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मर्ज तो आखिर खत्म हुई मामूजान की दास्तां । शुरूआत से ही अर्ज है ।
अपने महकमे के किसी काम से ही
मामू आए थे । मुरादाबाद काम निपटाकर । बड़े भाई फरहत के दसवीं में दुबारा लुढ़क
जाने से अम्मी और अब्बा दोनों परेशान थे । कस्बे में लटूरों की सौहबत का
सूरते हाल ये था कि उन्हें लेकर अम्मी अपनी खानाखराबी को खूब कोसतीं मगर मजाल
कि फरहत भाई के कानों जूं भी रेंगती तुरन्त तो नहीं मगर जल्द ही अम्मी मान गयीं और अगले जुम्मे को अब्बा मुझे दिल्ली छोड़ भी आए । दिल्ली बड़ा शहर है इसलिए मुझे थोक में हिदायतें थीं कि मैं अपना ध्यान कहीं और न भटकने दूं । यूं खबरों या जरूरी मालूमात के लिए टेलीविजन देखना कोई गुनाह भी नहीं था । अब्बा ने चलने से पहले खर्चे वगैरा के लिए कुछ रकम मामूजान को पकड़ाई तो वे भड़क उठे ...'क्यों तौहीन करते हैं अनवर साहब...जैसे इरशाद और सगीर हैं, वैसे ही अब नजीर मियां हैं... कोई बोझ थोड़ेई हैं' 'इसमें तो कोई शक-शुबहा है ही नहीं...पर भाईजान मां बाप की भी कोई खुशी या फर्ज हो सकता है कि नईं...' । शुक्र था ज्यादा हील-हुज्जत नहीं हुई । मेरे यहां आने के हफ्ते बाद ही मामू सामने वाले गोविल साब के यहां मेरे दाखिले के सिलसिले में तफ्तीश करने गए थे । वैसे गोविल साहब के प्रति मामूजान के ख्यालात का बित्तेभर इल्म मुझे गयी शाम ही हो गया था जब मामूजान ने हिदायत और मशविरे का मलीदा मुझे परोसा...'हम हैं छोटे आदमी...यूं अल्ला की मेहरबानी में कमी नहीं है लेकिन बरक्कत का ही खाते है । सामने वाला जो गोविल है, अनाप शनाप कमाता है । सेल टैक्स में जो है । खैर ये उसका ईमान है । मगर ध्यान रखना उसके बच्चों से कोई होड़ नहीं है तुम्हारी...।' यहां तक तो ठीक था मगर मेरे कमर फेरते ही वे अपने पर बुदबुदाए... हराम का पैसा कभी फला है किसी को...जहां तक मेरी समझ है तो मामला यही था कि दाखिले के सिलसिले में मामू पहले चार कदम दूर रहने वाले उन हजरत के पास गए थे जो कृष्ण्नगर के उसी स्कूल में अध्यापक थे । दो दिन की दरयाफ्त के बाद जब उन्होंने हाथ खड़े कर दिए तो मामू ठगे से रह गए; वे तो उन्हीं पर दारोमदार लगाए बैठे थे । 'दुनियां में रत्तीभर इखलाख नहीं बचा है... पैसे ने किस किस की रोशनी नहीं छीनी...' मामू तमतमाए थे । उसी रोज सगीर भाई अपने कुछ कागजात गोविल साहब के यहां से अटैस्ट कराकर लाएं थे सो उन्हीं का नाम सुझा दिया । मामू का मन नहीं था । लिहाजा एक दो रोज पशोपश में पड़े रहे । लेकिन कोई दूसरा जुगाड़ नजर ही नहीं आया तो लाचार होकर...। गोविल को वे शातिर जुर्मवार मानते थे । उसकी मदद लेने का मतलब था कहीं न कहीं उसके गुनाहों में शरीक होना, जो उन्हें गवारा न था । मगर यह भी था कि