मैंने
बहुत देर से जाना, जब
अपने सभी दरवाजों को बारी-बारी
बंद होते देखा।
`तुसी उना नूं जादा प्यार करदे
हो, मैनूं घट करदेहो।'
अपर्णा
शिकायत करती है तो मुझे
हंसी आ जाती है। मैं सब बच्चों को प्यार करती हूं। सब अच्छे
हैं,
पर...?
दुनिया उतनी अच्छी नहीं है,
जितनी हम चाहते हैं कि हो। मेरी
स्टुडेंट्स
पर इतनी मेहनत भी सबको अच्छी
नहीं लगती। उन्हें लगता है,
ऐसा मैं जान-बूझकर करती
हूं,
उन्हें नाकाबिल टीचर सिद्ध करने
के लिये। बाहर से कभी कुछ नहीं आता,
सब हमारे
भीतर है,
यह भी मैंने बहुत देर से जाना।
हम सब जैसे आज हैं, उससे
अच्छे और बेहतर हो
सकते थे यदि हम पर हमारे
मां-बाप और टीचर्स ने और ज्यादा ध्यान दिया होता। किसी को
हमेशा के लिए उसके हाल
पर छोड़ देना, सिर्फ
अपने काम से काम रखना,
यह क्या हमारी
अपनी कुंठा नहीं?
हम कर सकते थे,
हमने नहीं किया। मैं सेवेंथ और
एर्थ के बच्चों को
पढ़ाती हूं,
डांस और म्यूजिक के लिए मेरे
पास सातवीं, आठवीं,
नवीं,
दसवीं के बच्चे
होते हैं। बच्चों से तो
मैं हमेशा घिरी रहती हूं। वे मुझे पसंद करते हैं,
मैं
उन्हें...। बच्चे हमसे
पर्सनल प्रश्न नहीं पूछते,
वे जैसे हम हैं,
स्वीकार कर लेते
हैं। वे भी हमसे यही
चाहते हैंज्ञ् अपना स्वीकार्य...।
जब सब तैयार हो गया,
मैंने शांति की सांस लीज्ञ्
सबको बुलायाज्ञ्
`देखो बच्चो,
तुम लोग चाहते हो न कि
हमारी मेहनत सफल हो,
तो तुम्हें अपने पूरे मन से
करना होगा, तुम सब मुझे
खुश देखना
चाहते हो,
है न?'
बच्चों ने तुरन्त अपने
मुस्कानों भरे चेहरे हिलाये। मैं जानती
हूं,
वे मुझे उदास नहीं देख सकते।
प्रोग्राम शुरू हुआ... मैं
बारी-बारी सभी
क्लासेस के बच्चों को भेजती।
दूसरों के पास समय नहीं होता कि वे बच्चों की तैयारी
करवा सकें। मेरे पास और
क्या था समय के अलावा...। `जब
आपके पास जीने के लिए अपनी
ज़िन्दगी नहीं बचती,
आप दूसरों के लिए जीने लगते
हैं।' ये सब कहते
हैंज्ञ् कभी
घुमा-फिराकर,
कभी सीधे।
बारी-बारी से सारे बच्चे गये और
मेरी खुशी का ठिकाना न
रहा,
जब लगभग सभी क्लासेस के बच्चों
ने अच्छी परफार्मेंस दी और वापस आकर दौड़ते हुए
मुझे घेर लिया,
मैंने उन सबको अपनी आंखों में
भर लिया, मेरी आंखों में
खुशी के आंसू
थे। यहीं आकर लगता है,
हम हैं,
हम हैं।
फिर सबने अपने-अपने हिस्से का
भाषण दिया।
कुछ बच्चे पुरस्कृत किये गये।
मेरी हैरानी की सीमा न रही,
जब प्रिंसिपल साहब ने
मुझे `बेस्ट
टीचर' के अवार्ड से
नवाजा और मुझसे स्टेज पर आने का आग्रह किया। वह पल
अपूर्व था। मेरे भीतर
कुछ कांप रहा था,
शिराआें में सनसनी थी। सबसे नालायक घोषित
हुई थी अपने घर में,...
