पछतावा

न मैं कृष्ण था
न तू राधा
किसी का किसी में कुछ नहीं छूटा।
 

दोनों पूरी सावधानी से
अपना - अपना थोड़ा अंस खो कर
शेष को संभालते विदा हो गये

उम्र की काली यमुना के तट से
एक सुख की आस में!
 

तैर कर पार करने की सफल चेष्टा
साधने के बाद
इस नदी के उस किनारे पर
पहुंचने के बाद
सोचते हैं-

कुछ न कुछ छोड़ दिया होता, काश
थोड़ा ही एक दूजे में
लेन - देन की एक कसक तो रहती
तेरे - मेरे राधा - कृष्ण बनने की
एक संभावना तो रहती।

 

 

चन्द्र प्रकाश देवल
जुलाई 1 , 2006

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