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भुजाएँ अष्टभुजा लाल को अपने बीते हुए दिनों के बारे में सोचना अच्छा नहीं लगता। बीते हुए दिनों की बात याद आते ही उन्हें मितली आने लगती है। उन्हें लगता है, जैसे अपनी पत्नी के वार्डरोब में बंद हो गए हों। इस वार्डरोब की याद उनके लिए किसी बजबजाते दुर्गन्धमय नाले में गिर जाने की तरह यातनाप्रद होती है। इस यातना से मुक्ति के लिए वह लगातार हाथ-पाँव मार रहे हैं। आकुल-आहत छटपटा रहे हैं। जबसे उन्होंने अपनी पत्नी का वार्डरोब देखा है, जीवन के बीते हुए दिनों के अजीब-अजीब चित्र उनके मन में बनते हैं। किसी डरावने स्वप्न की तरह यह वार्डरोब उनके दिलो-दिमाग़ पर छाया हुआ है। पिछले दिनों पत्नी के मायका-प्रवास के दौरान वार्डरोब की चाबी उनके हाथ लग गई। पत्नी उसे साथ ले जाना भूल गई थीं। बिना किसी दुर्भावना के, मात्र कौतूहलवश उन्होंने वार्डरोब खोलकर देखना चाहा कि आख़िर क्या-क्या सहेज-छिपाकर रखा है श्रीमती कुसुम कुमारी ने ?........और अष्टभुजा लाल ने मुसीबत मोल ले ली। न देखते, तो शायद उनके जीवन के बीते हुए दिनों के बरअक्स यों बार-बार पत्नी का वार्डरोब नहीं आ खड़ा होता। बजबजाते हुए दुर्गन्धमय नाले में गिरकर निकलने के लिए हाथ-पाँव मारने की-सी यह यातना उन्हें नहीं मिलती। उस दिन पत्नी के वार्डरोब में उन्हें तरह-तरह की चीज़ें मिली थीं। वार्डरोब खोलते ही उन्हें लगा था कि आज कोई अनहोनी घटने वाली है। वह हाथ डालते झिझक रहे थे। वह जब-जब अपना हाथ खींचते, एक-दूसरे में लिपटी-गुँथी चीज़ें बाहर निकल आतीं और अष्टभुजा लाल उलझकर रह जाते। वह अपने को कोसते, अपना माथा पीटते और ख़ुद अपनी लानत-मलामत करते हुए वार्डरोब में फँसे थे। उनके सामने बिखरी थीं वार्डरोब से निकली चीज़ें- मसलन, शादीशुदा बड़ी बेटी धन्नी के बचपन के दिनों की दूधवाली बोतल,.....जवान होकर विवाह की प्रतीक्षा में ठिठकी हुई चौबीस वर्षीया दूसरी बेटी बन्नी के बचपन के दिनों का पुराना फ़्रॉक और जाँघिया,......पत्नी के दो-दो पुराने हुकविहीन ब्रा,.....आरज़ू-ताजमहल-मेरे महबूब जैसी पुरानी फ़िल्मों के गानों की क़िताबें,.....श्रृंगार प्रसाधन की कुछ ख़ाली शीशियाँ,.......उनकी प्रचण्ड जवानी के दिनों की एक श्वेत-श्याम तस्वीर, जिसमें उनकी गरदन में छींटवाली टाइ लटकी हुई थी और ज़ुल्फ़ें देवानंद की तरह ऊपर उठी थीं। और इसी वार्डरोब में उन्हें मिला था.......। श्रीमती कुसुम कुमारी के इस फूहड़पन ने उनके जीवन की शक्लो-सूरत ही बदल दी थी। उन्हें अपना तमाम जीवन फूहड़ दिख रहा था। यहाँ तक कि उन्हें अपने नाम से भी चिढ़ होने लगी थी। अपने नाम का सम्बोधन सुनते ही उनकी इच्छा होती कि वह पुकारनेवाले का मुँह नोच लें। अष्टभुजा लाल के नाम की कथा के सूत्र उनके जन्म की कथा में छिपे