सबसे निचली सीढ़ी...,
जिसे ऊपर जाने के लिए इस्तेमाल
किया
जाता है,
यह सहसा इतनी ऊंची सीढ़ी पर
अपना होना, मैं स्टेज तक
गयी, सिर्फ ज़रा सा
रास्ता पार करते-करते
मैं समूची बदल गयी...आश्र्चर्य,
अब न मेरे पैर कांप रहे हैं,
न हृदय... मेरा चेहरा और मेरी
कनपटियां गर्म थीं... हो सकता है,
मैं लाल भी हो गयी
होऊं... पर फिर मैंने
खुद पर पहली विजय पायी,
मैंने अपने `ना कुछ'
होने के अहसास को
अपने भीतर से गिर जाने
दिया और मजबूत कदमों से वहां तक पहुंच गई। तालियों की
गड़गड़ाहट के बीच एक ने
आगे बढ़कर मुझे फूलों का गुलदस्ता दिया,
दूसरी ने मुझ पर
शॉल ओढ़ायी... प्रिंसिपल
साहब ने कांच का एक बड़ा-सा मैडल दिया,...
तस्वीरें खींची
गयीं। सबका अभिवादन करने
के बाद मैं माइक तक आई। मैंने अपने सामने देखा,...
जहां तक
नज़र जाती लोग ही लोग,...
हमारे स्कूल के बच्चों के
पैरेंट्स, अन्य स्कूलों
के आये
डेलीगेट्स।
मुझे ठीक-ठीक याद नहीं कि मैंने
क्या कहा, सार यह कि
मेरे संपर्क में
आने वाला कोई भी बच्चा मुझसे
उपेक्षित नहीं होगा,
चाहे वह किसी भी क्लास का हो।
कहते हुए मेरी नज़र उस महिला पर
पड़ी, जो खड़ी होकर
तालियां बजा रही थी,...
मेरी
नज़रें उससे टकरायीं,
उसने अपने सीने पर हाथ रख झुककर
मेरा अभिवादन किया, मेरी
आवाज़ भीग गई। उतनी दूर
से भी मैं उन आंखों में आंसू देख सकती थी।
आंसुआें और
औरत का रिश्ता बडा अजीब
है। जैसे पानी हमेशा नीचे की तरफ बहता है,
आंसू भी औरत की
छाती के खाली गड्ढे में
इकट्ठे होते जाते हैं। ये गड्ढा कभी सूखता नहीं। जब भी
इन्हें निकासी का कोई
रास्ता मिल जाता है,
भूल-चूक से,... बाहर आने
शुरू हो जाते
हैं। न मिले तो अपना फार्म
बदलते रहते हैं। कभी सख्त बर्फ से भीतर जम जाएंगे,
आप
कितना भी सरकाओ,...
न नीचे होंगे,
न ऊपर,...
कभी धुएं की मानिंद आपकी आंखों
में
उड़ा करेंगे,...
तब आपको कोई भी रास्ता ठीक-ठीक
दिखायी नहीं देगा।
अपने छोटे से
भावात्मक भाषण के बाद
मैं परदे के पीछे आ गई,...
मेक'प
रूम में बच्चों की ड्रेसेस
उतरवाने में उनकी मदद करने लगी,...
पर मैं सहज नहीं थी,
एकाएक मुझ पर बहुत सारी
चीज़ों ने हमला कर दिया
था।
प्रोग्राम खत्म होने के बाद वह
महिला अपनी बेटी को
लेने आई। उसकी बेटी दूसरे
बच्चों के साथ खिलखिला रही थीज्ञ् वह कुछ पल उसे देखती
रही फिर मेरे निकट आ
मेरे दोनों हाथ पकड़कर चूम लिये।
`आज मैं रब अगे अरदास कर
दीयां कि रब तुहाडी सारी
मुराद पूरी करे।'
मैं मुस्करा दी। मैंने उसके हाथ
थपथपा
दिये। वे अपनी बच्ची को लेकर
चली गयीं।
अभी तक अपर्णा को कत्थक का
जुनून उतरा
नहीं था,
वह अपनी ड्रेस तक उतरवाने को
तैयार नहीं थी।
मैं तनिक
सांस लेने कुर्सी पर बैठ गयी। बच्चों को हंसते-बोलते-लड़ते देखती
रही।
मुझे उनका अपने हाथों पर स्नेह
से चूमना देर तक याद आता रहा। मुझे याद नहीं
आता,
कभी मेरी मां ने मुझे इस तरह
चूमा हो। क्या करते हैं,
जब आप किसी को चूमते है?
