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उपन्यास अंश
दो पाटन के बीच आटा-चक्की के कानफाड़ू 'खटपिट खटपिट' का शोर सलमा का कुछ नहीं बिगाड़ पाता। सलमा को जीवन की राह की तमाम दिक्कतों और परेशानियों से दो-चार होने में बड़ा मज़ा आता है।इसीलिए सलमा ने आटा-चक्की के बेसुरे 'खटपिट खटपिट' को एक ताल का रूप दे दिया और मन ही मन उस ताल पर एक गीत बना लिया है....'खटपिट खटपिट... खटपिट खटपिट....
सलमा खटती,
दिन-भर खटती इसी लय में डूबती-उतराती सलमा अपने तन-मन की ज़रूरतों से आजकल बेख़बर रहती है।आटा-चक्की के साथ कब वक्त गुज़र जाता, सलमा जान न पाती। अल्लाह ने उसे इस काम में इतनी बरकत दी थी कि न कभी गेहूं ख़त्म होता और न कभी काम...जिसे गेहूं महीन पिसवाना हो वह महीन पिसवाए और जिसे मोटा चाहिए वह मोटा पिसवा ले... सलमा अपने ग्राहकों की फ़रमाईश दिल लगाकर पूरा करती ताकि मुहल्ले के लोग उसकी चक्की पर ही गेहूं पिसवाएं। सलमा ने चक्की के बाईं ओर रखी गेहूं की थैलियों की लाईन पर निगाह डाली। सोलह-सत्रह थैलियां। कुछ प्लास्टिक की बोरियां, कुछ कनस्तर और कुछ गेहूं भरे बोरे...आखिरी वाली थैली के पीछे एक मोटा सा चूहा झांक रहा था। सलमा ने चूहे को घुड़की दी। चूहा ठहरा ढीठ, सलमा को टुकुर-टुकुर ताकने लगा, जैसे उसका जन्मसिध्द अधिकार हो। तब सलमा ने आटा ठूंसने वाला मुगदर चूहे की तरफ़ फेंक मारा। चूहा सरपट भाग गया। आटा-चक्की में चूहे आएं भी क्यों न! चक्की बिठाने को बिठा ली थी सलमा ने, लेकिन आज तक उसके पास इतने पैसे न जुटे कि वह अंदरूनी दीवारों पर प्लास्तर करवा सके। दीवारों पर ईंट की जुड़ाई सीमेंट की जगह मिट्टी से की हुई है। चूहों, खटमलों और कनखजूरों के लिए तो जैसे स्वर्ग हों ऐसे घर...आटा-चक्की में कई तरह की चीज़ें पिसने आती हैं। चूहों के पास स्वाद बदलने के बहुत विकल्प थे।चूहे चाहे तो गेहूं पर हाथ साफ करें, या चने पर या मकई पर। इसीलिए सलमा लोगों की थैलियों पर लाया गया गेहूं या अन्य सामान तत्काल पीस दिया करती। वह नहीं चाहती थी कि चूहों की बदमाशियों का खामियाजा उसे या उसके ग्राहकों को भुगतना पड़े। मुहल्ले की एकमात्र आटा-चक्की है ये। लोग गेहूं, मकई, चना और चावल आदि सलमा की चक्की में पिसवाते हैं। सलमा के पास, यदि दिन भर और काम न भी आए तो भी तीन-चार घण्टे का काम हाथ में रहता ही है। लेकिन इस बिजली कटौती का क्या किया जाए? जैसे बारह बजा नहीं कि बिजली गुल हो जाया करती है। दुपहर बारह से तीन बजे तक बिजली कटौती रहती है। अब तीन बजे के बाद बिजली आएगी, तब बाकी का काम निपटाया जाएगा। ये सोचकर सलमा ने चक्की के फीडर को थोड़ा और खोल दिया ताकि सूपड़े पर बच रहा माल जल्द पाटों के बीच आकर पिस जाए। खटपिट खटपिट....