मुखपृष्ठ  |  कहानीकविता | कार्टून कार्यशालाकैशोर्यचित्र-लेख |  दृष्टिकोणनृत्यनिबन्धदेस-परदेसपरिवार | फीचर | बच्चों की दुनियाभक्ति-काल धर्मरसोईलेखकव्यक्तित्वव्यंग्यविविधा |  विश्व साहित्य | संस्मरण | सृजन स्वास्थ्य |
साहित्य कोष | समाचार |

 

 Home | Samachar | Boloji | Kabir | Writers | Contribute | Search | Fonts | FeedbackContact | Share this Page!

 Click & Connect : Prepaid International Calling Cards 

 

 

 

 



 

यायावर

बहुत भटका हूँ यहाँ वहाँ
यायावर सा
जीवन के संघर्षों ने
विश्राम की मोहलत
भी न दी
कर्तव्यों के इस छोर से
उस छोर को मिलाते - मिलाते
जीवन की सतहों को
बखूबी जान लिया
जीवन के इस मोड पर
हांफता हुआ
तनिक ठिठका था
कि
भावनाओं की बूंदों
और जीवन की धूप
के अनोखे खेल से
आसमान में पल भर
को अवतरित
तुम्हारी इन्द्रधनुषी
मुस्कान ने रोक लिया
मुझ से यायावर को भी
पल भर बांध लिया
छतनार बेल सी
अपनी सुकून भरी अदृश्य बांहों में
पल भर
थाम लिया
अब तक जानी थी
जिन्दगी की सतहें
अब जान ली
गहराई जीवन की
लो मैं फिर ऊर्जामय
हूँ
नये संघर्षों से उलझने के लिये.

राजेन्द्र कृष्ण
जनवरी 6, 2002

 

Advertise Your Site             Advertise Your Site
 

मुखपृष्ठ  |  कहानी कविता | कार्टून कार्यशाला कैशोर्य चित्र-लेख |  दृष्टिकोण नृत्य निबन्ध देस-परदेस परिवार | बच्चों की दुनिया भक्ति-काल |  धर्म रसोई लेखक व्यक्तित्व व्यंग्य विविधा |  विश्व साहित्य | संस्मरण | सृजन साहित्य कोष | समाचार|
प्रतिक्रिया पढ़ें! |                         प्रतिक्रिया लिखें!

Home | Samachar | Boloji | Kabir | Writers | Contribute | Search | Fonts | FeedbackContact

(c) HindiNest.com 1999-2007– All Rights Reserved. A Boloji.com Website
Privacy Policy | Disclaimer
Contact : manisha@hindinest.com