अपना समूचा प्रेम,
समर्पण, समूचा आह्लाद,
खुशी,
कुछ अप्रतिम सा,
जिसे शब्द देने में
आप सबसे ज्यादा असमर्थ
हों आपके थरथराते होंठों से बाहर आता है,...
उस दूसरे की
त्वचा में समा जाता है।
वह कहीं जाता नहीं,...
वहीं रहता है हमेशा। गहरी काली रात
के अंतहीन अकेले पलों में उस एक
पल की जगमगाहट को अपने सीने में भींच आप रात
गुजारने की कोशिश करते हैं।
वर्डबेस कम्यूनिकेशन। आज पहली बार जी किया,
मैं अपनी
तन्हा आत्मा को चूम लूं।
ऐसा क्यों होता है,
जब कोई तुम्हें प्यार नहीं करता,
तब
तुम भी खुद से नहीं कर
पाते। पर जब कोई दूसरा तुम्हें प्यार करने लगता है,
तुम भी
करने लगते हो। क्यों
?
वे सत्र के मध्य में आई थीं,
अपनी आठ वर्षीय बच्ची को
लेकर। उनका कहना था,
उनकी बच्ची पहले जिस स्कूल में
पढ़ती थी, वहां किसी चीज
में
अच्छी नहीं थी,
न पढ़ने में,
न किसी और ऐक्टिविटी में। हमेशा
गुमसुम खामोश, डरी
हुई,
नींद में रोने व चीखने के
अलावा। जब कोई टीचर किसी और बच्चे को डांट रही
होती,...
तो वह पीली पड़ जाती- उसके
हाथ-पैर ठंडे हो जाते। उन्होंने प्रिंसिपल साहब
से रिक्वेस्ट की कि उनकी
बच्ची को इषिता कौर मैम की क्लास में डाला जाये। वजह पूछने
पर उन्होंने बताया कि
मैंने उनकी बहुत तारीफ सुनी है। उन्होंने बहुत से बिगड़े और
डरे हुए बच्चों को ठीक
किया है। उनकी क्लास में बच्चे बहुत खुश रहते हैं। मेरी कलास
में ऑलरेडी बहुत बच्चे
थे। आखिर जैसे-तैसे उन्होंने प्रिंसिपल साब से `हां'
करवायी
और उनकी बच्ची मेरी
क्लास में आ गई।
जैसा कि आमतौर पर होता है,
मेरी क्लास के
बच्चे बिल्कुल शांत और
अनुशासित होकर नहीं बैठते। उन्हें छूट होती है कि वे बातें
कर सकें,
शोर भी कर सकें। मैं उन्हें उस
तरह नहीं पढ़ाती, जैसी
दूसरी टीचर्स। मुझसे
हर बच्चा अपनी प्राब्लम शेयर कर
सकता है। कोई खाना नहीं खाता तो मैं उसे खिला देती
हूं। उनकी जेब में पड़ी
हुई सारी चीजें बस मेरी ही क्लास में बाहर आती हैं उनके
भीतर दबी बातों और आवारा
इच्छाआें की तरह। कोई नाराज हो तो गुदगुदा कर हंसा देती
हूं,
रूठे हुआें की दोस्ती करा देती
हूं।
पहले पहल जब मैंने उनकी क्लासेस
लेनी
शुरू की तो उन्होंने मेरे
स्वभाव का बहुत फायदा उठाया,...
