पहले जैसी बात नहीं

पहले जैसी बात नहीं, अब अपने भी गॉंव में।
सुने न कोई आल्हा-ढोला, अब पीपल की छांव में।।

चौपालों पर महफिल सजतीं, हुक्का-फरसी बीच में।
रंग की छोड़ो खेला करते, होली सब ही कीच में।।
नौटंकी में मर्द नाचते, बांधे घुंघुरू पांव में।.........

चार बजे काकी की चाकी, घरर-घरर घर्राती थी।
बृभ कंठ में प्रात: घंटी, टन-टन करती जाती थी।
हलवाहा गुड़ और मठ्ठे से, करे कलेऊ छांव में।...

चाहे किसी की भी कन्या हो, अपनी बेटी बहना है।
सबको प्यारी भली लगे बस,वो ही मुख से कहना है।।
पर टी०वी० ने अब फैलाया, प्रेम प्रदूण गॉव में।....

चाहे होय अमीर-गरीब सभी के सन्मुख पत्तल है।
लड्डू, पूड़ी, सब्जी ले लो, पूछा करते पल-पल है।।
डोंगा सिस्टम पहॅच गया अब, शहर गॉव हर ठांव में।...

घट भरने पनघट पर जातीं, घट रख सिर पर नारियॉं।
आए सावन गवें मल्हारें, झूले पड़ते डालियॉ।।
सच के लिए लगे पगड़ी की, इज्जत भी तब दांव में।....



- सन्तो कुमार सिंह
मई 3, 2006


 

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