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कारोबार दरवाजे को हौले-से भेड़कर वह अंदर आया और इशारा पाते ही कुर्सी पर बैठ गया. चालू फ़ाइल को एहतियातन वहीं बंद कर मैंने नीचे सरका दिया. इस दरम्यान एक मिनट की खामोशी रही. एक अबूझ-सी राहत समेटकर मैं कुर्सी के पिछवाड़े पर झूल गया और आश्वस्ति टटोलती निगाह से उसके हाव-भाव परखने लगा.
आंखों में आंखें डालकर उसने यक़ीन से गर्दन हिलाई और कहते हुए हल्की-सी चपत टेबल के कांच पर जड़ दी. इस काम
में जिसे गट
बेहिसाबी
रोकड़ा और दूसरी चल संपत्तियों की जब्ती पूरे मिशन की कामयाबी की जान थी
इसलिए मैं उसी पर चढ़कर मॉक-फेंसिंग आजमा रहा था. झूठ-फरेब करने में कोई
कितना ही उस्ताद बन ले मगर हर पेशेवर मुखबिर इस सवाल का जवाब देने से कतराता
है क्योंकि इससे उसकी रोज़ी-रोटी ही नहीं,
साख-प्रतिष्ठा भी जुड़ी
होती है. सीधे-सीधे. एवजी में कोई दलील काम नहीं करती है. इसलिए निमिष भर को
वह झिझका. एक अलिखित काय़दे के मुताबिक़ रत्ती-भर से ज्य़ादा की झिझक मेहनत
से बनाए आपके
ढांचे को भुरभुरा कर सकती है -- शक की वजह से. इसलिए भटकती पुतलियों को दबोच
कर उसने लम्बी सांस खींची. पहले उसने जो बतलाया था...वह अपनी नवीनता के कारण काफ़ी कौतूहल भरा लगा था. हर दूसरे-तीसरे छापे में बिल्डरों और ज्वैलर्स की धर-पकड़ करते हुए मैं खासा ऊब गया था. हमारा निदेशक बार-बार दुहाई देता कि गए दस बरसों में दुनिया के कारोबार का नक्श़ा बदल गया है मगर हम अपनी आरामपरस्ती में फंसे पड़े हैं. चार लोगों की हमारी टीम ने डेढ़-सौ से ज्य़ादा कारोबारों की छंटनी की थी मगर याद नहीं पड़ता कि ''फलों का थोक व्यापार`` उसमें था या नहीं. उसने जब सुझाया तो पहली प्रतिक्रिया में खारिज करते हुए मैंने तल्खी ली थी कि विभाग के इतने बुरे दिन भी नहीं आए हैं कि धनिए-पुदीने वालों पर भी छापा मारें. ''धनिया-पुदीना
और सेब-संतरों में फ़र्क है साब.`` मैं अचानक
रुका. उसकी दलील में आंकड़े नहीं,
मानवीय व्यवहार की गहरी
समझ थी. एक चौखटे में फंसे सोच के तहत मैं मन ही मन मोटा-मोटा हिसाब लगाने
लगा कि हर रोज़ के तीस लाख के बाज़ार में आठ लाख का हिस्सा रखनेवाले एक थोक
व्यापारी की साल भर में कितनी कमाई होती होगी...पच्चीस करोड़ की सालाना
बिक्री के हिसाब से छह साल की हो गई सौ करोड़ से ऊपर. जिस ट्रेड को आज तक हाथ
नहीं लगाया उसका तो सारा कारोबार ही बेहिसाबी होगा. उसने आगे बताया कि आम को
लोग भले उसके स्वाद के कारण फलों का बादशाह कहते हों मगर व्यापारियों को यह
मुनाफे की वजह से बादशाह लगता है. हर सीज़न की शुरुआत केरल के सिंदूरी आमों
से होती है,
फिर रत्नागिरी और जूनागढ़ के
अल्फांसो और हापुस आते हैं,