इतना शोर,
इतनी
अस्त-व्यस्तता कि मैं
खीझकर रो पड़ीज्ञ्
`तुम्हें जो करना है,
करो। अब मैं
तुम्हें नहीं पढ़ाऊंगी।'
मैं उठकर बाहर जाने लगी। सारी
क्लास। एकदम
चुप।
`सॉरी मैम,
अब हम शैतानी नहीं करेंगे।'
पीछे से आवाज़ें आइंर् और मैं
मुस्कराती हुई लौट पड़ी।
इन्हें हमेशा नहीं पढ़ाया जा सकता। न ही ये हमेशा एक ही
ढंग की मांग करते हैं।
जब इन्हें पता नहीं होता कि इन्हें पढ़ाया या लिखाया जा रहा
है,
ये जल्दी सीख जाते हैं। स्पर्श
इन्हें राहत देता हैज्ञ् सिर पर हाथ फेरना,
पीठ
थपथपाना,
एप्रिशियेट करना महज आंखों से
छूकर, गाल पर हल्की-सी
थपकी देना इनके भीतर
काफी कुछ बदल देता है। स्पर्श,
लगाव,
स्नेह,
प्यार,
केयर,
किसी को सुनना-समझना।
इनका अपार भंडार होता है,
हमारे भीतर,
आप कितना भी दो,
कम नहीं होता। फिर भी जाने
क्यों लोग ये सब देते
नहींज्ञ् घट जायेगा जैसे देने से...।
`तुसी मेरे वल तां
नहीं तकदे,
सारयां वल तकदे हो।'
अपर्णा ने आकर मुझे हिलाया।
मैंने उसे अपने गले
से लगा लिया,
वह शांत हो गयी।
सत्र के अंत में जब उस महिला,
परमजीत नाम है उसका,
की बच्ची सेकेण्ड डिवीजन में
पास हुई तो वे खुशी के मारे रो पड़ी। मेरे आग्रह पर
उसने बताया कि वह अपने
फादर से बहुत डरती है,
मुझे कई बार मार खाते देख चुकी है। एक
बार वे पीकर आये,
उनसे सब्र नहीं हो रहा था,
उन्होंने बच्ची को उठाकर बाहर
फेंक
दिया और दरवाजा अंदर से बंद कर
दिया। घंटे भर वह बाहर ठंड में बेहोश पड़ी रही,...
मैं भीतर। बेहोशी में जीना आसान
होता है, आपको पता ही
नहीं चलता, आपके ऊपर से
क्या-क्या गुजर गया। होश
सब याद दिला देता है। सारे दर्द होश के दर्द हैं।
आपने
किसी महिला को छत पर
बड़ियां बनाते, सुखाते,
उतारते,
रांधते देखा है?
अपने ज़ख्मों
के साथ भी वे यही करती
है। आंसुआें को घूंट के साथ गले के नीचे उतारने का काम।
बाहर ग्राउण्ड में भीड़
धीरे-धीरे छंटने लगी। अपने बच्चों के साथ सब अपने-अपने
घर लौट रहे हैं,
उनकी उंगली पकड़े। मैं अपर्णा
का हाथ पकड़े उन्हें जाते हुए देख
रही हूं।
न किसी ने मेरी उंगली पकड़ी,
न कभी मेरा घर बन सका। औरतों का
क्या
सचमुच में कोई घर होता है या वे
दिखावा करती हैं, दूसरे
की चीज़ जबरदस्ती अपनी
मानने का दिखावा।
हम दोनों मां-बेटी भी घर वापस
लौटने लगे। अपनी मां और नानी मां
के घर। मैंने मां से इतना कहा
कि वे भी आकर प्रोग्राम देखें हमारा। उनका पेटेंट
जवाब थाज्ञ्
`मैं जाके की करांगी।'
जिन्हें अपने बच्चों को देखने
की फुरसत
नहीं मिली,
वे किन्हीं और बच्चों को देखने
क्यों जायेंगी?