उन्हें मेरे मुस्तकबिल और अम्मी-अब्बा के प्रति अपनी जवाबदेही की भी चिन्ता थी । गोविल साहब के यहां जाते जाते मुझे भी साथ ले लिया । उन्होंने बड़ी खुशमिजाजी से बिठाकर हमें शरबत पिलाया और बड़े इतमीनान से वायदा किया कि जिस स्कूल में जाफर साहब चाहेंगे, मेरा एडमिशन करा देंगे । दिल्ली सरकार के शिक्षा विभाग का कोई उपनिदेशक उन्हीं के बैच का था (ये बैच क्या होता है मेरे पल्ले नहीं पड़ा, घर आकर सगीर भाई ने समझाया )। मेरे कागजातों की एक एक नकल अपने पास रखवाली थी । लौटते वक्त मामू के चेहरे पर कुछ राहत तो झलक रहीं थी मगर कई परतों से छन छनकर । गोविल के ड्रॉईंग रूम में पसरे दो पीतल के वजनदार चीतों और गलीचे को देखकर मामू को गोकि गोविल की बातों पर शुबहा थाः इतना मतलब परस्त आदमी किसी का काम यूं ही क्यूं कराऐगा । इसलिए घर आते ही उसांस लेकर बोले '...अब देखते हैं नजीर मियां तुम्हारी तकदीर को क्या मंजूर है'। गर्मी की छुट्टियों के बाद नया सैसन चालू हुए दो चार रोज बीत चुके थे । मामू सुबह दफ्तर निकल जाते तो शाम को ही लौटते । इरशाद भाई तो बंगलौर में ही थे । सगीर भाई करीब आठ तक लौटते । कभी कभार तो उन्हें ग्यारह बारह भी बजते, (तब वो बताते कि ऑडिट के सिलसिले में उन्हें एक क्लाईंट की गुड़गांवां या नजबगढ़ फैक्टरी में जाना पड़ा था)। उन्हें जितना स्टाईपेंड मिलता था उसमें माह का बस का किराया निकलने के बाद चाय पानी के लायक ही बमुश्किल कुछ बचता था । घर पर बचते मैं, मामी और सबीना दीदी । मामी तो अम्मी की तरह घर के काम काज और साफ सफाई में मशरूफ रहतीं पर सबीना दीदी तो पूरी निठल्ली होकर ऊंघती रहती । पडौस से मांगकर लायी सरिता-मुक्ता या ग्रहशोभा के भी वरक पलटने में उन्हें उबकी आती । या हो सकता है वे उन्हें कब तक पढ़तीं ? बहरहाल चर्बी उन पर काफी चढ़ आयी थी । निठल्ला तो मैं भी था मगर इसकी वजह स्कूल में दाखिले की देरी थी । शाम को एक दिन मैं टहलकर आया तो मामू घर पर चाय पी रहें थे । ' आज मामूजान कुछ जल्दी...' मैंने चकित होकर पूछा तो बोले 'हाँ नजीर मियां, तुम्हारे ही सिलसिले में एक जगह गया था... उसके बाद सीधा घर ही चला आया ...वाईस प्रिंसपल से एक जान पहचान निकाली है...अब देखो' । मामू का चेहरा मुरझैल था । पता नहीं कहां कहां की ठोकरें खाकर आ रहे होंगे ? मुझे मामू पर तरस और खुद पर किल्लत हो आयी । मगर मैं करता भी क्या...सिवाय मन ही मन कसम खाने के कि मामू बस दाखिला करा दो, फिर देखना मैं कैसे अव्वल नम्बरों से...। मेरी चुप्पी को पढ़कर मामू ने ही टहेला 'भाई नजीर मियां, तुम्हारी एक बात हमारी समझ नहीं आयी... तुम चाय भी नहीं पीते हो...' । 