आखिऱ में सोने पर सुगंध
उत्तर-भारत के दशहरी और लंगड़ा की होती है. सारा
मैं वापस
उसकी तरफ़ लौटा. काम की
बात के बीच थोड़ी चुटकी मुझे सुहाती है. वह जानता है. ''इन सिंधियों का घर या शक्ल देखकर आप इनकी हैसियत के बारे में अंदाज़ा नहीं लगा सकते हैं...ये जो दिखते हैं उसके अलावा कुछ भी हो सकते हैं.`` अपनी बात मनवाने के लिए पठान अक्सर ऐसे शगूफे छोड़ने लगता. लगभग यही बात उसने एक मारवाड़ी के संदर्भ में कही थी. आप बहस कीजिए और मुद्दे से हाथ धो बैठिए. अपने
निदेशक को विश्वास में लेकर चौथे दिन मैंने उस निशाने को
'साध`
लिया था. बस दो एहतियात
अपनी तरफ़ से और बरते,
एक तो इस खिलाड़ी नं १ के साथ
इस बाज़ार के खिलाड़ी नं २ को भी उसी दिन शिकार बनाया और दूसरे,
दोनों के बही खाते लिखने
वाले मुनीमों को भी वही इज्ज खिलाड़ी
नं २ की जानकारी मैंने अपने कंप्यूटर से ही जुटाई थी मगर काग़ज रवायत के
मुताबिक़ अगले तीन-चार महीने उसे मेरे दफ्त़र की शक्ल नहीं देखनी थी. इस
दरम्यान सारे काग़जात
के गट्ठर से मुझे कर-चोरी की एक ऐसी मूल्यांकित रिपोर्ट लिखनी थी जो मिशन की
कामयाबी को सौ-गुना बढ़ाकर सिद्ध करते हुए भी सल्वाडोर डाली की चित्राकारी
याद दिला दे. रिपोर्ट पूरी होने के ठीक दो रोज़ पहले उसका फ़ोन आ गया. अपनी
नस्ल के नाम को रोशन करती गर्मजोशी से वह बताने लगा कि साब
''ऐसी
चीज़ हाथ लगी है कि दिल खुश हो जाएगा.`` मैं हर क़ीमत उसके फुसलाने में नहीं आना चाहता था. यूं, हर बार एक नया मुर्गा पकड़ने की आदिम इच्छा खून के बहाव में शामिल रहती थी, मगर पौने तीन साल से वही पंचनामा बनवाते, कैवटीज़ ढूंढते, झूठ के मनोगत औज़ारों से धन्नासेठों को धराशायी करते काफ़ी ऊब भी होने लगी थी. सोने-जागने की असामान्यता और खाने-पीने की अनियमितता ने अजीब तरह से तोंदियल और नतीजतन 'हवाबाज़` बना छोड़ा था. मोर्चे पर आक्रमण करने के इस मजबूर दस्ते में हम आठ लोग थे इसलिए हर हफ्ते ही किसी न किसी की 'बारात` निकलती थी. यह भी खूब होता कि एक बारात से लौटे नहीं और उधर दूसरी में भागना पड़ रहा है. मगर उस दुनिया में हम प्रसन्न-सुखी थे तो इसलिए कि एक क़िस्म के परपीड़ा-सुख को सलीके से बगल में दबोचने के बावजूद, बेडौल ही सही मगर न्याय के एक नामुराद से बच्चे को हम अपने तइं हर रोज़ डिलीवर होते देखते थे. पठान थोड़ी देर झिझका था क्योंकि अक्सर तो मैं स्वयं उसे 'कुछ नया` लाने को प्रोम्प्ट करता था और फिर भी मेहनत से सुझाए उसके पांच-सात प्रपोजल्स में एकाध को ही तवज्जो देता. ''नहीं साब, देना तो आपको ही है, चाहे महीना और लग जाए...`` उसका इतना विश्वास ही काफ़ी था मगर उसके अगले पांच लफ्ज़ों ने पिघला ही दिया... ''आपके हाथों में बरक्कत है...