आज उन्हें देखती
हूंज्ञ् बूढ़ा,
नाटा,
झुका हुआ शरीर,
झुर्रियों से अटा बेजान चेहरा,..
समय अपनी छाप
छोड़े बिना कहीं से नहीं
गुजरता। क्या देखा है,
उन्होंने अपने जीवन में?
क्या वे
सचमुच उतनी ही दोषी हैं,
जितना उन्हें मैं समझती हूं।
मेरे भीतर रक्तरंजित
लोथड़े हैं,
ऐसा विनाशकारी दृश्य जैसे किसी
जंगल में तीका आंधी आने के पश्र्चात
होता है। हर वृक्ष अपनी जगह से
उखड़कर ठूंठ में तब्दील हो चुका,
हर घोंसला मिट्टी
हो चुका,...
हर तिनका राख।
मुझे अपने पापा की बहुत याद
नहीं है। हम तीन बहने।
मैं सबसे छोटी,
सबकी आज्ञाकारी। सब मुझ पर हुकम
चला सकते हैं, मैं किसी
पर नहीं,... मैं सिर्फ
उनसे बचने के तरीके सोचती,...
नाकामयाब तरीके,
क्योंकि हर बार धर ली
जाती। पापा मनमाड में
रहते थे, हम पटियाले में
अपनी नानी मां के एक पुराने घर में,
जिसे वे `कोठी'
कहती हैं। नानाजी डॉक्टर,...
मां स्कूल में टीचर। बीजी हमें
मनमाड
भेजने को राजी नहीं होती थी।
`तुसीं सारे उथे जाके की करोगे,
उथे स्कूल वी चंगे
नहीं हन।'
हम सिर्फ छुटि्टयों में उनके
पास जाते थे। मुझे याद है,...
मैं छठवीं
में थी,
जब हम वहां आखिरी बार गये थे।
वे मुझे अपने स्कूटर पर सामने खड़ाकर घुमाने
ले जाते,
खूब अच्छी-अच्छी चीजें खिलाते।
मैं सबसे छोटी थी, शायद
इसलिए सबसे ज्यादा
लाड़ आता था उन्हें मुझ पर। कभी
दो, कभी डेढ़ महीने वहां
रहकर हम लौट आते। उन दिनों
भी वे एक-दूसरे से खूब झगड़ते।
मुझे कभी समझ में नहीं आता कि वे झगड़ा क्यों कर रहे
हैं?
मां ने बताया था कि शादी के
वक्त वे फौज में थे। एट्टी फोर में उन्होंने फौज
की सर्विस छोड़ दी,
कहा,
मैं बिजनेस करूंगा। अब एक बार
फौज में रहने के बाद कोई
बिजनेस कर सकता है?
कई बिजनेस बदलने के बाद भी
उन्हें सफलता नहीं मिली। असफलताआें
ने उन्हें बुरी तरह तोड़ दिया।
वे बेतहाशा पीने लगे,
उन्हें डिप्रेशन के दौरे पड़ने
लगे। एक बार ऐसे ही दौरे में
उन्होंने घर की कांच की खिड़कियां तोड़ डालीं। मनमाड
में रह रही उनकी बहन ने
उन्हें नासिक के एक अच्छे हॉस्पीटल में भर्ती कराया। मां
कभी इधर,
कभी उधर,
हम बीजी की कृपा पर...।
एक बार जब
वे हॉस्पीटल में ही थे,
आधी रात को उन्होंने एक नर्स को पकड़ लिया,
अपनी
ड्यूटी पर थी वह। उसने
बहुत शोर मचाया। उसी समय आधी रात को मनमाड उनकी बहन के पास
फोन आया कि `आप
अपने पेशेन्ट को ले जाइये। हम उसे इसी वक्त बाहर करते हैं।'
बहिन
जाकर उन्हें ले आई वापस
मनमाड... वहीं उनकी मृत्यु हो गयी।
हमारे पास जब समाचार
आया,
मां स्कूल गयी हुई थीज्ञ् खत
