![]() |
मुखपृष्ठ | कहानी | कविता | कार्टून | कार्यशाला | कैशोर्य | चित्र-लेख | दृष्टिकोण | नृत्य | निबन्ध | देस-परदेस | परिवार | फीचर | बच्चों की दुनिया | भक्ति-काल धर्म | रसोई | लेखक | व्यक्तित्व | व्यंग्य | विविधा | विश्व साहित्य | संस्मरण | सृजन | स्वास्थ्य
साहित्य कोष | समाचार | |
|
Home | Samachar | Boloji | Kabir | Writers | Contribute | Search | Fonts | Feedback | Contact | Share this Page! |
|
|
लघुकथा
अगले स्टेशन पर सीट पर बैठा आदमी उतर जाता है। उसकी जगह खड़ा आदमी बैठ जाता है। जहां वह खड़ा था, वहां अब दूसरा आदमी खड़ा है। थोड़ी देर बाद खड़ा आदमी बैठे आदमी से कहता है, भाई साहब! थोड़ा सा खिसकेंगे? बैठा आदमी खड़े आदमी से कहता है, यार देख रहे हो चार लोगों की सीट पर पांच लोग बैठे हैं। कहां खिसकूं? इसके पहले कि खड़ा आदमी यह कहता कि भाई साहब, बैठने को तो छह-छह, सात-सात आदमी बैठ सकते हैं, बैठा आदमी खिड़की से बाहर देखने लगता है।
|