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सपने
आते हैं सपने कबूतरों की तरह
स्मृति की टहनियों पर नींद में
पत्तियों के बीच पर फड़फड़ाते
आते हैं वे गिलहरी की पूंछ के
चंवर डुलाते
बिन बुलाए बेसबब घुस आते
निजी अहातों में
सपने, न हुए जो अपने कभी
ग्रीष्म दोपहर में उड़ते हुए पत्तो से
बहार में झूमते सुकुमार फूलों से
नाचती तितलियों के उड़ते हुजूम
या फिर अस्त होते मौसम की गोधूलि में
घर लौटते पशुओं की रहस्यमय पदचाप
आते हैं सपने
हाथ में रंगबिरंगी झंडिया लिए
स्कूली बच्चों की तरह
वे आते हैं गुच्छों में
एक के बाद एक
गुब्बारों की तरह
और देखते ही देखते हो जाते
आकाश में विलीन
दिन में पलंग पर लेटे किसी
मुग्ध प्रेमी की पलकें थपथपाते
सघन उदासी के बीच
खुलती घाटियों में पर्वतों के साथ साथ
जब दूर दूर भागता है चांद
यादों की ढलानों पर तब
असंख्य कुकरमुत्तों की तरह
अचानक फूट पड़ते वे
भरा रहता है जिनके अन्दर
मीठा-मीठा जहर भरा उन्माद
सदा के लिए जैसे सुला दें वो
दर्द भरे दिलों को
श्रीनिवास श्रीकान्त
अक्टूबर 15,
2006
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