थे। उनके जन्म के पूर्व से जन्म तक की स्थितियाँ उलझी हुई थीं। उन्हें अपने घर में पैदा करने के लिए उनके माता-पिता के संघर्ष ने उन्हें यह नाम दिया था। उनकी माता मानो देई दुर्लभ सौंदर्य और व्यक्तित्व की स्वामिनी थीं। सत्रह वर्ष की उम्र तक अपने मायके के घर- आंगन में कोयल-सी कूकती रहनेवाली मानो देई को उनके क़ातिब पिता ने जब झूलन लाल के हवाले किया, उनका अपना घर-आंगन सूना हो गया,......और दूसरी ओर छपरा कचहरी के नामवर वकील बाबू हनुमंत सहाय के मुख्तार झूलन लाल का घर-आंगन मानो देई की उपस्थिति के चलते कलरव से भर उठा। विवाह के बाद माह भर तक युवा झूलन लाल न तो कचहरी गए और न ही वकील साहब के निवास। खस्सी का सालन पकवाकर खाते और मानो देई की झुनकीदार पायल की रुनझुन के पीछे-पीछे डोलते फिरते। जब मानो देई को उल्टियाँ आने लगीं और बहू को आनेवाली इन उल्टियों का स्वागत सास ने सोहर के बोलों से किया, तब झूलन लाल ने कचहरी की सुघ ली।लगभग आठ वर्ष में ताबड़तोड़ सात बेटियों को पैदा करने के बाद जब पच्चीस की हुईं मानो देई, तो धीरज ने झूलन लाल का साथ छोड़ दिया। गहन निराशा के अंधकूप में गिर पड़े तैंतीस वर्षीय मुंशी झूलन लाल। सात बेटियों में से पहली दो साल तक जीवित रहने के बाद चल बसी। दूसरी और तीसरी बेटियों ने एक-एक वर्ष तक झूलन लाल के आंगन में बाल-लीला करने के बाद इस दुनिया से नाता तोड़ा। चौथी और पाँचवीं ने कुछ घंटों तक इस धरती को पवित्र करने के बाद पलायन किया। मानसिक रूप से विकलांग छठवीं पुत्री भी मानो देई की कोख की लाज बचाने के लिए जीवित नहीं रह सकी और सातवीं के गर्भ में आते ही उसने साथ छोड़ दिया। सातवीं बेटी के मृत पैदा होने के बाद झूलन लाल नगर के बाहर सरयू-तट पर बने सिध्द शक्तिपीठ अष्टभुजा मंदिर पहुँचे। मंदिर की देहरी पर माथा पटककर उन्होंने माता अष्टभुजा से पुत्र की कामना की और माता को वचन दिया कि जब तक जीवित रहेंगे, सुबह-शाम दोनों वक्त माता के दरबार में हाज़िरी लगाने आएँगे। उसी रात माता अष्टभुजा ने उन्हें स्वप्न में दर्शन दिए और आशिर्वाद भी। माता अष्टभुजा लोप हुईं और उनकी नींद खुली। माता के दर्शन की ख़ुशी में विभोर वह प्रसूतिगृह पहुँचे। रक्तहीन देह लिये मानो देई मृतप्राय पड़ी थीं। झूलन लाल ने पत्नी के ललाट पर हाथ फेरा। मानो देई ने ऑंखें खोलकर पति को देखा। स्वप्न में माता के दर्शन और आशिर्वाद की सूचना प्राप्त की और सूनी आँखों से बड़ी देर तक पति को निहारती रहीं। उनकी आँखों में याचना थी। कसाई से जान की भीख माँगती बकरी की ऑंखों की-सी याचना। इस रात के आठ वर्ष बाद झूलन लाल की आठवीं संतान के रूप में मानो देई ने अष्टभुजा लाल को जन्म दिया। पर इस शुभ घड़ी के साक्षी नहीं बन सके झूलन लाल। लम्बे समय तक माता के दरबार में हाज़िरी लगाते, चाकरी बजाते झूलन लाल निराश हो चुके थे। संतान-सुख नहीं पाने की इस निराशा से उन्होंने अपने लिए एक अलग संसार बसा लिया था। बहुत कम बोलते। चुपचाप सूनी ऑंखों से घंटों आसमान निहारा करते। कचहरी जाने की इच्छा नहीं होती, पर जीविकोपार्जन के लिए जाना पड़ता। मुवक्किलों से जो मिलता, बिना हील-हुज्जत के ले लेते। उनके चारों तरफ़ निराशा ही निराशा पसरी रहती थी। .......