जग को दें प्यार की सौगात

सागर के किनारे पर जब कोई लहर,
तट से टकराकर ध्वस्त हो जाती है;
अवश्य ही पीछे से करती हुई हर हर,
कोई दूजी उत्ताल तरंग चली आती है।

प्रकृति के उसी अबाध क्रम में चलते हुए,
जब वर्ष दो हजाऱ छ: का अंत आयेगा;
तब भवि य के गर्भ से उन्मुक्त होकर,
र्ष दो हजाऱ सात वर्तमान बन जायेगा।

हो ऐसा कि उसके साथ उगे नया सूरज,
जिसके प्रकाश से सारा जग जगमगाये;
चहुंओर प्रस्फुटित हो जायें हर्ष की लहरें,
जन जन का तन मन प्रफुल्लित हो जाये।

क्षणिक जीवन का मर्म मानव समझ जाये,
हर मानव का धर्म मानवता ही बन जाये ;
हम सब मिलकर करें परस्पर प्रेम की बात,
नववर्ष में हम जग को दें प्यार की सौगात।


 

महेश चंद्र द्विवेदी
फरवरी 1, 2007

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