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अंतस पूरा पारदर्शी कभी न था

अंतस पूरा पारदर्शी कभी न था
पर आर - पार देख सकूँ
हमेशा इतनी गुंजाइश रही है

आज अंदाजा ही लगा पा रहा हूँ
कि इधर क्या है
और उधर क्या है

दम - सा घुट रहा है
कल से एक प्रश्न - सा
उठ रहा है

इसकी दीवारों में छा गया कोहरा
कब छंटेगा?

या भीतर और बाहर
अलग - अलग बंटेगा

 

- सुशील गोस्वामी
जुलाई 13
, 2007

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