और ऐसी ही एक सुबह जब वह मंदिर से पूजा करके लौटे, मानो देई ने उन्हें अपने गर्भवती होने की सूचना दी। यह सूचना पाकर पहले तो वह प्रसन्न हुए, फिर उन्होंने मरी हुई सातवीं बेटी के जन्म के बाद वाले वर्षों के एक-एक दिन को याद किया। अपनी स्मृति पर लगातार दबाव बनाए रखने के बाद भी वह उस क्षण की स्मृति को नहीं ढूँढ़ पाए। उन्होंने अपने बीते हुए इन वर्षों का कोना-कोना तलाश किया। ढूँढ़ते-ढूँढ़ते उनका दिमाग़ थक कर चूर हो गया, पर उन्हें वह क्षण नहीं मिला। अंतत: उन्होंने पत्नी से पूछा। मानो देई ने कुछ भी नहीं छिपाया। सब कुछ साफ़-साफ़ बता दिया।......और तब उनकी नज़र अपने ममेरे भाई बचनू लाल पर पड़ी, जो पिछले एक वर्ष से उनके घर स्थायी मेहमान की तरह रहते हुए कचहरी में मुहर्रिर के काम पर लगे हुए थे। झूलन लाल ने पत्नी को भर आँख देखा। सातवीं बेटी के बाद ठठरी काया लिये प्रसूतिगृह से निकलने वाली मानो देई की सूरत उनकी आँखों के सामने उभर आई। वह बहुत देर तक मानो देई को घूरते रहे। उनके चेहरे की गोरी पारदर्शी त्वचा के नीचे दमकती लहू की आभा, बड़ी-बड़ी कजरारी ऑंखों की क्षिप्र भंगिमाओं, वक्षों के बोझ से लचकती क्षीण कटि और भारी नितंबों को निहारते रहे झूलन लाल। पिछले वर्षों में अपने लिए अर्जित निराशा को उन्होंने बार-बार तौलने का प्रयास किया। मानो देई ने रूप की जो दमक और देह का जो सौष्ठव अर्जित किया था, उससे अपने अर्जन की तुलना करते हुए लगभग माह भर जीवित रहे झूलन लाल।........और एक रात अष्टभुजा मंदिर से पूजा करके लौटे और चिरनिद्रा में सोने चले गए। गर्भ की अवधि पूरी हुई। मानो देई ने पुत्र को जन्म दिया। झूलन लाल ने स्वर्ग से ही माता अष्टभुजा को प्रणाम करते हुए इस कृपा के लिए धन्यवाद ज्ञापित किया। सात बेटियों के जन्म के आठ वर्ष बाद आठवीं संतान के रूप में माता अष्टभुजा की कृपा से पैदा हुए अपने पुत्र का नाम मानो देई ने अष्टभुजा रखा। प्रकृति, भाग्य और समाज पर विजय के बाद इस नाम को मानो देई ने बहुत गौरव के साथ अपने पुत्र को सौंपा था। यह नाम अष्टभुजा लाल के पिता की धार्मिक आस्थाओं और माता के संघर्ष का प्रतिफल था। अनजाने में ही अपने जिस नाम की चर्चा करते अघाते नहीं थे अष्टभुजा लाल, वही नाम उन्हें काट खाने को दौड़ रहा था।.......