प्रकाश
स्याह अंधेरों में मैंने
कल उजालों से बात की
कहा.....इन बढ़ते सायों को
धीरे - धीरे छोटा कर दो
शायद तुम्हारी सरहदों के
दायरे बढ़ जाएं
तेज़ चुभती हवा की
सीमाएं घट जाएं

हम अपने आप को देख सकें
जान सकें
अपनी भटकती परछाइयों को
पहचान सकें
आकाश में फैले टिमटिमाते
सितारों को देखो
जो अपनी रोशनी से
एक आस तो देते हैं
उभरते और डूबते सूरज को देखो
जिसके बदलते रंग
एक विश्वास तो देते हैं

तुम तो अपनी आत्मा की आवाज़ हो
रैंगते सन्नाटों में
मधुमय साज़ हो
अन्तरमन के घोर तिमिर में
ज्योर्तिमय एक दीप जलाओ
इन भटकते सायों को
रास्ता दिखाओ
अमावस की रात में
पूर्णिमा बन जाओ

श्याम श्रीवास्तव
अक्टूबर 15, 2006

Top