खटपिट खटपिट.... आटा-चक्की के चलने से ऐसी ही आवाज़ उठती है।सलमा कभी भी 'बोर' नहीं होती।लेकिन सलमा ऐसे खुश भी नहीं होती।सलमा वक्त-बेवक्त रोती-सिसकती नहीं।अपनी चालीस साल की उम्र में उसने जीवन के ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर बेरोक-टोक दौड़ने की सलाहियत पैदा कर ली है। वह जानती है कि इस संसार में, हर आदमी अपना 'सलीब' खुद ढोने के लिए अभिशप्त है।बाकी के रिश्ते-नाते सब संयोग मात्र हैं...ये महज़ एक इत्तेफ़ाक है कि कोई किसी की मां है, कोई किसी का बाप। संयोगवश कोई किसी का भाई है, कोई बहिन... दुनिया में जो कुछ भी दिखलाई देता है, सब संयोग ही तो है। क्या हमने चाहा था, कि हम इस संसार में आएं...जब हम अपनी मर्ज़ी से आए नहीं, तब इस दुनिया से शिकवा कैसा? सलमा को लता मंगेशकर का गाया एक गीत बहुत भाता है :
'दुनिया में जो आए हैं तो
जीना ही पड़ेगा सलमा बिना किसी गिला-शिकवा के अपनी बहनों और बूढ़े अब्बू की अभिभावक है।वह चाहती कि सोने के घण्टों के अलावा वह सारा दिन खटती रहे। इतना खटे कि थक कर चूर हो जाए।ताकि रात एक भरपूर नींद की मालकिन बने।एक ऐसी नींद, जिसमें किसी तरह के ख्वाब न हों। अच्छे या बुरे कैसे भी ख्वाब देखना नहीं चाहती सलमा।सलमा जानती है कि भरपेट लोगों को ही ख्वाब बुनने और चुनने का हक़ है। जिनके हिस्से में हर दिन कुंआ खोद कर पानी पीने का अभिशाप हो उनके लिए अच्छा ख्वाब क्या अहमियत रखता है।
'मैं तन्हा था,
मैं तन्हा हूं सलमा ने बड़ी बेदर्दी से अपने सपनों का गला घोंटा है।व्ह चाहती है कि इसी तरह निरंतर खटती रहे।लेकिन इस बिजली की कटौती का क्या किया जाए? इस बार तो सरकार इसी वादे के कारण बनी थी कि हर नगर-गांव को बिजली की भरपूर खेप दी जाएगी। सत्ता पाते ही अपने वादे भूल जाते हैं ये नेता-परेता। पहले की तरह बिजली की कटौती ज़ारी है।दुपहर के ठीक बारह बजे लाईट चली जाती है।आदमी चाहे तो घड़ी मिला ले। हुआ भी वही, बारह बजे नहीं कि बिजली चली गई।अभी चक्की के सूपे में आधा माल अनपिसा ही रह गया था।हज्जन बीबी के घर का आटा था।अब तीन बजे के बाद जब लाईट आएगी, तभी काम हो पाएगा।हज्जन बीबी की नौकरानी आती होगी। कह रही थी कि सलमा बीबी बड़ी 'मरजेंसी' है, झट् से पीस देना। हज्जन बीबी बड़ा घुड़कती हैं।काम अधूरा जानकर वह ज़रूर चार बात सुनाएगी तो सुनाती रहे।सलमा पावर-हाउस की मालकिन तो नहीं,, और न कोई जिन्न-परी उसके बस में है कि बिना बिजली के आटा पीस दे।जिसे सलमा की चक्की में गेहूं पिसवाना हो पिसवाए वरना जहां जाना हो जाए। सलमा ने सोचा कि अब थोड़ा घर के अंदर की भी सुध ली जाए। बहनों ने कुछ किया भी है या सिर्फ लड़ाई-झगड़ा, बनाव-सिंगार में दिन गुज़ार दिया है।उसने दुकान के बाहर बैठे अब्बू पर निगाह डाली। अब्बू धूप की सेंक का आनंद ले रहे थे।
