पिया न आये
सांझ
घिर आयी,
आलोक भी छिप रहा,
संध्या की अस्तोन्मुख किरनें
भावातिरेक में-
अश्रु निर्झर बह चले.
कि,
पिया न आये!
बैलों की ग्रीवा में सजी
घण्टिया भी बज उठीं,
कि धूल भरे वसन लिए
अन्नदाता लौट पडे
पच्छम में यह हलचल कैसी
धरा से नभ तक धूल कैसी?
रम्भानें की आवाज करती इंगित
ग्वाला भी हैं लौट पडे.
खग गगन में चहक रहे,
नीड-मुखी उडान भर रहे
रीता मन मेरा कंपित होये
कि,
पिया न आये!
घिर
आयी निशि,
तम हुआ चहँ ओर
द्वार-द्वार दीप जल उठे,
झलमल-झलमल कर उठे.
मंदिर घडियाल बज उठा,
आरती का समय हुआ,
ढाेल-थाप उठने लगी
स्वर लहरी तिरने लगी.
रात्रि का बढता अंधेरा
तम में डूबा मन मेरा
हा-हाकार कर उठे-
कि,
पिया न आये!
चंद्र-किरण-हीन-तिमिर
दीप सब खो गये
रजनी का मध्य प्रहर
तात सब सो गये.
जग मे नि:स्वर शांति व्याप्त
हतभागिनी मैं,
पाऊं संताप,
नयन मेरे मुझे रूलाएँ,
कि,
पिया न आये!
कुलवन्त सिंह
मार्च 1, 2007
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