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तेरी सूरत आज स्वयं से मिलना है, बड़ी उत्सुकता है , एक अद्भुत चाव तारी है , घड़ी-घड़ी भारी है , एक अजब सी खुमारी है , और फिर करी खास तैयारी है । प्रेम का उबटन लगाकर , विवेक का सिंदूर लगाकर , अहंकार की खुश्की भगाकर , नैनों में लाज का काजल लगाकर , माथे पर आस्था – विश्वास की बिंदया सजाकर , जब तुम्हे पुकारा है , तो दर्पण ने तुम्हारा ही अक्स उभारा है।
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मेरा चाँद
डूबते सूरज से नज़र मिलते ही,
इशारा समझते ही ,
विदा होते सूरज की लाली ,
उसकी समझ में आ गई है ,
और वह लजाकर ,
छुईमुई सी शर्मा कर ,
आँखें मींचकर ,
उस ओर मुँह कर गई है ,
जिधर से उसके चाँद ने है चढ़ना,
भेस बदल, दुनिया से चोरी ,
उसके साजन ने ,
उससे फिर आ है मिलना ।
डॉ
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