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राग भैरवी
सबेरे जब जगा तो धूप खिड़की पर बैठी थी । तबीयत तो हुई कि उठूं अलसाया सा ही
सही पकड़ूं धूप को । पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी । धूप मेरी पहुंच से बाहर
ख़िड़की के पार पेड़ की फुनगी पर बैठी थी । पतों के पार से भी न जाने कितने
घरों की रेडियो और हजार वाट वाले पीएमपीओ के कर्ण कटु गानों को गडमड करता हुआ
कुछ ऐसी आवाज कानों में जा रही थी कि शब्द ही नहीं स्वर भी समझ के बाहर थे ।
पता नहीं धूप र्पर्तोंखिड़की में क्या रिश्ता है कि पतों के पार से सरक कर
कमरे में फैलने लगी । ऐसे में मुंह चादर से ढांप कर एक और नींद ले लेना ही
बेरोजगार के लिए बढ़िया होता है । किशोरपन में पढ़ी जासूसी किताब की याद आती
है : किस किस को याद कीजिए किस किस को रोईए
आराम बड़ी चीज है मुंह ढांप कर सोईए
लेकिन सिर्फ उनींदी करवट ही ले पाया था कि अर्थमय
- अनर्थमय आवाज कान से टकराई
" सानू अ़री ओ सानू द़ेख तेरे चचा जगे हैं क्या
? ''
" मां हमें स्कूल जाना है । चाचा होंगे तो उठने में दस मिनट लगाएंगे और सोये
होंगे तो पांच मिनट खाएंगे, स्कूल में देर हो जाएगी ।"
"शाबाश बेटी " चादर से मुंह ढांपते हुए मैंने अपने आप से वादा किया " शाम को
तेरी चाकलेट पक्क?"
फिर वही कालेज में जाने के दिन से सुनी रटी रटाई बात "अजी सुनते हो जी भ़इया
जवान हो गए ।अब इनकी शादी वादी करवा दो। मेरे बस के बाहर है सुबह सुबह चाय के
साथ जगाना । देवरानी आएगी तो वही जगाएगी । "
" आदत तो तुमने ही बिगाड़ी है तो तुम्ही भुगतो । कभी हमें भी जगाया है का चाय
के साथ।और भइया जवान हो गए का क्या मतलब र् हम बुढा गए का $ एक चाय इधर भी
देते जाना भइया की भौजाई । "
जिंदाबाद भइया, भाई हो तो ऐसा का नारा लगाने की तबीयत हुई । पर राग भैरवी
में राग चिंघाड़ का का मतलब । वही हुआ जो होता आया है कि जवानी बरबाद कर दी
हमने दो भाई पालने में ।
इससे तो अच्छा हम कंवारी ही रहतीं ।
इसका मतलब यह हुआ कि अगले इतवार को भइया के स्कूटर के आगे सानू खड़ी होगी और
पीछे भाभी बैठी होंगी ।हमारी भाभी की कंवारी होने का अर्थ सिनेमा देखना होता
है । मगर मामला कंवारी से बढ़ कर मायके तक जा पहुंचा । यानी भाभी जी असली वाली
गुस्से में है । हमारे भाई साहब की नीति ऐसे समय चुप रहने की होती है । बेचारे
एक बार टकराए थे भाभी से और सचमुच में मायके जाना पड़ा था। भाभी का मायका नहीं
अ़पने गांव, हमारी अम्मा के पास । अम्मा की कोई बिटिया नहीं है । उनके
प्रिय पतिदेव यानी हमारे पिताश्री को शहर का कुछ भी पस्ंाद नहीं है । अपन्ने
दोनों बेटों को अपने पूर्व जन्म का पाप मानते हैं । बड़ा पढ़ लिख कर घूसखोर
किरानी ही नहीं मेहरिया के पल्लू में भी छिपा रहता है और छोटा यानी मैं पढ़
लिख कर भी निखट्टू,
निक्कम्मा ही नहीं बल्कि बराबरी की बात करता है कि गांव
आता है तो नीच जात के साथ उठना बैठना ही नहीं खाता पीता भी है । इस लिए मन
मसोस कर अपनी बिटिया यानी बहू और दुलारे बेटों से दूर गांव में अपने पति के
साथ रहना पड़ता है । जब
बेटा - बहू में न पटे तो अम्मा जी शहर आ ही जाती हैं
म़ामला सलटाने के लिए ।
बेचारे बाबू जी भी अपनी महामूर्ख मेहरारू के पीछे पीछे शहर को झेलने आ ही जाते
हैं । बड़का बेटा और बाप जी की अपनी एक दुनिया बन जाती है । अम्मा और बिटिया
के पास अपना ही एक संसार होता है । ऐसे मौकों पर छोटका यानी मैं गांव में होता
हूं नीच जात के बीच किताबों में पढ़े समाजवाद के साथ । पता नहीं क्या होता है
कि हफ्ते भर के अंदर ही भाई और भाभी के बीच सब कुछ ठीक हो जाता है ।मार्क्स
के पास से चला मेरा समाजवाद आजाद भारत के गांव में नहीं पहुंच पाता । मैं फिर
नीच जात की तरक्की ब़ेहतरी और बराबरी के अधूुरे सपनों से जगा सा शहर में नौकरी
के दोपहरी सपनों में होता हूं । पता नहीं कैसे इस देश में माओवादी गांव में
पहुंच जाते हैं
?
सो भइया अपनी नीति के अनुसार गांधी बाबा के तीन बंदर हो चुके थे । भाभी अपने
स्वभाव की परंपरा में असली वाली गुस्से में थीं । उनका पारा जब चढा होता है
तो पायल की रूनझुन हवाई चप्पल की फट फटाफट फट हो जाती है । अब मेरी बारी है ।
भुगतो
?
धूप भी साली अपना तेवर दिखा दिखा रही है ।चादर के पार भी धूप बढ़ती महंगाई की
तरह घुस रही है । बेरोजगारी से भी भयंकर आतंकवादी भाभी की चप्पल की फटफटाहट
कम नहीं हो रही है ।यह क्या मेरे कमरे की तरफ आ रही फटफटाहट भारत सरकार के
वादों की तरह मंद होती जा रही है । बिहार की नीतीश कुमार की सरकार जैसे विकास
का झुनझुना बजा रही है वैसे ही बिना लय के झुनझुन के साथ भाभी कमरे के बाहर
वैसे ही ठिठकी थीं जैसे गांव का विकास ठिठका हुआ है ।जैसे चुनाव के वक्त नेता
वोटर को लताड़ते हैं वैसी ही आवाज जगाने के लिए गरजेगी " अब उठिए ब़हुत हो गई
नौटंकी ई नखड़ा अपनी घरवाली को दिखाइएगा ।" मगर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ । भाभी
भी भारत हो गइंर् । अपनी ही आत्मदया में बुदबुदाई " पढाई से भी ज्यादा पढना
पड़ता है नौकरी के लिए । रात भर पढते रहे तो देर तक सोएंगे भी ।"
न पायल झुनझुनाई न चुड़ी खनकी
- बस चप्पल की फटफटाहट दूर होती गई ।
जुगनू शारदेय
अगस्त 1, 2006
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