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गीत
अपने से संवाद
 

भीतर की
सुनसान डगर पर
चल अपने संग
कुछ तो चल
बाहर के
कोलाहल से बच
अपने साथ बिता कुछ पल
 

ओ मेरे मन!
मौन क्षणों में
अपने से संवाद ज़रूरी
अंकुश रहे हठीलेपन पर
होता है प्रतिवाद ज़रूरी
- अपने सम्मुख बैठ अकेला
लज्जा से थोड़ा तो गल
 

अन्तरतम के
मानसरोवर में तू उतर
न तीरे बैठ
रत्नों के चमकीले कण हैं
- वहीं, बावरे! गहरा पैठ
अगली यात्राओं का है
पाथेय वहीं
सच्चा सम्बल
 

ओ मेरे मन!
तू अपने एकांत क्षणों में
खुद को धो
अपनी भूलों पर पछता तू
अपनी कमज़ोरी पर रो
- ऐसे मैल छुड़ा अपना सब
तू हो ले निर्मल - उज्ज्वल

बाहर के कोलाहल से बच
अपने साथ बिता कुछ पल

डॉ. निर्मल विनोद
जुलाई 1 , 2006

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