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भोर से पहले
सुनो मेरी खामोशी
कुछ कहती है
रात की नीरवता
किसने तोड़ी ?
प्यार की ये मीठी धुन
किसने छेड़ी ?
सिर्फ हम तुम और
निशा की निस्तब्धता के बीच
दो दिलो की धड़धड़ाहट
जैसे आँखों में नींद की आहट
अपने हाथों में लेकर
मेरा हाथ तुम्हारा युँ
मेरी कविता गुनगुनाना
मुझे समझाती है -
जाओ !
भोर होने से पहले
इक सपन सुनहला
दे रहा है दस्तक
तुम ख्वाबों में आने को हो !मुकेश सोनी
सितम्बर 1, 2006
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तकाजा
रक्त रंजित है आसमान
मासुम चांद ने इक खम्जर
सुरज के सीने में उतारा है
कब तक चमकता बेचारा सुरज
मौसम का तकाजा है
माना चुप रहने में ही
हम सब की भलाई है
मगर इस सन्नाटे ने हमको
अंदर तक खंगाला है
कैसे रहोगे बिना स्पंदन के
आखिर दोस्ती का तकाजा है
तुम उदास खामोश मै भी
तुम उलझन में ना ही मेरा मन सुलझा है
तुम मुझसे और मै तुमसे दुर
एक दुसरे से विलग कहाँ रहा जाता है
तुमको रोकुँ ? कैसे खुद को समझाऊँ ?
हाय ! क्या करूँ जिंदगी का तकाजा है।
मुकेश सोनी
सितम्बर 1, 2006
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