यादें 

मुझे मालूम है
जानती हूँ
और मानती भी
कि
मेरे सिर के वे बाल
पक कर कब के झ
चुके हैं,

परंतु फिर भी,
आज भी अपनी चोटी के सिरे पर
तेरे पोरों के निशान साफ दिखते हैं।
मुझे मालूम है

जानती हूँ
और मानती भी
कि
मैं अब उन आखों से ओझल हूँ,
मगर फिर भी
आज भी अपने चेहरे के फीके प
ड़े रंग पर
उनकी चमक कौंधती साफ दिखती है ।
मुझे मालूम है

जानती हूँ
और मानती भी
कि
भी
में
मेरे सामने ख
ड़ी यह एक जोड़ी आँखें तुम्हारी नहीं हैं,
लेकिन फिर भी सोचने लगती हूँ

कि
कहीं तुम ही तो नहीं
और सब यादें मूर्त होने लगती हैं तेरी सूरत में।              

                      डॉ.शशि पठानिया
सितम्बर 1, 2006

 

 

 

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समर्पण

रात

पल-पल

अपनी आँखों का नीर

धरती पर छिकती रही

ताकि

उसके रथ के घोड़ों के सुमों से

धूल उड़  कर  उसका  चीर

कर न दे मैला

फिर

रात की रानी की सुगंध में

नहा कर

सितारों  की  ओढ़नी  ओढ़  कर

पक्षियों  की  चुरमुर  के   संगीत की

आरती  की  आरती  सजा कर

प्रतीक्षा  करने  लगी ।

जैसे- जैसे किरणें फैलनें लगीं

उनमें  समा  कर  हो  गई  सिंदूरी

कर  ली  अपनी  साध पूरी ।

डॉ.शशि पठानिया
सितम्बर 1, 2006