तीन क्षणिकाएं
राख
मैं
राख हूं
श्मशान की
जो सिमट गई
बस उड़ी नहीं

आग

मैं
आग हूं
उस दोज़ख की
जो सुलग ग्ई
पर जली नहीं।



नन्ही-सी कली

जब
नन्ही-सी कली थी
अछूती थी
फूल बनी
अछूत बनी।

प्रेमलता निझावन
नवम्बर
20, 2006

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