कौन सा दिल है जिसमें दाग़ नहीं बाहर धूप में, फाईबर की कुर्सी पर आराम से अब्बू बैठे हुए हैं। उनकी पीठ पर कुनकुनी धूप पड़ रही है। अब्बू के पतले-दुबले बदन पर अम्मी के हाथों बुना बीसियों साल पुराना स्वेटर है। पहले उस स्वेटर का रंग बैंगनी हुआ करता था। अब वह मटमैली रंगत का हो चुका है।अब्बू बुत बने से धूप की सेंक का आनंद ले रहे हैं। ठंड के दिनों अब्बू की तबीयत नरम-गरम रहा करती है। अब्बू इसीलिए रोज़ाना नहीं नहाया करते। जुम्मा की नमाज़ भले वह अदा न करते हों, लेकिन जुम्मा के जुम्मा ज़रूर नहाते हैं। सलमा है कि ज़िद करके उनकी बनियान और लुंगी प्रतिदिन धो दिया करती है। अब्बू का मन करे तो वह महीनो कपड़े न बदलें। अब्बू की मैल से चीकट हुई बनियान धोते सलमा चिड़चिड़ा जाती-''चिल्लर पड़ गए कपड़ों में अब्बू, तुम नहाओ न नहाओ, एक-दो दिन के बीच लुंगी-गंजी तो धुलवा लिया करो।''अब्बू हंस देते और बड़ी मुहब्बत से उसे निहारने लगते। जाड़े के मौसम में अब्बू दुपहर में खाना खाने से पहले हाथ-मुंह मिज़ाज से धोया करते। इसके लिए सलमा सुबह धूप में एक बाल्टी पानी रख दिया करती। बारह-एक बजे तक बाल्टी का पानी धूप की सेंक पाकर कुनकुना-गर्म हो जाता। अब्बू उसी पानी से हाथ-मुंह धोते।सलमा को अपने अब्बू पर दया आया करती है। कितने कमज़ोर हो गए हैं अब्बू। किसी से कुछ नहीं कहते। बस सड़क पर आते-जाते लोगों को ख़ामोशी से ताकते रहते हैं। नगर के जिस इलाके में उनका घर है, उसे इब्राहीमपुरा के नाम से जाना जाता है। इब्राहीमपुरा यानी 'मिनी पाकिस्तान'। ये तो सलमा ने बाद में जाना कि हिन्दुस्तान में जहां-जहां मुसलमानों की आबादी ज्यादा है उस जगह को 'मिनी-पाकिस्तान' का नाम दे दिया जाता है।नगर में जहां हिन्दू आबादी ख़त्म होती है, इब्राहीमपुरा की बस्ती षुरू होती है। सलमा की चक्की एक तरह से सीमा पर स्थित है। उसकी चक्की के सामने जो सड़क निकलती है वह राम-मंदिर से आती है। रास्ते में बैंक और पोस्ट-ऑफिस है। फिर सब्जी-बाज़ार, उसके बाद बदबूदार मीट-मछली के अड्डे और उसके बाद इब्राहीमपुरा की सीमा। ये सड़क जाकर बड़ी मस्जिद पर ख़त्म होती है। सलमा की चक्की के पास ही बब्बन कस्साब की दुकान है। जहां सुबह सात बजे से रात आठ बजे तक बकरे का गोष्त मिल जाता है। बब्बन कस्साब के बगल में उसके छोटे भाई झब्बन की और सुल्तान भाई की बॉयलर मुर्गी और अण्डे की दुकान है। भरत कुर्मी और कुर्बान अली की मछली की गुमटियां भी उसी लाईन में है। सलमा को याद