![]() |
मुखपृष्ठ | कहानी | कविता | कार्टून | कार्यशाला | कैशोर्य | चित्र-लेख | दृष्टिकोण | नृत्य | निबन्ध | देस-परदेस | परिवार | फीचर | बच्चों की दुनिया | भक्ति-काल धर्म | रसोई | लेखक | व्यक्तित्व | व्यंग्य | विविधा | विश्व साहित्य | संस्मरण | सृजन | स्वास्थ्य
साहित्य कोष | समाचार | |
|
Home | Samachar | Boloji | Kabir | Writers | Contribute | Search | Fonts | Feedback | Contact | Share this Page! |
|
|
|
यादें मुझे
मालूम है जानती हूँ कि
|
समर्पण रात
पल-पल
अपनी
आँखों का नीर धरती पर
छिड़कती
रही ताकि
उसके रथ
के घोड़ों के
सुमों से
धूल उड़ कर उसका चीर
कर न दे मैला
फिर
रात की रानी की सुगंध में
नहा कर
सितारों की ओढ़नी ओढ़ कर
पक्षियों की चुरमुर के संगीत की
आरती की आरती सजा कर
प्रतीक्षा करने लगी ।
जैसे- जैसे किरणें फैलनें लगीं
उनमें समा कर हो गई सिंदूरी
कर ली अपनी साध पूरी ।
|
|
|
मुखपृष्ठ
|
कहानी |
कविता |
कार्टून
|
कार्यशाला |
कैशोर्य |
चित्र-लेख | दृष्टिकोण
|
नृत्य |
निबन्ध |
देस-परदेस |
परिवार
|
बच्चों की
दुनिया |
भक्ति-काल धर्म |
रसोई |
लेखक |
व्यक्तित्व |
व्यंग्य |
विविधा |
|
|
Home | Samachar | Boloji | Kabir | Writers | Contribute | Search | Fonts | Feedback | Contact |
|
(c) HindiNest.com
1999-2008 All Rights Reserved. A
Boloji.com Website |