![]() |
मुखपृष्ठ | कहानी | कविता | कार्टून | कार्यशाला | कैशोर्य | चित्र-लेख | दृष्टिकोण | नृत्य | निबन्ध | देस-परदेस | परिवार | फीचर | बच्चों की दुनिया | भक्ति-काल धर्म | रसोई | लेखक | व्यक्तित्व | व्यंग्य | विविधा | विश्व साहित्य | संस्मरण | सृजन | स्वास्थ्य
साहित्य कोष | समाचार | |
|
Home | Samachar | Boloji | Kabir | Writers | Contribute | Search | Fonts | Feedback | Contact | Share this Page! |
|
|
|
कि मैं बस ऐसा ही
हूँ
बचपन के रंग बहुत गहरे हैं मन पर याददाश्त भी है कि खराब नहीं होती उम्र के साथ भी, बस यही दुखाता है मन नहीं भूल पाता वह सीख आज के स्वार्थभरे जमाने में भी कि सुख सबमें बांटों और दुख दूसरों का भी लेकर अपने दुख के साथ मन में छिपा लो देखता आया हूँ सामने मुस्कुराते चेहरे और हाथों में छिपे खंजर भी उन्हें भी लौटाया है मैंने फूल अपनी हंसी का नहीं हो पाता क्रूर उनसे भी जिन्होंने चाहा कुचलना मेरा वज़ूद बार बार नहीं रख सकता मन में कुछ भी फिर भी है बहुत कुछ जिसको सहता हूँ जो भी मिलता है उससे हंस कर मिलता हूँ यह सिध्दान्तों के बखान नहीं हैं न हैं गुणों के खजाने ये आदतें हैं मेरी कि इनसे मजबूर मैं, बस ऐसा ही हूँ.
–
राजेन्द्र कृष्ण
|
खुला बाज़ार
आज इंडिया में कितनी आधुनिकता है |
|
|
मुखपृष्ठ
|
कहानी |
कविता |
कार्टून
|
कार्यशाला |
कैशोर्य |
चित्र-लेख | दृष्टिकोण
|
नृत्य |
निबन्ध |
देस-परदेस |
परिवार
|
बच्चों की
दुनिया |
भक्ति-काल
| धर्म |
रसोई |
लेखक |
व्यक्तित्व |
व्यंग्य |
विविधा |
|
|
Home | Samachar | Boloji | Kabir | Writers | Contribute | Search | Fonts | Feedback | Contact |
|
(c) HindiNest.com
1999-2007– All Rights Reserved. A
Boloji.com Website |