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स्वीकृति

न जाने कैसा था वह मूक निवेदन
न जाने कैसी थी वह मौन स्वीकृति
एक लम्बा अन्तराल जिया था हमने
क्षितिज के आर पार अदृश्य डोर पकड
तुमने कुछ भी तो नहीं कहा था,
मैं ने कुछ भी नहीं सुना था
फिर भी वह कैसा आभास था कि
तुम सुनते हो मेरे मन के स्पन्दन
बांटते हो वही एक से स्वप्न
जो मैं देखता हूँ, तुम सोचते हो
उस दिन स्वीकृति के पहले पल में
एक ही शब्द तो बोला था तुमने
और सारे आवरण खुल गये थे
मैं ने ही रोक लिये थे, शेष शब्द
धर कर अपनी हथेली तुम्हारे होंठ पर
क्योंकि वो न जाने कब से
मेरे ही मन में उपज रहे थे
कहाँ रह गई थी आवश्यकता
अब कुछ भी कहने की!

- अंकुश मौनी
जनवरी 6, 2002

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