`` किसी विदग्ध लती की तरह एक पखवाड़े के भीतर ही मैं उसके साथ मामले की निटी-ग्रिटीज में उतरता जा रहा था. यह एक हडिड्यों के डॉक्टरों का गेंग था जो ट्रौमा अस्पताल चलाता था. पांच समवयस्क डॉक्टरों की भागेदारी जिसकी रहनुमाई डॉक्टर आकाश जोशी के सुपुर्द थी. 'ऑपरेशन` की कागजाती तसल्ली के लिए ज़रूरी बातें वहां पहले से ही मौजूद थीं : क्रीम कलर की छह मंजिला भव्य इमारत के अंदर-बाहर के फ़ोटोग्रास सभी भागीदार डॉक्टरों का सांझा नोट-पैड, सभी डॉक्टरों के घर के पते और मोबायल नंबर, उनके द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली चमाचम गाड़ियां... ''मगर
धन-चोरी का तरीक़ा क्या है?``
मैंने मुद्दा कसा. ''बेशक, तीन नहीं तो, टके से उसने सरकाया. वैसे खूब लंबी चौड़ी हांक ले मगर चलो, कुछ तो 'फिगर्स फोबिया` इसे है. ''पठान, इस शहर में क्या इतने बेवकूफ़ लोग हैं जो अपनी गाढ़ी कमाई को आधे दिन के इलाज में उड़ा देंगे? साले हर चीज़ में तो डिस्काउंट और वटाव मांगते हैं...आइ डोंट थिंक बॉस विल डाइजैस्ट और एग्री टू इट`` मुंह बिचकाकर मैंने उसे आदतन खारिज करना चाहा. मगर उसकी जवाबी कार्रवाई ने मेरे शक का पलीता कर दिया. इन्फोसिस में कार्यरत अपने काल्पनिक चाचा के घुटने के आरोपण के सिलसिले में वह आकाश जोशी की घसीट लिखावट में संभावित खर्चे का हस्ताक्षरित पर्चा मुझे दिखा रहा था. एक मार्मिक आशुकथा के सहारे, इलाज करवाकर बाहर निकल रहे क़स्बाई मरीज के बिल की फ़ोटोकॉपी उसने अलग से करवा ली थी. मेरे सामने सब कुछ दिन के उजाले-सा उज्ज्वल था या, इतनी रोशनी तो दे ही रहा था कि डॉक्टर जोशी के खड़े किए अंधेरे चुहचुहा जाएं. अब कोई गुंजाइश नहीं थी. और वाकई, हमारी कार्रवाई के बाद कोई गुंजाइश रही थी नहीं. नकदी ज़रूर हमारी अपेक्षा से कम मिली मगर उसकी एवज़ में बेहिसाबी चल-अचल संपत्ति के ऐसे दस्तावेज़ मिल गए कि मिशन के चयन और सफलता की खूब वाहवाही हो गई. मिशन की एक मज़ेदार बात डॉक्टर आकाश जोशी के बचपन की सरेआम वापसी थी : वार्ड वॉइज और नर्सों के सामने अपनी मालिकी का मुल्लमा उतार वह बार-बार मेरे घुटने पकड़कर फूट-फूटकर रोने लगता और ''मैंने तो कभी किसी का कुछ नहीं बिगाड़ा, मैंने तो कभी चींटी भी नहीं मारी...`` की सुबकियां भरता जाता. बहुत जल्द वह गुत्थी मेरे हाथ लग गई जो उसके पांव तले की ज़मीन को इस क़दर पोला किए दे रही थी : उसके चेम्बर से एक कम-उम्र और यक़ीनन खूबसूरत हसीना के साथ उसकी रंगीनी पर मुहर लगाती खतो-किताबत और चंद तस्वीरें. यानी तस्वीरें-बुतां और खातूनों के खत़ मरने से पहले ही! कौन बचाएगा तुझे मेरे मियां मजनू जोशी! मुखबिर के
लिहाज़ से पठान मेरा मुंह लगा था मगर हमारे आपसी ताल्लुक़ात पेशेवर ही थे.