'चाय कोई नियामत तो है नहीं' मामूजान कि बिना पीए गुजारा न हो... आपको तो पता ही है, घर पर अम्मी-अब्बा फरहत भाई सब पीते थे, मैंने कभी नहीं पी ।... चाय से खली पीली कुछ होता भी है' मेरे जवाब में पता नहीं कैसे चंदौसी घुल आयी। 'अरे नहीं, माशाअल्ला, अच्छी आदत है, मगर वो क्या है नजीर मियां कि दूध दही तो तुम जानते हो यहां कैसा है । बीस रूपये किलो में क्यां तो कोई पीए और क्या पिलाए... शहर में रहकर पचास तरह के खर्चे अलैदा' मामू जैसे किसी जुर्म के साये में सफाई देने लगे । 'वैसी कोई बात है ही नहीं मामू... आप अम्मी से पूछ लेना...दूध या दूध की चीजों से मुझे बचपन से ही एलर्जी सी है...' । मेरे बयान से उन्हें कितनी तसल्ली हुई ये तो पता नहीं मगर मेरी आदतों के बरक्स थोड़ी राहत वे जरूर महसूस करते थे । हर सुबह उठकर कृष्ण्नगर की मदर डेयरी से एक लीटर दूध और हर तीन चार रोज में शाहदरा मंडी से सब्जियां मैं लाने लगा था । थोड़ा बहुत इधर उधर का परचूरन भी । यह सब करने में मुझे कतई तकल्लुफ इसलिए नहीं होती थी कि एक तो यह सब मैं चंदौसी में करता ही था; दूसरे, घर से बाहर निकलने का भी यह अच्छा जरिया था । फिर मुझे कौन सा पैदल जाना होता था; मामू की साईकिल थी ही । तो क्या हुआ जो वह मामू के ही हिसाब से चलती थी ! अगले इतवार के बाद जो सोमवार आया उसमें मामू आधी छुट्टी करके ही घर आ गये । साथ में वो हजरत भी थे जिनकी वाइस प्रिंसपल से जान पहचान थी । कृष्णनगर के जिस सरकारी स्कूल में दाखिला होना था वह दोपहर को ही खुलता था । सुबह की शिफ्ट लड़कियों की थी । पहुंचने पर वाईस प्रिंसपल साहब ने हम लोगों को बाइज्जात अन्दर बुलाया, कागजात देखे और दाखिले का फॉर्म भरने को दे दिया । कोई एकसौ दस रूपये नकद फीस भरनी थी जो मामू ने फौरन दे दी । तभी मैंने देखा कि वह सौ का पत्ता जो मामी ने किसी शगुन की तरह चलते वक्त मामू की जेब में ठूंस दिया था, बड़ा काम आया । वर्ना तो बात किरकिरी हो सकती थी । चलते समय वाईस प्रिंसपल साहब ने अदब से उठकर कहा 'जाफर साहब, मैं तो पुरी साहब से बात कर ही लुंगा पर आप भी उन्हें इन्फोर्म कर दें कि जिस ऐडमिशन के लिए उनका आदेश था, हो गया है...उन्हें अच्छा लगेगा और तसल्ली भी रहेगी' मामू थोड़ा अचकचाए । कौन पुरी साहब ? मैं तो नाम ही पहली मर्तबा ... मगर आदाब करते खिलखिलाए ...'अरे जनाब, आपका लाख शुक्रिया... मैं उन्हें आज ही इत्तला कर देता हूं ' । मैं समझ गया --- शायद मामू भी, कि ये पुरी साब गोविल साब के ही हमबैच होंगे । मगर मामू को इस पर यकीन, होते हुए भी, नहीं था । थोड़ा समय लगा, मगर काम मुकम्मल हुआ । मैंने अम्मी को तीसरे खत में बता भी दिया । मेरी गैर हाजिरी में थोड़ा परेशान तो हो रही होंगी, मगर अब तसल्ली मिल जाएगी ।