है कि उसकी हिन्दू सहेलियां इब्राहीमपुरा आने से डरती थीं। उन्हें लगता था कि मांसाहारी मुसलमान लोग आदमख़ोर भी हुआ करते हैं। संस्कृत पढ़ाने वाले उपाध्याय सर तो क्लास-रूम में सरेआम कहा करते थे कि ये मुसल्ले बड़े गन्दे होते हैं। सप्ताह में एक बार नहाते हैं, जुम्मा के जुम्मा। इनके घरों में अण्डा, मछली, मांस पकता है। इनके मुहल्ले में बड़ी गंदगी होती है। कई घरों के सामने बकरे-बकरियां बंधी होती हैं जो चौबीस घण्टे मिमियाती रहती हैं। मेंगनी करती और मूतती रहती हैं। मुर्गे-मुर्गियों की तो पूछो ही मत। इन सबके बीच ये मुसलमान अपने दिन-रात गुज़ारते हैं।इनके दिल में तनिक भी दया नहीं होती।ये जिस जानवर को बड़ी शान से पालते हैं, फिर उसी की गर्दन पर इत्मीनान से छुरी फेरते हैं।राम-राम, कितने निर्दयी होते हैं ये मुसल्ले...मुसलमानों में औरतों की कोई इज्ज़त नहीं। औरतें अक्सर बीमार रहा करती हैं। हर साल बच्चे पैदा करना मुसलमानों का मज़हब है। इसीलिए मुसलमानों के मुहल्ले में बच्चों की बड़ी तादाद होती है। न जाने क्यों मुसलमान ज्यादा बच्चे पैदा करते हैं। नंगे-अधनंगे गंदे बच्चे गली-मुहल्ले में छितराए रहते हैं। बच्चों और औरतों के बदन में कपड़ा हो न हो, लेकिन इन मुसलमानों की रसोईयों में मांस ज़रूर पकना चाहिए। जब अपने लिए पाकिस्तान मांग ही लिया फिर यहां काहे जगह घेरने के लिए रूक गए ससुरे! कितनी कम आबादी थी इनकी यहां। नसबंदी का विरोध इन्होंने किया, क्योंकि इनके आका इन्हें बताते हैं कि आबादी बढ़ाकर अल्पसंख्यक से बहुसंख्यक कैसे बना जाता है? सलमा को उसकी हिन्दू सहेलियां इन्हीं सब कारणों से चिढ़ाया करतीं। उसकी पक्की सहेली मीरा ने एक दिन सलमा से पूछा था कि तुम लोगों में लड़कों को मुसलमान बनाने के लिए खतना किया जाता है लेकिन लड़कियों को कैसे मुसलमान बनाते हैं?सलमा क्या बताती। सलमा ने उस दिन के बाद मीरा से 'कट्टी' कर ली थी। क्या फ़ायदा ऐसी लड़कियों से दोस्ती करके। जब उन्हें उसका मज़ाक ही उड़ाना है।स्कूल में भी तो जब देखो तब पूजा-पाठ होता रहता है, क्या रखा है इस पूजा-पाठ में। क्या पत्थर के देवी-देवता या तस्वीरों को पूजने से इनका भला होगा? वह तो उनकी हरकतों पर कभी ऐतराज़ नहीं करती है। और ऐसा नहीं है कि सलमा पूजा में शामिल नहीं होती थी। उसे आरती तक याद है। चरणामृत कैसे लिया जाता है, आरती के बाद दीपक की लौ की सेंक कैसे ली जाती है, प्रसाद कैसे दाहिने हाथ के नीचे बांई हथेली रखकर ग्रहण किया जाता है। वह सब जानती है। उसे देखकर कोई नहीं कह सकता कि वह एक मुसलमान लड़की है। फिर उसके मज़हब का ये लोग क्यों मज़ाक उड़ाते हैं, सलमा समझ न पाती।