उस वार्डरोब ने उनके जीवन में उथलपुथल मचा दी थी। श्रीमती कुसुम कुमारी पूरे कुनबे सहित मायका प्रवास से वापस लौटीं। वह अपने बड़े भाई के छोटे सुपुत्र के विवाहोत्सव में शामिल होने छोटी बेटी बन्नी के साथ पटना गई थीं। बड़ी बेटी धन्नी भी पति और बच्चों सहित ममेरे भाई की शादी में शामिल होने वहाँ पहुँची थी।......सो बेटियों,दामाद और दौहित्रों को साथ लिये वापस लौटीं श्रीमती कुसुम कुमारी। रविवार का दिन था। अष्टभुजा लाल बिना कुछ खाए-पिए पेट के नीचे तकिया दाबे औंधे मुँह पड़े थे। कॉलबेल की आवाज़ सुनकर उठे। दरवाज़ा खोला। पत्नी को तिरछी ऑंखों से देखा। इसके पहले कि लोग पाँव छूकर आशिर्वाद लें, अष्टभुजा लाल तेज़ झटके से मुड़े और बाथरूम में घुस गए। दस दिनों से ख़ाली बरतन की तरह ढनढनाता हुआ घर, घर लगने लगा। दोनों दौहित्रों की धमाचौकड़ी का संगीत गूँज रहा था। उमगते यौवन को जैसे-तैसे सहेजकर कुँवारेपन के दिन काटती बन्नी का दुपट्टा पूरे घर में लहरा रहा था। पाँच वर्ष के वैवाहिक जीवन में दो बेटों को जन्म देकर विशाल उदर और और भारी नितंबों को अर्जित करनेवाली धन्नी हाथ-पाँव छितराए तख्त पर पड़ी सिरदर्द से कराह रही थी। बैंक में मुलाज़िम दामाद मुकुंद बिहारी वर्मा ड्राइंगरूम में सोफे पर बैठकर अपनी साली बन्नी के दुपट्टे की छाया के पीछे खोजी और जीभचटोर बिलाव की तरह ऑंखें दौड़ा रहे थे। श्रीमती कुसुम कुमारी सूटकेस और बैग खोलकर मायके से मिले उपहार निकालने में व्यस्त थीं।......बूंदी के लड्डू......चुनरी प्रिंट की साड़ी.....बन्नी के लिए सलवार-शमीज़ का कपड़ा और पति के लिए कुर्ता-पाजामे का कपड़ा। धन्नी के परिवार का कपड़ा उसके सूटकेस में था। श्रीमती कुसुम कुमारी विजेता की तरह लौटी थीं। तीस वर्ष पहले छूट गए मायके से आज के ज़माने में इतना वसूलकर लौटना आसान काम नहीं था। और वह भी तब, जब भौजाइयाँ चंट हों और भाई ग़ुलामों की तरह उनके पीछे-पीछे दुम हिलाते फिर रहे हों। हालाँकि अष्टभुजा लाल के लिए कपड़े के नाम पर दम साध लिया था भौजाइयों ने। अंतत: पति की मृत्यु के बाद मिलनेवाली सरकारी पेंशन की निजी राशि से श्रीमती कुसुम कुमारी की माँ ने उत्सव में अनुपस्थित दामाद के लिए कपड़ा ख़रीदकर दिया। अष्टभुजा लाल बाथरूम से निकले। अपने आगे पंसारिन की तरह दुकान लगाए फ़र्श पर पालथी मारकर बैठी पत्नी को देखा और आगे बढ़ गए। श्रीमती कुसुम कुमारी ने कहा - ''सुनो! तुम्हारे लिए भाभी ने कपड़ा दिया है। कुर्ते के लिए मलमल....'' ''मेरे लिए ?'' अष्टभुजा लाल मुड़े। पत्नी को घूरकर देखा। फिर पूछा - ''दिया है या तुम माँगकर लाई हो ?'' गोली निशाने पर लगी और आर-पार कर गई। पति के इस सधे हुए हमले से श्रीमती कुसुम कुमारी के पाँव उखड़ गए। वह हकलाती हुई बोलीं - ''आख़िर बात क्या है ? आई हूँ तब से देख रही हूँ कि मुँह फुलाए हुए हो। न हूँ, न हाँ। बच्चों तक से कुशल-क्षेम नहीं पूछा।'' ''अब मायके का प्रपंच समेटो और उठो। मायके की सम्पत्ति देखकर जुड़ाते रहने के लिए बहुत उमर बाक़ी है अभी। देखकर जुड़ाते रहना......