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यादें मुझे
मालूम है जानती हूँ कि
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समर्पण रात
पल-पल
अपनी
आँखों का नीर धरती पर
छिड़कती
रही ताकि
उसके रथ
के घोड़ों के
सुमों से
धूल उड़ कर उसका चीर
कर न दे मैला
फिर
रात की रानी की सुगंध में
नहा कर
सितारों की ओढ़नी ओढ़ कर
पक्षियों की चुरमुर के संगीत की
आरती की आरती सजा कर
प्रतीक्षा करने लगी ।
जैसे- जैसे किरणें फैलनें लगीं
उनमें समा कर हो गई सिंदूरी
कर ली अपनी साध पूरी ।
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