कितना सुकून मिलता है जिन्दगी की गाड़ी के पटरी पर चलने में । सगीर भाई और मामू की तरह मेरा भी एक ढर्रा बन गया । सुबह उठकर एकाध वही घरेलू काम, फिर स्कूल का होमवर्क, नहाना-धोना, खाना और फिर स्कूल को रवाना । शाम को वापसी । फिर मामी या सबीना दीदी से थोड़ी बहुत गपशप । टीवी में एकाध प्रोग्राम और उसके बाद खबरें । खबरों को मामू बहुत ध्यान से सुनते, गोया किसी झंझावात का अंदेसा हो । उस वक्त उनसे कुछ भी पूछना कहना उन्हें नाकाबिले बर्दास्त था ।इस बीच रोजे आए, ईद आयी । मामू के एक खास दोस्त ने ढेर सारी ईदी भिजवायी । दिल्ली की पहली ईद पर लगा, यहां के बासिंदों का कलेजा वाकई बड़ा होता है । मामी ने एक भगौना भर के सिवैयां बनाई । मुहल्ले के लोग ईद मुबारक करने आए । मिसेज गोविल अकेली आयीं । मामी की कटौरी भरी सिवैयों में से उन्होंने बमुश्किल एक चम्मच खायी । बाकी छोड़ दी । लेकिन जिन्दगी यूं ही ढर्रे पर चलती रहे तो कैसे यकीन होगा कि ढर्रे पर चल रही है । उसमें कुछ धौल-धक्का तो लगना ही था । और जिस दिन यह लगा, सचमुच कयामत आ गयी । उस रोज सगीर भाई गुड़गांवां ही ठहरने वाले थे (गोविल साब के यहां फोन करके उन्होंने बतला दिया था ) । खबरें हम सब ने इकट्ठी ही सुनी थीं । दो चार सवाल लगाने के बाद मै भी सो गया था । हमारी सोने की जगह अमूमन तय थीं - हम दोनों भाई आगे वाले कमरे में (यानि ड्रॉईंग रूम में) तथा मामू-मामी और सबीना दीदी अन्दर वाले कमरें में । और कोई आ जाता तो या तो हम लोग गुंजाइश करते या फिर छत जिंदाबाद । जुलाई का आखिर था तो उमस बेइन्तंहा थी । चंदौसी में जैसे बन्दरों का कहर है, पूर्वी दिल्ली में वैसे ही बिजली का है : फर्क यही है कि एक कब न आ जाय तो दूसरी कब न चली जाय ! सबीना दीदी ने रूआंसी होकर उठाया 'नजीर नजीर, उठना तो...अब्बा की तबियत ठीक नहीं है !' पूरा घर रोशनी से सराबोर था । चुंधियाते हुए मैंने देखा तो कोई डेढ़ बज रहा था । दूसरे कमरे में पड़े फोल्डिंग पर मामू आंख मूंदे ही हांफे जा रहे थे । मामी हथेली सहला रही थीं । वह कुछ बुदबुदाते तो मामी पूछती ...'कैसा लग रहा है ?' वे बिना बोले दूसरे हाथ को डैने की तरह हवा में हिला देते ... ठीक नहीं लग रहा है । मैंने अपने घर में ऐसी हालत किसी की नहीं देखी थी। सबीना दीदी ने बताया कि एक डेढ़ घंटे से यही चल रहा है । बारह बजे के करीब बिजली गयी थी, तभी मामू थोड़े परेशान होकर उठ बैठे थे । पानी मंगाकर पीया मगर फौरन ही उल्टी कर दी । वो तो अच्छा हुआ कि बिजली थोड़ी देर में ही आ गयी । पहले कहने लगे, मतली हो रही है । उल्टी कर दी तो हमनें सोचा राहत मिल जाऐगी । मगर फिर कहने लगे पेट में दर्द सा उमड़ रहा है । आधा गिलास नीबू पानी पीया (मुझे तसल्ली हुई कि आज सब्जी लाते में मैंने पचास ग्रांम नीबू भी चढ़वाए थे) । मगर फिर भी घबराए जा रहे हैं । और वाकई ऐसा था । मामू के टकलू सर पर पुरजोर