उर्दू में था। हमें तो आता नहीं था उर्दू पढ़ना।
नानाजी ने पढ़ा,
फिर बीजी से कुछ कहा। वे बस
उदास हो गयीं। दोपहर को मम्मीजी घर
आइंर्... उन्हें कुछ बताया गया,
वे छोटी-सी कोठरी में गयी,
अपनी बिंदी उतार दी और
रोने लगीं। उनकी
देखा-देखी मेरी दोनों बहनें भी रोन लगीं,
फिर मैं भी...।
फिर हम
उन्हें भूल गये। हम
धीरे-धीरे बड़े हो रहे थेज्ञ् गालियां सुनते,
मार खाते,
दिन भर
क्लेश झेलते। मां के पास
हताशा थी, निराशा थी,
डर था। वही हमें देती। घर में
मेरी
मंझली बहिन का राज चलता। कभी
मैं मां के हाथों पीटती,
कभी मंझली बहिन के। बचपन में
ही हर बात सहने की आदत ने काफी
लंबा साथ निभाया। मेरे पास मेरा कुछ नहीं था। हर चीज
मुझसे छीनी जा सकती है,
ये सभी जानते हैं।
बहुत से दोस्त बनें,
बनकर बिछड़ गये।
मैंने खुद को बड़ा होते
हुए देखा, अपने शरीरिक
परिवर्तनों को पहले आश्र्चर्य से फिर
आदतन देखा।
घर में हम औरते थीं। मम्मीजी
कपड़े धोते मातम करतीं।
`हॉय रब्बा,
सारियां फ्राकां ही धोणियां
पैंदिया ने - कोई तां पैंट-कमीज धुवांदा इना हथां उे
नाल'।
मैं पढ़ने में सबसे होशियार थी।
कोई मुझ पर ध्यान नहीं देता था,
पर मैं
हर बात में आगे थी।
सुन्दर तो खैर थी ही। सुन्दरता औरत के लिए अभिशाप और वरदान
दोनों ही होती हैज्ञ् यह
मैंने बाद में जानाज्ञ् बहुत कुछ अपने जीवन से,
बहुत कुछ
खूबसूरत औरतों की
ऑटोबॉयोग्राफी पढ़कर।
बीजी अक्सर बीमार रहती हैंज्ञ्
या तो
उन्हें कब्ज हो जाता है या
दस्त..। या तो उनकी टट्टी साफ करो या उन्हें एनीमा दो।
वे सारे काम जो घर में
कोई नहीं करता, मुझे
करने पड़ते। वे अपना पास्ट इस तरह
बड़बड़ाती जैसे वे किसी बार-बार
देखी फिल्म के याद रह गये दृश्यों को दोहरा रही
हों। पगड़ियों के रंगों
को लेकरज्ञ् घर में मौजूद सामान तक। उन्हें बाहर से कम
दिखता है पर भीतर के
दृश्य वे अब भी काफी साफ देख लेती हैं। कभी-कभी गड़बड़ा जाती
हैं,
तारीखें इधर-उधर हो जाती हैं।
हम अपने भीतर ठीक कर लेते हैं। उनके टुकड़े हर
उस वक्त मेरे कानों में पड़ते,
जब वे किसी अजनबी को अपनी
दास्तान सुनातीं पंजाबी
में।
`हम तो यहां आकर बस फंस गये
जी... बारह साल से रह रहे थे बैंकाक में,...
बच्चों के साथ। वहां इनका
प्राइवेट हॉस्पीटल था,
पेशेन्ट का इलाज वे ठेके पर करते
थे। द्वितीय विश्वयुद्ध चल रहा
था, सुभाषचन्द्र बोस
कलकत्ता में नज़रबंद थे,
वहां
से फरार होकर १९४१ में वे
बर्लिन (जर्मनी) पहुंचे। वहां वो रेडिया पर भाषण देते थे।
उनके भाषण की शुरुआत इस
तरह होती थीज्ञ् `मैं
सुभाष बोल रहा हूं।'
उनके भाषण बड़े
भा |