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पहचान
शक्ल
हो बस आदमी का क्या यही पहचान है। घाव छोटा या बडा एहसास दर्द का एक है। दर्द एक दूजे का बाँटें तो यही एहसान है।। अपनी मस्ती राग अपना जी लिए तो क्या जीए। जिंदगी, उनको जगाना हक से भी अनजान है।। लूटकर खुशियाँ हमारी अब हँसी वे बेचते। दीख रहा, वो व्यावसायिक झूठी सी मुस्कान है।। हार के भी अब सुमन का हार की चाहत उन्हें। ताज काँटों का न छूटे बस यही अरमान है।।
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