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कैक्टसइक ज़माना था जब मैं फूल हुआ करता था गुलाब का फूल हमेशा तैयार दूसरों के दुख सुख में शरीक होने को और निसार कर देने को अपनी सारी खुशी उनकी खुशी की खातिर ... लोग आते मुझसे खेलते मुझे सूंघते और फिर जब दिल भर जाता वो मुझे मसल कर निकल जाते ... फिर ऐक दिन मैं भी ज़माने के साथ बदल गया और सीख लिये जीने के हुनर उस दिन से मैं कैक्टस हो गया हूं डॉ.गौरव कक्कड
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