सलमा जानती है कि लोग मुसलमानों से चाहे कितनी नफ़रत करें, लेकिन गाहे-बगाहे उन्हें अब्बू की शरण में आना ही पड़ता है।अब्बू के हाथ में जादू जो है।बड़ा हुनर दिया है अल्लाह-पाक ने उनके हाथों में। अपनी जवानी के दिनों में पहलवान हुआ करते थे अब्बू। उनका नाम था महमूद जो कि बिगड़कर बन गया था 'मम्दू पहलवान'। अम्बिकापुर के नामी पहलवान बन्ने मियां की शागिर्दी की थी उन्होंने। बन्ने मियां हड्डी और नस के अच्छे जानकार थे। अब्बू ने पहलवानी से ज्यादा बन्ने मियां से हड्डी और नस की डॉक्टरी जान ली थी।हड्डियों के जोड़-जोड़ की जानकारी उन्हें है।जिस्म की तमाम नसों को अपने इशारे पर नचा सकते हैं वो। नगर के पुराने लोग अभी भी उनके पास हड्डियां बिठाने या फिर राह भटकी नसों को सीधी राह पर लाने के लिए आया करते हैं। ऐसे तमाम ज़रूरतमंद लोगों को अब्बू सुबह बुलाया करते।चाहे मरीज़ कितना भी बड़ा आदमी क्यों न हो, कुसमय इलाज नहीं करते। ये कहकर लौटा देते-''सुबह आओ...नसों की सही जानकारी सुबह ही मिलती है।''
सलमा की नींद सुबह फजिर की अज़ान
की आवाज़ से न खुल पाई तो फिर अब्बू के मरीज़ों की आमद से खुलती है।अलस्सुबह
लोग चक्की वाले कमरे से लगे बाहरी कमरे की सांकल बजाते हैं। या फिर 'मम्दू पहलवान हैं क्या?'' अब्बू बिस्तर से उठते नहीं। बिस्तर पर लेटे हुए सलमा को आवाज़ देते हैं-''देख तो बेटा, कौन आया है?''अब्बू की एक आवाज़ पर सलमा झटके से बिस्तर छोड़ती है। चेहरे पर दोनों हथेलियां फिराकर अंदाज़ से बाल दुरस्त करती है। फिर जल्दी से कपड़े की सलवटें ठीक करती, दुपट्टा गले पर डालते हुए चक्की के मेन-गेट पर लगे ताले को खोलने चली जाती है।
बाहर खड़े लोगों के चेहरे पर
दर्द की लकीरें देख वह उन्हें अंदर आने का इशारा करती।चक्की का अंधेरा
गलियारा पार कर आंगन के बाद रसोई से लगा कमरा अब्बू का है।अब्बू की चारपाई के
बगल में एक स्टूल रखा है।मरीज़ उस पर बैठ कर अपना दुख बताता। मरीज़ ज़मीन पर पैर जमा कर खड़ा होने की कोशिश करता और उसके मुंह से कराह निकल जाती।अब्बू बिस्तर पर पड़े टुकुर-टुकुर उस मरीज़ को निहारते, कुछ नहीं कहते। फिर लिहाफ़ हटा कर उठ बैठते। तकिए के नीचे से बीड़ी का कट्टा और माचिस निकालते। एक बीड़ी सुलगाते और फिर मरीज़ को स्टूल पर बैठने का इशारा करते।इत्मीनान से बीड़ी फूंक कर चारपाई से उठते और ज़मीन पर उकड़ू बैठ कर मरीज़ की एड़ियों को इधर-उधर घुमाते। मरीज़ दर्द से कराहने लगता। अब्बू के पतले-पतले हाथ उसके घुटने के पीछे जाकर जाने क्या करतब करते कि मरीज़ एक गहरी आह भर कर चुप हो जाता।अब्बू वापस अपनी चारपाई पर बैठ जाते और मरीज़ से कहते कि एक-दो बार पैर झटको।वह ऐसा ही करता।