तेरी सूरत

आज स्वयं से मिलना है,

बड़ी उत्सुकता है ,

एक अद्भुत चाव तारी है ,

घड़ी-घड़ी भारी है ,

एक अजब सी खुमारी है  ,

और फिर करी खास तैयारी है ।

प्रेम का उबटन लगाकर ,

विवेक का सिंदूर लगाकर ,

अहंकार की खुश्की भगाकर ,

नैनों में लाज का काजल लगाकर ,

माथे पर आस्था विश्वास की बिंदया सजाकर ,

जब तुम्हे पुकारा है ,

तो

दर्पण  ने तुम्हारा ही अक्स उभारा है। 

 

 


 

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मेरा चाँद 

डूबते सूरज से नज़र मिलते ही,

इशारा समझते ही ,

विदा होते सूरज की लाली ,

उसकी समझ में आ गई है ,

और वह लजाकर ,

छुईमुई सी शर्मा कर ,

आँखें मींचकर ,

उस ओर  मुँह कर गई है ,

जिधर से उसके चाँद ने है चढ़ना,

 भेस बदल, दुनिया से चोरी ,

उसके साजन ने ,

उससे फिर आ है मिलना ।

 

                 डॉ.शशि पठानिया
सितम्बर 1, 2006



 


सितम्बर 1, 2006