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एहसास मेरे मालिक तू बता दे क्यों बना ऐसा जहॉं । सच को लाओ सामने तो दुश्मनी होती यहॉं ।। ख्वाब बचपन में जो देखा वो अधूरा रह गया । अनवरत जीने की खातिर दे रहा हूं इम्तहां ।। मुतमइन कैसे रहूं जब घर पङोसी का जले । है फरिश्ता दूर में अब आदमी मिलता कहॉं ।। हर कोई बेताब अपनी बात कहने के लिए । सोच की धरती अलग पर सब दिखाता आसमां ।। गम नहीं इस बात का कि लोग भटके राह में । हो अगर एहसास जिन्दा छोड़ जायेगा निशां ।। मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं । कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां ।। मिलती है खुशबू सुमन को रोज अब खेरात में । जो फकीरी में लुटाते अब यहॉं फिर कल वहॉं ।।
श्यामल सुमन |
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