रैन - बसेरा
दिन भर
थके पांवों
ठिठुरती देह और दहकती पेट की आग के
साथ
जब मैं ने प्रवेश किया
रैन - बसेरा चिढ़ा रहा था मेरा मुंह
यह रही तुम्हारी दरी
यह रहा तुम्हारा कंबल
यह रहा
तुम्हारा आज का कोना
बिछाओ, लेटो और सो जाओ
हाँ, जबकि उनकी साजिश थी
मैं भी सो जाऊं
भूख ने मुझे जगाए रखा।
हरीश
करमचन्दाणी
जुलाई 1 , 2006
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