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पुनर्जीवित अभिमन्यु
धुंधली यादों के कोहरे में
भीषण चक्रव्यूह के द्वार की तलाश कर रहा है।
वह डोर,
जो आततायी-स्वार्थी कुशासन का पलीता हो।
वह चोट,
जो अच्छा को बुरा से बलवान सिद्ध करे
भले मन थोडा डरे!
दुर्योधन के बदले हुए पैंतरे-
दवा की शीशी में भरा हुआ जहर!
खंडहर से गाँवो में, पगलाए कंकालों की, भूखी आत्माओं के सामने-
मनुष्यता का निवाला है।
सत्ता संचालन का कैसा हल निकाला है।
हौवा के डर से डरे हुए बच्चे- रोटी नहीं माँगें!
सुरक्षा की कीमत पर स्वतंत्रता नहीं जागे।
शिकारी कुत्तों की नस्लें यहाँ पलती हैं।
सोने को गद्दे-
घूमने को कारें, डिस्को की लाइफ- रोज नई वाइफ
खाने को भेङों की आँत!
वक्त आने पर बैठी नहीं रहेगी।
दुर्योद्दन के लिए नहीं
तो इस लाइफ के लिए
लडेंगी।
सोया रहे आदमी।
दिल्ली की रोशनी में
खौफनाक अंधेरा है।
दुर्योद्दन ने रहस्यों को अच्छी तरह
घेरा है।
दिल्ली में मरे हुए आदमी के गोश्त की बदबू है।
गली चौराहे- पिज्जा और पेस्ट्र्री, सडे हुए
खून सी गमकती है।
यहाँ के आसमान पर, ग्रस्त छितराए हुए
खेतिहर का प्रेत है।
और दुर्योधन ने उनकी मौत पर को कर नहीं लगाया है।
दिल्ली कहती है-जाहिलों-पसीने में मरो।
हमारे टीवी पर दो सौ चैनलों की बेहिसाब रंगीनी है।
तुम्हारे बच्चे जिस दूध की गंध बिना मरते हैं-
हमारी अप्सराएँ उसमें नहा कर, नजारों में स्वर्ग सिया करती हैं।
दुर्योद्दन की दिल्ली-अनोखा चक्रव्यूह है।
चले-जब तक है-चले।
कृषि के आने तक-जनता को जलना है-जले।
राह तलाशता अभिमन्यु,
चक्रव्यूह भेदकर- सात सौ शातिरों के बीच ही मरेगा।
और दुर्योधन!
तू ना सुने तो ना सही-पर-
मेरे गीतों में तेरी हड्डियों के होम का मंत्र है।
तू संसद के सरोवर में जा कर भी छिपे,
तेरी जाँघ को खतरा है।
तेरी जाँघ को खतरा है!
स्वतंत्रता
उस बच्चे की टूटी हुइ स्लेट पर
बिखरे हुए शब्द
सहे नहीं जा सकते।
थोङी देर पहले/ रोई आँखों के नीचे/ गंदे
खारेपन की अनपुँछी रेख
अभी वहीं है।
नहीं सहा जा सकता है- सङकों का मुर्दा फैलाव,
जिस पर जुलूस
अपने हत्यारों के लिखे हुए नारे लगाता हुआ
दिन में भूख और रात में शराब बन जाता है।
रंगीन तमाचों से दो चार होती माँ और दूध
का पानी मिला रंग...
चाय की दुकान पर बैठे तमाशा
और एक घूंट के पीछे छिपे चेहरे के पाउडरी चिकनेपन की
खातिर तीन फुटे कपङों से लदे
हुए कंधे-
सहे नहीं जा सकते।
कैसे सहा जाए
कि कुकुरमुत्ते सिर्फ कुकुरमुत्ते हैं।
ऊँगली की छुअन से भी टूट जाते हैं।
कैसे सहा जाए कि
हवा ने ढ़ो दिया वह सबकुछ जो अशुभ और अशिव
था।
चुप्पी, चीखें, घुटन, संत्रास, भय और दृष्टि की नफरत,
अर्थहीन शब्द और गुप्त इशारे-!!
'लिटिल ईज` की कोठरियों में
ठुसे-फँसे हम सब
ढ़ो दिये गये हैं-इतिहास से यहाँ तक।
कैसी बेशर्मी है
छत से दीवार तक ठूँसे हुए डिब्बे में, नाक से दो फुट तक निजी हवा की तलाश-
कैसी बेशर्मी है।
इस वैश्विक जेल
खाने में गंधाता पेशाब,
नथुने फङकाता बदबूदार साँढ़-
हद है बेशर्मी की!