आश्चर्य! मरीज़ के चेहरे पर छाई दर्द की लकीरें अब नहीं दीखतीं। मरीज़ अब्बू को बड़े आदर से देखता तो अब्बू कहते कि नस चढ़ गई थी। गरम पानी में नमक डाल कर पैरों को दो-तीन बार धो लेना। मरीज़ इलाज से संतुष्ट होकर अपनी जेब टटोलता। अब्बू की फीस मात्र दस रूपए है। चाहे उन्हें उस हड्डी को बिठाने में एक घण्टे लग जाएं या फिर एक पल...अब्बू पैसा अपने हाथ से नहीं छूते। तकिया उठाकर इशारे से कहते कि तकिए के नीचे पैसा रख दो।मरीज़ तकिए के नीचे रूपए डाल कर बड़ी श्रध्दा से उन्हें देखता।आज के ज़माने में इतना सस्ता इलाज! कस्बे में अब तो कई लोग हैं जो इस हुनर के जानकार हैं, लेकिन मम्दू पहलवान की बात ही और है।भूले-भटके एक-दो मरीज़ हर दिन अब्बू को मिल ही जाते हैं, जिससे उनकी शाम की दारू का खर्च निकल आता है। सलमा के ख़ानदान की मुहल्ले में कोई क़द्रो-क़ीमत नहीं है। इसका कारण सलमा जानती है। जैसे कि अब्बू की पियक्कड़ी, अम्मी और मौलाना के क़िस्से, सलमा का घिनौना अतीत...वैसे इस ज़माने में दूध का धुला कोई नहीं। हरेक चादर दाग़दार है आजकल, लेकिन धन-दौलत का पर्दा बदनामियों को ढंक लेता है और ग़रीबों की बदनामियां जंगल की आग बन कर फैल जाती हैं। सलमा जानती है कि इस हमाम में सभी नंगे हैं....
कौन सा दिल है जिसमें दाग़ नहीं!
अपनी हिम्मत है, हम फिर भी जिए जाते हैं
क्या है कि अपने धुन की पक्की सलमा किसी की परवाह नहीं करती।उसने अपनी इस छोटी सी ज़िन्दगी में बड़े अनुभव बटोरे हैं। उसने संसार की कई ऐसी हक़ीक़तें जान लीं थीं, जिनके लिए एक इंसान को कई-कई जन्म लेना पड़े। मसलन सलमा जानती है कि लड़के और लड़कियों में फर्क है। लड़कियां दब्बू, शर्मीली, डरपोक, वाचाल, बनावटी और कमज़ोर सी होती हैं जबकि इसके बरअक्स लड़के दबंग, बिंदास, निडर, उद्दण्ड, शातिर और जिस्मानी तौर पर मज़बूत होते हैं। लड़कियों में आत्मविश्वास की कमी होती है जबकि लड़के असम्भव से काम भी करने का प्रयास करते हैं।लड़कों की श्रेष्ठता के पीछे कोई आसमानी-वजह नहीं है। जन्म से ही लड़कों को लड़कियों की तुलना में ज्यादा प्यार-दुलार, पोषक-आहार, उचित देख-भाल, सहूलियतें और आज़ादी मिलती है। लड़के पूरे परिवार की आंख का तारा होते हैं और लड़कियां आंख का कीचड़ नही तो और क्या होती हैं?इसीलिए तो लड़कों में आत्मविश्वास कूट-कूट कर भरा रहता है। बचपन में भकुआए से भोंदू दिखने वाले लड़के बड़े होकर कितनी जल्द राज करना सीख जाते हैं और ज़िम्मेदारियां उठाती वाचाल लड़कियां बड़ी होकर कांच के सामान की तरह हो जाती हैं, जिन्हें बड़ी होशियारी से इस्तेमाल किया जाता है कि कहीं टूट न जाएं। सलमा ने अपने अनुभवों से जान लिया था कि ये संसार एक प्रयोगशाला है, जहां इंसान ग़ल्तियां कर-करके सीखता है, क्योंकि जीना एक कला है और विज्ञान भी। इसमें लड़की या लड़के में कोई अंतर नहीं होता।