पसीना चुहचुहा रहा था । मेरे लिए यह नजारा बड़ा अटपटा था । अम्मी अब्बा को सर-दर्द या बुखार वगैरा में कराहते तो देखा था मगर वह तो बाम की मालिश या सर पर पट्टी खींच देने से काबू हो जाता था । यहां तो लग रहा था दिलोजान से प्यारे मेरे मामू को किसी ने चलती बस से फेंक किया है और वह जोड़ों के दर्द से छटपटा रहे हैं। एक बार तो मैं घबरा गया । किसी तरह अपनी घबराहट अपने तईं संभलकर मैं मामू के करीब गया और दुलार करते हुए धीमे से पुकारा '...मा.मू...मा.मू...'। जवाब की ख्वाइश होती तब भी नहीं दे सकते थे क्योंकि ऐन वक्त पर उनकी खांसी उखड़ गयी जिसमें 'अल्लाह अल्लाह' की गुहार बड़ी बेकसी से शरीक होती जा रही थी । खांसी का जलजला थमते ही बड़ी बेचैनी से अपनी मुंडी को वे तेजी से 'उंह उंह' की बुदबुदाहट के साथ दांए-बांए घुमाते । मैंने मामू की दूसरी हथेली अपने पंजो में थाम ली ।
एक दो दिन से मामू थोड़े बदन
दर्द या हरारत की शिकायत सी तो कर रहे थे लेकिन वो तो दिल्ली की बसों में
सुबह शाम सफर करने वाला हर इन्सान हरचंद करता होगा । उस दिन सगीर भाई के साथ
जब लालकिला और जामा मस्जिद देखने गया था तो लौटकर मेरी भी हुलिया कैसी टाईट
हो गयी थी। मुझे थोड़ी झुंझलाहट हुई कि सगीर भाई को घर से आज ही गैर हाजिर
रहना था । सबीना दीदी तो निकम्मेपन की हद तक लद्दड़ हो रही थी । रात के इस पहर
में मामू को कहां ले जाएं,
कैसे ले जांए?
रिक्शा भी नहीं मिलने की
है। और डॉक्टर या दवाखाना ? दवाखाने
की याद आते ही मैंने मामी को तलब किया । मुझे एक झपाटे से ख्याल आया कि इस तूफान से गोविल अंकल ही निजात दिला सकते हैं। और मैंने मामी की इजाजत लेकर उनकी डोरबेल बजा दी।दरवाजा उन्होंने ही खोला । गहरी नींद से उठने का अजनबीपन उन पर अभी तक चस्पां था लेकिन बिना एक पल जाया किए मैंने उन्हें मामूजान की हालियत से वाकिफ कराया ।'एक मिनट' कहकर वे सिलबटी कुर्ते पायजामे की जगह दुरूस्त पैण्ट-शर्ट डाल आए (मुझे यह तकल्लुफी अंदाज दिल्ली की खास पहचान लगा, वर्ना अपनी चंदौसी में तो कुर्ते पायजामे में लोग मुरादाबाद - बरेली छान आंए)। तब तक गोविलानी (मोहल्ले में सारी औरतों को उनके खाविन्दों के नाम में इसी तरह तब्दीली करके जाना जाता था। इस सिलसिले में मोहल्ले की गुफ्तगू से ही मुझे पता चला था कि कमबख्तों ने मेरी मामी का नाम एक जर्रा और मरोड़कर ;जाफरानी पत्ती' कर दिया था) आंटी भी उठ आयीं थी । उनके 'व्हाट हैपन्ड' का जवाब गोविल अंकल ने मुख्तसर देकर चाबियों का एक गुच्छा उठा लिया और मुझसे मुखातिब होकर बोले 'चलो' । घर आकर मैंने देखा मामूजान नमाज अदा करने के अन्दाज में आंखें मूंदे बैठे थे । जैसे निचुड़ा हुआ नीबू । गोविल अंकल ने कुछ जान फूंकती आवाज में पुकारा 'अरे जाफर साहब, क्या हो गया ... घबराईए मत' फिर नब्ज थामकर यकीन दिलाते बोले '...