दुनिया-जहां के राज़ बटोरकर जब वह मुझसे मिलना चाहता तो मैं उसे किसी नए
रेस्तरां,
पार्क या स्टेशन पर आने को कहता,
न कि दफ्त़र या घर. फ़ोन
पर उसे अपना या मेरा नाम लेने की मनाही थी,
मेरे साथ किए उसके केसेज बहरहाल, डॉक्टर जोशी के सफल 'ऑपरेशन` के बाद मैंने उसे घर बुलाया और ब्लैक लेबल खोल दी. उसने तौबा में कान पकड़ते हुए माफ़ी चाही ''साब आपने इस क़ाबिल समझा शुक्रिया. मैं नहीं पीता...इस्लाम में शराब पीना कुफ्र है.`` अकेले पीने की मेरी आदत नहीं रही. बोतल एक तरफ़ सरका ही रहा था कि उसने मेरे घुटने पकड़ लिए और नौसिखिया अंदाज़ में मिन्नत करने लगा, ''साब यह दूसरा कुफ्र तो मत करवाइए...आप बाक़ायदा लें...इस्लाम में किसी को शराब पीते हुए देखना क़ाबिले-गुनाह नहीं है`` मज़हब पर कसी इस फुरफुरी चुटकी के साथ भरे आदमखोर ठहाके का मैंने भी साथ दिया. ''आज
आपकी सिगरेट अलबत्ता ज़रूर पीऊंगा.``
नवाजी इज्ज शराब के घूंटों के साथ तबादलों और प्रोन्नतियों को लेकर रोज़ किए जाने वाले आलाप और विमर्श आज नदारद थे. न क्रिकेट का मौसम था और न ही उस पर बात हो सकती थी. कुछ देर हम अपने साझा शिकारों और उनकी खासियतों पर बात करते रहे. गए तीन बरस में मेरे हाथों घायल ग्यारह शिकारों में छह पठान की मेहरबानी थे (तीन मैंने खुद-ब-खुद यानी 'सुओ मोटो` तैयार किए थे और दो में दो अलग-अलग मुखब़िर थे). यानी पठान और मेरी खासी जुगलबंदी थी. मगर त्राासदी देखिए कि उसकी किसी जाती चीज़ की मुझे शायद ही कोई जानकारी थी. आज उसके भीतर कुछ पिघल रहा था. ''इस धंधे में कभी नहीं आता अगर शर्राफ ने उस रोज़ मुझे साढ़े चार सौ एडवांस दे दिए होते. मैं उसके यहां डेढ़ हज़ार रुपए महीने की नौकरी पर था. मुख्य काम था सहकारी बैंक में चैक जमा कराना, रोकड़ा निकालना और तयशुदा पार्टियों से वसूली करने जाना. पगार मिलने में अभी आठ दिन थे. बरसात के दिन थे. बहन छत से फिसल गिरी थी और कूल्हे खिसकने का इलाज कराने दवाखाने में दाखिल थी. पड़ोस के गल्ले से फ़ोन करवाकर अब्बा ने साढ़े चार सौ का इंतज़ाम करने को बोला था. अब आप ये समझो कि बाइस दिन की तो मेरी पगार चढ़ी हुई थी और आधा घंटा पहले ही मैं खुद पर डाल दी मगर मुझसे वह भी न बने. बेवजह ब्याज चढ़ गई. दस जगह ठोकर खाकर इंतज़ाम तो हुआ मगर एक कड़वाहट भीतर जम गई...कि तंगी में कोई सगा नहीं होता...कि पैसे का दरियादिली से समझो कोई वास्ता नहीं. मैंने वह धंधा भी छोड़ दिया और एक तेल मिल में काम करने लगा. छह महीने बाद वह मिल बंद हो गई. बीच में पता नहीं कितनी जगह धक्के खाने के बाद एक शेयर दलाल के यहां टंग लिया. थोड़े दिनों बाद ही आपके विभाग ने उसके यहां छापा मारा था, वह भी दोपहर को. पंद्रह साल तो हो ही गए. सेठ ने मुझे बतौर साक्षी रखवा दिया जिससे मुझे आपके विभाग की ताक़त और