ऋषिकेश
संवाद
गेरुआ
कपड़े,
सिर
मुडाए...
वेदान्ती
,
पतंजलियोग,
जन्म
से
मोक्ष....
कलकल
बहती
गंगा,
एक
डुबकी...
एक
नया
जन्म,
एक
ध्रुव
से
दूसरे
ध्रुव
के
यात्री...
अपने
होने
का
अर्थ
तलाशते...
आँखें
मूंद
लेते...
आंसू
थम
जाते
झिल्ली
बनकर,
पूर्ण
आस्था,
अनन्य
भक्ति,
स्थितिप्रज्ञता....
छोटी
लगती
जिन्दगी,
संध्या..
गंगा
की
आरती,
प्रान्जल्य
धाराओं
पर
अधबुझे
दीये...
वैरागी
मन,
शांत,
आश्वस्त
सोचता...
आकलन
करता
जीवन
का
गणित,
राम-
लक्षमण
झूले
पर
झूलती
आत्माएं....
पुरखों
को
मनन
कर...
सूरज
को
गंगाजल
अर्पित
करते
हाथ,
कुकून
से
निकलता
कीड़ा...
जीवन
की
सच्चाई,
दिन-रात
का
अनवरत
घूमता
चक्र...
भूख
से
मुक्ति
का
संघर्ष,
आज
की
चिन्ता....
सदगति....
मोक्ष
की
कामना...
एक
छोर
से
दूसरे
छोर
तक
लटकता
वह
राम
झूला......
ऊहापोह,
हरी
ॐ .
बालदेव पाण्डे
सितम्बर 1, 2007
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