जिन्दगी का पानी
जिन्दगी का पानी जब छू लिया जाता है
उठती हैं तरंगे हर उभार में सच और गर्त में भरम लिए
मैं सोचता हूँ उस जिन्दगी को जो ठहरे पानी की है
कहां रहता है उसका सच और किधर बहता है भरम उसका
- सुशील गोस्वामी जुलाई 13, 2007 Top
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