एहसास

मेरे मालिक तू बता दे क्यों बना ऐसा जहॉं  ।
सच को लाओ सामने तो दुश्मनी होती यहॉं ।।

ख्वाब बचपन में जो देखा वो अधूरा रह गया ।
अनवरत जीने की खातिर दे रहा हूं इम्तहां ।।

मुतमइन कैसे रहूं जब घर पङोसी का जले ।
है फरिश्ता दूर में अब आदमी मिलता कहॉं ।।

हर कोई बेताब अपनी बात कहने के लिए ।
सोच की धरती अलग पर सब दिखाता आसमां ।।

गम नहीं इस बात का कि लोग भटके राह में ।
हो अगर एहसास जिन्दा छोड़ जायेगा निशां ।।

मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं ।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां ।।

मिलती है खुशबू सुमन को रोज अब खेरात में ।
जो फकीरी में लुटाते अब यहॉं फिर कल वहॉं ।।

श्यामल सुमन
मई 1, 2006

 

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