कोई खास बात नहीं है...बस घबराहट है ' । मामू और हम सबकी हौसला अफ्जाई में उनके अल्फाज बिलाशुबहा कामयाब थे । मामूजान के चेहरे पर मुश्कराहट की हल्की सी किरच छिंटक आयी तो मुझे घर पर किसी 'आदमी' के होने भर से मुस्तकिल राहत मिली । वर्ना मामी की लड़खड़ाती आवाज को देखकर तो लग रहा था कि मामू तो मामू, कहीं मामी न ज्यादा तकलीफ का सबब बन जाएं । बीपी और शुगर तो उन्हें है ही । दवाखाने की सलाह पर मामी ने शालीमार पार्क वाले डॉक्टर अमीन के दवाखाने का नक्शा गोविल साब को समझाया ।
'जाफर
साहब गाड़ी तक चल पायेंगे या उठाकर ले चलें'
बरांडे में सो रही किसी दाई सरीखी औरत ने बताया कि डॉक्टर साब तो बाहर गये हुए हैं 'दूसरा कोई डॉक्टर' के जवाब में उसने दो टूक 'नहीं' कहा और लेटे लेटे ही करवट बदल ली । मुझे ताज्जुब हुआ, क्या दिल्ली में ऐसे भी दवाखाने होते हैं ? 'अब क्या करें जाफर साब... कहां चलें' अपने फर्ज की एक किश्त पूरी करने के अन्दाज में गोविल साब ने मामू से पूछा जो पिछली सीट पर अधलेटे पड़े थे ।
'कोई
और दवाखाना नहीं खुला होगा?'
मामूजान ने गोविल साब की
ओर ही खुद को लुंढ़काया । गोविल ने तुरन्त फैसला किया।अरोड़ा का दवाखाना कोई मील भर दूर होगा । दवाखाना क्या, बीच बाजार में बहुमंजिला कोठी थी । दरवाजे पर मरीज के मालूमात पूछकर हमें पांचवीं मंजिल पर जाने को बोल दिया गया जिसके लिए एक कद्दावर लिफ्ट मौजूद थी । डॉक्टर अरोड़ा तो नहीं थे लेकिन डॉक्टर साहनी नाईट डयूटी पर थे । गोविल अंकल ने डॉक्टर अरोड़ा से अपनी जान पहचान का हवाला देकर बटुए से निकालकर एक शिनाख्ती कागज डॉक्टर साहनी को पकड़ाया और तुरन्त अपने करीबी दोस्त को अटैन्ड किए जाने की गुजारिश की । आनन फानन में, एक तैयार बैड पर मामू को लिटाकर डॉक्टर मामू की जांच करने लगा । वहीं मैंने देखा कि छोटी सी मशीन से एक लम्बा कागज ऊल बिलाब सी लाईन बनाता हुआ बाहर निकल रहा था । मुझे बाद को पता चला कि इसे ईसीजी कहते हैं । खैर मुझे क्या, ये तो डॉक्टर जानें । थोड़ी देर बाद मामू के मुंह में थर्मामीटर भी लगा दिया । बाद में जब डॉक्टर साहनी मामू की नब्ज का मुआयना करने लगे तो उनका ताररूख भी लेने लगे ।
'आप
कहां काम करते हैं?'
'शाम
को कुछ बाहर-वाहर तो नहीं खाया पीया था
?' 'बस यही तो गड़बड़ कर दी आपने' साहनी ऐसे बोले गोया सुराग पकड़ लिया हो । मामू कसूरवार से देखते रहे, बोले कुछ नहीं । अब डॉक्टर उनकी नब्ज छोड़ स्टैथिस्कोप लगाकर जांच करने लगा । बोलना मगर मुसलसल था । ' इस उम्र में रात को उड़द की दाल गड़बड़ नहीं करेगी तो कब करेगी' साहनी के नतीजे में तोहमत थी । मैं मन ही मन बड़ी राहत महसूस कर रह था । एक तो यही देखकर कि मामू कम & |