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तीस साल बाद
कपिल
टॉयलेट से फारिग होकर ही किसी आगन्तुक से ''
इतनी सुबह
?
मुवक्किल होंगी। दफ्तर में
श्रीवास्तव होगा,
उससे मिलवा दो।''
कपिल टॉयलेट में घुस गया। इत्मीनान से हाथ मुँह धोकर जब वह नीचे आया तो उसने देखा, सोफे पर बैठी दोनों महिलाएं चाय पी रही थीं। एक सत्तर के आर्सपास होगी और दूसरी पचास के। एक का कोई बाल काला नहीं था और दूसरी का कोई बाल सफेद नहीं था, मगर दोनों चश्मा पहने थीं। कपिल को आश्चर्य हुआ। कोई भी महिला उसे देख कर अभिवादन के लिए खडी नहीं हुई। बुजुर्ग महिला ने अपने पर्स से एक कागज निकाला और कपिल के हाथ में थमा दिया। '' यह खत आपने लिखा था ? '' उसने कडे स्वर में पूछा। कपिल ने कागज ले लिया और चश्मा लगा कर पढने लगा। भावुकता और शेर्रओशायरी से भरा एक बचकाना मजमून था। उस कागज क़ो पढते हुए सहसा कपिल के चेहरे पर खिसियाहट भरी मुस्कान फैल गई। बोला, ''
यह आपको कहाँ मिल गया?
बहुत पुराना खत है।
तीस बरस पहले लिखा गया था। ''
कपिल ने दूसरी महिला की ओर
देखा जो अब तक निर्द्वन्द्व बैठी थी,
पत्थर की तरह।
''
अरे! सरोज,
तुम!
''
कपिल जैसे उछल पडा , ''
इतने वर्ष कहाँ थीं?
मैं विश्वास नहीं कर
पा रहा हूँ,
तीस साल बाद तुम अचानक मेरे
यहाँ आ सकती हो। कहाँ गए बीच के साल?
'' सरोज ने अपने पति की तसवीर दिखाई। एक खूबसूरत शख्स की तसवीर थी। चेहरे से लगता था कि कोई वकील है या न्यायमूर्ति। कपिल भी कम सुदर्शन नहीं था, मगर उसे लगा, वह उसके पति से उन्नीस ही है। उसने फोटो लौटाते हुए कहा,
''तुम्हारे पति भी आए हैं? '' तभी कपिल का पोता आँखे मलता हुआ नमूदार हुआ और सीधा उसकी गोद में आ बैठा। ''
मेरा पोता है।''
आजकल बहू आई हुई है। कपिल ने बताया।
कपिल सहसा इस हमले के लिये तैयार न था, वह अचकचा कर रह गया, ''
अरे! कहाँ से कुरेद लाई हो
इतनी सूचनाएं और वह भी इतने वर्षों बाद। तुम्हारी स्मृति की दाद देता
हूँ। तीस साल पहले की घटनाएं ऐसे बयां कर रही हो जैसे कल की बात हो।
'' सच तो यह था कि पिछले तीस बरसों में कपिल को सरोज की याद आई ही नहीं थी। अपने पत्र का उत्तर न पाकर कुछ दिन दारू के नशे में शायद मित्रों के संग गुनगुनाता रहा था, '' जब छोड दिया रिश्ता तेरी ज़ुल्फेस्याह का, अब सैकडों बल खाया करे, मेरी बला से।'' और देखर्ते-देखते इस प्रसंग के प्रति उदासीन हो गया था। |