पहले चाय दो।'' अष्टभुजा लाल ड्राइंगरूम की ओर मुड़े। दामाद ने आकर पाँव छू लिये। उन्होंने दामाद को दोनों बाहों में भरकर स्नेह किया और अपने कमरे की ओर मुड़ गए। गोला दाग़ने के बाद तोप की नली पीछे खींचकर मानो तोपगाड़ी मुड़ गई हो। श्रीमती कुसुम कुमारी धाराशायी हो चुकी थीं। पाँव छितराए, हाथ पर हाथ धरे श्वसुर-दामाद के मिलन को टुकुर-टुकुर निहारती रहीं। उन्होंने उठने की कोशिश की, पर उस क्षण उठ नहीं सकीं। देह जैसे धरती से चिपक गई थी। दिन जैसे-तैसे गुज़रा। धन्नी ने सिरदर्द के बहाने खर्राटे भरने में पूरा दिन गुज़ारा। मुकुंद बिहारी वर्मा और बन्नी जीजा-साली के बीच परिहास के सहज सम्बन्ध की आड़ में एक-दूसरे के साथ शतरंज के खिलाड़ियों की तरह चालें चलते रहे। बन्नी का दुपट्टा लहराता रहा और बैंक बाबू उसके दुपट्टे की हवा के झोंकों से इधर-उधर उड़ते रहे। अष्टभुजा लाल ने पत्नी से मुँह मोड़ते हुए दौहित्रों के साथ मन बहलाने की कोशिश की। उनकी भोली शरारतों और चंचलता पर खुलकर हँसना चाहा, पर पत्नी के वार्डरोब में छिपा सत्य बार-बार उनके कलेजे में बमगोले की तरह फूटता और वह लहूलुहान हो जाते। श्रीमती कुसुम कुमारी दिन भर व्यस्त रहीं। इस व्यस्तता के बीच मायके की स्मृतियाँउनका पल्लू पकड़े रहीं। तीस वर्ष के बाद पुराने जख्म एक बार फिर से लहलहा उठे थे। हालाँकि बन्नी की पैदाइश के बाद तक वह निरंजन सहाय की छाया के साथ जीती रही थीं। बहुत कठिन थे वे वर्ष। किसी की छाया साथ लिये, किसी दूसरे के साथ जीना, तिल-तिल छीजकर मरने के सिवा और कुछ नहीं होता। जीने की कोशिश में ऐसे ही मरते-मरते उन्होंने बहुत मुश्किलों से निरंजन सहाय को स्थगित किया था। बेटियों के लालन-पालन में उलझकर जीना शुरु किया और धीरे-धीरे इतना समय काट लिया।......पर बोतल में बंद जिन्ना जैसे ढक्कन तोड़कर बाहर निकल आया हो, वैसे ही इस बार नीरू ने.......। नीरू! निरंजन को वह प्यार से नीरू कहती थीं। थीं क्या ? आज भी कहती हैं। उस दिन भी तो यही निकला था उनके मुँह से। हवा में उड़ते रुई के फाहों की तरह नीरू की स्मृतियाँ उड़ने लगी थीं। वर्षों तकनि:स्तब्धता के झुरमुटों में छिपे रहने के बाद श्रीमती कुसुम कुमारी का मन बाहर निकल आया था।.. .....अभी भी वैसे ही मुस्कराता है नीरू। वैसे ही शब्दों पर वजन देकर बोलता है। गर्वीले सांड की तरह उसकी चाल वैसी ही है। वह औरतों की भीड़ के बीच बैठी थीं और वह पहचान गया। भीड़ में घुसकर सामने खड़ा हो गया। उसके मुँह से निकला 'नीरू'......