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लघुकथा
संतोष
मकान का काम लगा हुआ था । करीब ६ मजदूर २ मिस्त्री काम पर थे । मदन मजदूर ठीक ८ बजे सुबह आ जाता व ५ बजे अपने घर चला जाता । वह सबसे मेहनती व खुशमिजाज़ इन्सान था । मकान का काम जब तेज़ी पर था तो मैंने मजदूरों को ओवरटाईम देकर पगार बढ़ाकर लालच दिया, कि काम जल्दी निपट जाये । मेरी छुट्टियाँ भी कम रह गईं थीं । मदन को छोड़कर सारे मजदूर इसके लिये राजी हो गये । दूसरे दिन जब मदन घर पर जाने लगा तो मैंने पूछा, ``क्यों भई, पैसे बुरे लगते हैं क्या, तुम भी रूक जाओ ।''

वह रूका, मुस्काया व बोला, ``साहिबा, घर पर ५ बते के बाद घरवाली बाट जोहती है, बच्चे खेलते-कूदते मेरा इन्तजार करते हैं । हम सब इकट्ठे चाय-पानी पीतें, रोटी खाते हैं । हम खुश हैं, साहिबा । पैसा जितना आएगा, खुशियाँ ले जायेगा । सलाम, साहिबा।'' और वो अपना रोटी का डिब्बा उठाये चला गया व मैं राह ताकती रह गयी ।


 

शबनम शर्मा
अप्रेल 1
, 2006
 

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