सलमा अच्छी तरह जानती है कि अच्छे-अच्छे तुर्रम ख़ाँ, भूख और ग़रीबी के आगे मात खा जाते हैं। अच्छे-अच्छे विवेकवान लोग अभाव की चक्की में पिस कर कुंद हो जाते हैं। ऐसे हालात का मारा इंसान, हराम-हलाल, पाप-पुण्य और स्वर्ग-नर्क की बातों को ठेंगे पर रखकर किसी तरह अपना जीवन बसर करता है।ये नहीं सोचता कि जो उसके हिस्से में आई रोटी, हराम की कमाई है या हलाल की। गर्म तवे पर पानी की बूंद डालो तो छन्न से ग़ायब हो जाती है।गरीब का आवष्यकताएं गर्म तवे की तरह होती हैं, जिसमें सुविधाओं के छींटे पड़ते ही ग़ायब हो जाते हैं। इन्हीं घनघोर अभावों से दो-चार होती सलमा कब सयानी हो गई, वह जान न पाई। उसे हालात ने सयाना कर दिया था। वह अभी दस साल की ही थी कि उसकी अम्मी घर छोड़कर चली गई।अब्बू उस सदमे को झेल न पाए और नीम-पागल हो गए।यदि दारू का सहारा न होता तो कब के मर-बिला गए होते अब्बू।सलमा घर में बड़ी थी। सलमा बाहरी दुनिया के छल-प्रपंच से अन्जान तो थी, लेकिन असावधान नहीं थी। जीने के लिए उसने अपने स्तर पर कई तरह के चांस लिए। एक भोली-भाली लड़की से किशोरी और फिर युवती बनने का सफर, जोखिम भरे रास्तों पर, तने-तन्हा तय किया था सलमा ने।पहले-पहल तो वह बहुत हताश रहा करती थी। फिर ज़माने की ठोकरों से उसने जान लिया कि औरत को अल्लाह ने मर्दों की तुलना में एक अतिरिक्त कुदरती औजार दिया है। जिस्म का हथियार।जिसे जब चाहे औरत इस्तेमाल कर अपनी ज़रूरतें पूरी कर सकती है...चाहे तो दौलत का अंबार लगा सकती है।
जिसके पास दौलत नहीं उसके लिए
कैसा घर, कैसा दर,
कैसा समाज, कैसा वतन...एक
बार दौलत पास आ जाए,
फिर संसार में और कोई मुश्किल नहीं!
तिरिया-चरित्तर उर्फ धोखा ही धोखा अब्बू इतने कमज़ोर पहले न थे। चक्की के बाहर कुर्सी डाले बैठे-बैठे बीड़ी फूंकते रहते हैं और शाम गहराते ही दारू पीने के चक्कर में भट्टी की तरफ चले जाते हैं।अब यही उनका शगल है।जब से अम्मी ने अब्बू का दामन छोड़ा अब्बू की ये हालत हो गई है। सलमा की छोटी बहन रूकैया एकदम अम्मी पर गई है। वैसे ही साफ रंगत, पानीदार चेहरा, कटीली आंखें, भरे-भरे गाल!अब्बू जब भी रूकैया को देखते सर्द आहें भरा करते।अम्मी थीं भी रूई के फाहे जैसी नर्म-मुलायम और किसी शाहज़ादी जैसी नफ़ासत-नज़ाकत से लबरेज़। कोई सोच भी नहीं सकता था कि एक मामूली आटा-चक्की चलाने वाले के घर इतना क़ीमती ज़ख़ीरा होगा। अम्मी की पुरानी फोटो जब कभी सलमा देखती तो उसे एकदम फ़रीदा जलाल याद आती। अम्मी के गाल पर फ़रीदा जलाल जैसे डिम्पल बनते थे। बदनसीब अब्बू के पास सिवाए ग़रीबी और भुखमरी के और कोई दौलत न थी। यही ग़रीबी उनके सुख-चैन की दुश्मन बनी।