और नीरू ने उन्हें भर आंख देखा था। जैसे कोई ड्रिलर चट्टान को ड्रिल कर रहा हो। वह भी चट्टान की तरह कठोर बनी रहतीं तो शायद....। पर ऐसा हुआ कहाँ ? नीरू की एक नज़र ने उन्हें मोम कर दिया था। उन्होंने आँखें झुका ली थीं। ''कुसुम! इधर आओ।'' नीरू ने आवाज़ दी थी। श्रीमती कुसुम कुमारी उठकर यंत्रवत् उसके पीछे चलीं। बरामदे के सामने सहन में कुर्सियाँ लगी थीं। दो कुर्सियाँ खींचकर पहले उन्हें बैठने को कहा। फिर ख़ुद बैठा और ढेरों बातें करता रहा। बच्चों और पति के बारे में पूछा। पति के नहीं आने का कारण जाना। धन्नी, बन्नी,दामाद और दौहित्रों को बुलवाकर मिला। अपने बारे में बताया कि एक बेटी और दो बेटे हैं। बेटी की शादी हो चुकी है। बड़ा बेटा विवाह के बाद विदेश में बस गया। छोटे ने इसी साल बैंक की नौकरी ज्वाइन की है। साथ ही रहता है। पत्नी चार साल पहले गुज़र गईं। अच्छी प्रैक्टिस है। वकालत के पेशे के चलते निकलना कम होता है। उसके पिता नवरंग सहाय अभी जीवित हैं।अस्सी के ऊपर जा चुके हैं। साथ ही रहते हैं। उनकी सेवा के लिए एक फुलटाइम नर्स है....। श्रीमती कुसुम कुमारी कभी उसके प्रश्नों के जवाब देतीं, कभी उसकी बातें सुनते हुए पुराने दिनों की कोई स्मृति-छवि पकड़ने लगतीं,......तो कभी उसकी किसी बात पर मुस्कराकर नज़रें झुका लेतीं। बहुत देर तक दोनों साथ बैठे रहे थे। इस बीच बन्नी चाय दे गई थी। चाय ख़त्म करके श्रीमती कुसुम कुमारी ने पूछा था - ''अभी तो तुम रुकोगे ?''
''हाँ,
परसों बहूभोज के बाद देर रात की ट्रेन से निकलूँगा।.....कुसुम! शादी-विवाह का
घर
है,
फिर फ़ुर्सत मिले, न मिले। एक
बात कहना चाहता हूँ।'' नीरू के स्वर में गम्भीरता
थी। मायका प्रवास का एक-एक क्षण यादगार बनता गया। भीड़ के बीच हर क्षण नीरू की ऑंखें श्रीमती कुसुम कुमारी का पीछा करती रही थीं। हर रस्म पर जब भी वह सजती-सँवरतीं, उनकी भी इच्छा होती कि नीरू देख लेता! और होता भी यही। जैसे, बाबू निरंजन सहाय इस क्षण की प्रतीक्षा कर रहे होते और अचानक प्रकट हो जाते। बहूभोज की रात, भीड़ में नीरू की ऑंखें सिर्फ़ उनके पीछे ही घूमती रहीं। लेसर किरणों की तरह उनके भीतर उतरती रहीं नीरू की ऑंखें। श्रीमती कुसुम कुमारी के मन का कोना-कोना दीपित हो उठा था। असंख्य कंदीलों के प्रकाश से जगमगा उठे से मन के गह्वर। अपने विवाह के बाद आरंभिक दिनों में उनकी ऑंखों से बहे आँसू के क़तरे फूल बनकर खिल उठे थे,......उनके मन के आकाश में जगमगा रहे थे। आह्लाद से भरी हुई छपरा लौटी थीं श्रीमती कुसुम कुमारी। सोचा था, घर पहुँचते ही पति को यह ख़ुशख़बरी देंगी। उन्हें विश्वास था कि लड़का ढूँढ़ने और दहेज़ जुटाने की त्रासद यातना से मुक्ति का यह संदेश पति को आह्लाद से भर देगा। पर यहाँ तो मौसम ही बदला हुआ था। श्रीमती कुसुम कुमारी दिन भर पति से संवाद स्थापित करने की कोशिश करती रहीं, पर अष्टभुजा लाल ने नाक पर मक्खी नहीं बैठने दी। वह पीछे-पीछे घूमतीं और अष्टभुजा लाल दुलत्ती झाड़कर किना |