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संवाद 

काम  कितना  कठिन  है  जरा  सोचना.
गाँव
  अंधों  का   हो  आइना   बेचना.. 

गीत जिनके  लिए  रोज  लिखता  मगर.
बात
उन  तक पहुंचे तो कटता जिगर.
कैसे
  संवाद   हो  साथ  जन  से   मेरा
जिन्दगी
   बीत जाती    मिलती  डगर.
बन
के तोता फिर गीता को क्यों बांचना.
गाँव
अंधों  का  हो   आइना  बेचना.. 

बिन  मांगे  सलाहों  की  बरसात  है.
बात
जन तक  जो  पहुँचे  वही बात है.
दूरियां
कम  करूं जा के  जन से  मिलूं
कर
  सकूं  गर  इसे  तो  ये  सौगात है.
बिन
  पेंदी  के  बरतन से जल  खींचना.
गाँव
  अंधों  का  हो  आइना   बेचना..

सिर्फ अपने  लिए क्या  है जीना  भला.
बस्तियों
  में चला  मौत  का  सिलसिला.
 
दूसरे  के   हृदय  तार  को   छू   सकूं
सीख
  लेता  सुमन  काश  ये  भी  कला.
आम
  को   छोडक़र  नीम   को  सींचना
 
गाँव   अंधों   का  हो  आइना   बेचना.

श्यामल सुमन
अप्रेल 16, 2007

 

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