तौर-तरीक़ों का पता चला. सारी कार्यवाही में पता नहीं उन्होंने मुझमें क्या देखा कि बड़े नामालूम तरीके से अपने दफ्तर आकर मिलने की दावत दे दी. बस, वह दिन है और आज का दिन. इतने दिनों सेठ लोगों से खाई जिल्लत, इतने दिनों हर मुमकिन बेगार में खुद को जोतने का नतीजा, समझो मेरा सरमाया बन गया. हिसाबी-बेहिसाबी का फ़र्क तो मुझे ज्य़ादा नहीं पता था मगर यह खूब जानता था कि हर कामयाब धंधे की बुनियाद चोरी पर टिकी होती है. वैसे तो हर आदमी अपनी तरह और हालात के मुताबिक़ चोरी करने को आमादा रहता है मगर इतने दिनों की बेपनाह ठोकरों ने इतना इल्म दे दिया है कि खब़र हो जाती है कि मुक्तलिफ़ कारोबारों की कमज़ोर नसें कहां होती हैं और उन्हें कैसे कुरेदा जा सकता है...देखा जाए तो सरकार ने भी तो आपको इसी काम के लिए रख छोड़ा है...`` ''बेशक, बेशक.`` गोकि किसी स्वप्न से जागकर मैं बड़बड़ाया. उसके ''रख छोड़ा है`` के वाहियात प्रयोग के बावजूद तभी मुझे अहसास हुआ कि अपने पसंदीदा पेय को मैं कितनी शर्मनाक रफ्तार से पी रहा था. एक लंबा घूंट खींचकर मैंने दूसरा पैग बनाया और उसके लिए सूप मंगवाया जिसे, जल्दी खत़्म करने के फेर में वह बारी-बारी से प्लेट में डालकर सुड़कने लगा था. बात का सिरा जोड़ने के इंतज़ार में मैंने एक और लंबा घूंट खींचा और सहारे का कंधा बदलकर पांव फैला दिए. ''यार पठान तुम्हारी तत्काल झूठ गढ़ने की काबिलियत का मैं बहुत मुरीद हूं...सही कहूं तो इस मामले में तुमसे बहुत सीखा है मैंने...कैसे कर लेते हो...?`` गहराते सुरूर में ऊपरी तौर पर नागवार लगने वाले इस आरोप में छापों से पहले की जाने वाली ज़रूरी टोही हरक़तों (रिकॉनिसंस जिसे 'रैकी` कहने का चलन था) का तजुर्बा था. वह अर्राता हुआ गोकि शे`र की मांद में हाथ डाल देता था. मैं यथासंभव अनचीन्हा-सा उसके दायरे में डोलता रहता इत्तफाकन भी किसी परिचित से टकराए जाने की संभावना से खुद को बचाते हुए. ''सर,
ज़रा एक मिनट हल्का हो आऊं.``
उंगली के इशारे से पठान
ने अपनी थुलथुल काया को अचकचाकर सीधा किया. ''किचिन में काम करवाना पड़ेगा...करवा देंगे ना...भैया ऐसा है मेरे सेठ के साथ उसकी बूढ़ी मां रहती है जिसे एलर्जिक अस्थमा है इसलिए कैमिस्ट शॉप नजदीक चाहिए...इसके सामने वाला रिहाइशी है या इन्वैस्टर का है, सुनसान में तो नहीं रहना पड़ेगा...`` वह सख्त़मिजाजी से बकता जाता. बिल्डर से क़ीमत तय होने के बाद वह दस्तावेज़ी और 'ऑन` में दी जाने वाली राशि का हिसाब बिल्डर से ही लिखवाता. ''ऑन
का प्रतिशत पचास से साठ या सत्तर हो सकता है मालिक``
कहकर वह जेब में पड़े
माइक्रोटेप को चालू कर देता. किसी जीनियस शिल्पी की तरह अपने मकसद में वह यूं
एकाग्र हो जाता कि मेरी मौजूदगी को भी भुला देता.
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