लिपि की टाँग पर लिपटी जंजीर,
और भाषा के मुँह पर जकङा मुखबंध!
न
सृष्टि के मुख पर तमाचे सी
धरती,
धरती की गोद में विष्ठा सा मानव,
मानव के होठों पर स्वतंत्रता के शब्द- नितांत असहनीय है।
अमित शर्मा
अप्रेल
4,
2006
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समर शेष है
बुद्धिवाद का आँचल ओढ़े
अनुभव से सब रिश्ते तोडे
खडा है मानव-
झूठे आँसू, झूठी आशा,
हर जुबान पर जीने मरने के कसमों की झूठी भाषा।
दिल पर पहरा
कदम-कदम पर सौ सौ साजिश;
सौ सरगोशी,
बलती बुझती बिजली बत्ती,
दरवाजों पर दरवाजे हैं,
तालों पर सौ सौ ताले हैं-
पिता, पुत्र, पत्नी या माँ हो,
भा -बहन हो गुरू-शिष्य हो
अंधा-गूँगा चाहे बहरा,
हर चेहरा- अब छद्मवेश है।
समर शेष है।
सपनों पर से शर्म सरकती
धीरे-धीरे,
धीरे-
धीरे
...
नंगी दुनिया अब कपडों को
खोल समझती
भूखी आँखें दुनिया का हर झोल समझती
धीरे-धीरे,
धीरे-
धीरे
...
अब दिमाग से यह शराब भी उतर रही है
धीरे-धीरे,
धीरे-
धीरे
...
गुपचुप रोएँ ढ़ूँढ़ रहे हैं अपना सपना
एक जुगुप्सा अंडो जैसी उबल रही है
अँधियारे में अगल-बगल की आवाजें सब,
...गोली जैसी,
थाम कलेजा बैठी दुनिया!
गाते हँसते-लोगों के सिर काली छाया
डर के मारे ऐंठी दुनिया।
सब कुचक्र इंसां होने के-
कुछ भी अबतक हुआ कहाँ है-
लुटी-पिटी बेबस है नारी, और यहाँ सब
द्रौपदीयों के
खुले केश हैं-समर शेष है।
बूंद टपकती
रूखी आँखें सूखे चेहरे
बहती आँखें बढ़ते पहरे
हाथों में सन-सन सी उठती
खून सनक कर सिर पर चढ़ता
मन विप्लव की मूरत गढ़ता।
टप-टप-टप-टप बूंद टपकती
आँसू की हर एक बूंद में सौ प्राणों की
प्यास भरी है।
आस डरी है-कौन सी रहा फटे किनारे
किसकी ऊंगली तोड रही है फैली चुप्पी
किसका सिर आँखों से ऊपर उछल रहा है।
तलवारों की द्दार तोलती किसकी जिह्वा-
कट जाएगी-
नहीं कटी तो इस पार्टी या उस पार्टी में
बँट जाएगी
लाठी-बल्लम-लत्तम-जुत्तम
कल उतर कर धुल जाएगी
नौटंकी रूपया पीने की
शरम बेच मरने जीने की
आँखों पर परदे डालो तब
खुल जाएगी।
झंडों में डंडों का होना परम सत्य है।
रंग को हो हर कपडे में कफन छुपा,
और हर नारे की एक दुकान है।
बहुत धुआँ है- गहरी खाई
और वहीं एक बडी ठेस है- समर शेष है।
रातों में चीखों का आलम
अपने ही अनजाने चेहरे
हर सपने में
त्रास साँस में-उखडे-उख डे
रूखडे पुतले
सन्नाटे में सहसा सहसा
एक झन्नाटा-
फिर सन्नाटा।
हर किताब सी यह किताब भी
पन्ना-पन्ना चुक जाएगी।
रोती जनता अंदर-अंदर
दो-दो कदमों के दडबे में
दे सिनेमा छुप जाएगी।
सुबह-सुबह सब पागल आँखों
अखबारों में
लटक लाश सी ऐंठी-ऐंठी
सारे दिन एक पट्टी बाँद्दे
सिर्फ पेट बन-फूल पिचक कर
साथ शाम के- ढ़ल जाएँगी।
फिर सन्नाटा-फिर से चीखें
असह यंत्रणा नर होने की
यही काल है यही देश है।- समर शेष है।
अमित शर्मा
अप्रेल
4,
2006
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