अब्बू हाजी जी की आटा चक्की में मुलाज़िम हुआ करते थे। हाजी जी पुराने मुलाजिम थे। चक्की की रिपेयर खुद से कर लिया करते थे। हाजी जी की चक्की में कई तरह के काम होते थे। उनके पास धान कूटने की, तेल पेरने की, मसाला पीसने की और अब चाहे वह धान से चावल निकालने वाली चक्की हो, तेल पेरने वाली चक्की हो या फिर गेहूं, मसाला आदि पीसने वाली चक्की। अब्बू चक्की में लगने वाले भारी गोलाकार पत्थर की टंकाई का काम खुद किया करते थे। उनके पास छोटी-छोटी धारदार कई तरह की छेनियां थीं और कई हथोड़ियां भी थीं। हाजी साहब अब्बू को बहुत मानते थे। ईद-बकरीद के मौक़े पर बख्षीश बतौर सलमा के सारे परिवार के लिए कपड़े हाजी जी के घर से आया करते थे। छोटी-छोटी खुशियों के साथ ज़िन्दगी के दिन ठीक ही गुज़र रहे थे।फिर भी जाने क्यों अम्मी का दिल उस घर में नहीं लगता था।तीन-तीन बेटियां जनने के बाद भी अब्बू उनसे बेइंतेहा प्यार करते थे। उन्हें किसी किस्म की तकलीफ न हो इसका पूरा ध्यान रखते थे। अब वह चाहे कपड़े धोना हो, या बाहर से पानी लाना या फिर बच्चों के पोतड़े धोना। अब्बू अम्मी को पूरा आराम देते और सारे काम खुद ही निपटा दिया करते थे। जब सलमा बड़ी हो गई तो उसने भी अब्बू का हाथ बटाना षुरू कर दिया था। जब-तब अब्बू सुबह की रोटियां खुद ही बना-खाकर काम पर चले जाते थे। वह नाहक अम्मी को आवाज़ लगाकर जगाते न थे। अम्मी के अंदर फुर्ती का अभाव था।वह बेहद आलसी थीं।पानी-पानी चिल्लाती पड़ी रहती थीं लेकिन खुद उठकर एक गिलास पानी नहीं पी पाती थीं। हां, इसका मतलब ये नहीं कि वह आलसी थीं तो खुद को गंदा रखती होंगी। ऐसा क़तई न था। अम्मी सुबह जब भी उठतीं, बिस्तर पर ही छोटे आईने में अपना चेहरा ठीक करतीं। फिर नित्य-कर्म से फुर्सत पाकर आंगन वाले बड़े आईने के सामने खड़े होकर अपने लम्बे बालों पर कंघी करतीं और चेहरे पर सस्ता पाउडर लगातीं। आंखों पर सुरमा डालतीं। सलमा पर अम्मी हमेशा गुस्सा किया करतीं कि सलमा उनकी लिपिस्टिक को बरबाद कर दिया करती थी। फिर जब सुरैया थोड़ी जानकार हुई तो वह भी लिपिस्टिक-पाउडर की दुश्मन हुआ करती थी।
सलमा के जेहन में हल्की सी याद है उस नामुराद मौलाना क़ादरी की, जिसने अम्मी को अपने वाग्जाल में फंसाया था। मौलाना क़ादरी जब से उस क़स्बे में आया, लोगों का जीना मुहाल कर दिया था...बात-बे-बात जामा मस्जिद के बड़े हाफिज्जी की ग़ल्तियां निकाला करता था और उन्हें नीचा दिखाया करता था। वह चाहता था कि मस्जिद में बड़े हाफिज्जी की इज्ज़त कम हो जाए। किसी तरह उस |