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यादों की चादर अलग होते ही तुमसे तुम्हारी भीनी-भीनी यादों की एक चादर बनाती गई और उस पर काढ़ने लगी उन सुखद मखमली यादों के सुनहरे धागों से रंगीन फूल-पत्तियों से भरा बाग लहलहाते वृक्ष फिर हर रोज देखती और खो जाती उन्हीं यादों में फिर आंधियां चलने लगीं रख दी समेट कर मैंने चादर कहीं यादों के यह रंग मटमैले न पड़ जाएं जब आओगे दिखाऊंगी तुम्हें मैं चादर जिसमें तुम्हारे रंग मेरी खुशबू मिल गए हैं एक साथ । -कविता
मुकेश |
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