तुम

मैं देखता हूँ तुम्हारे हाथ
चटख नीली नसों से भरे
और
उंगलियों में भरी हुई उड़ान
मैं सोचता हूँ
तुम्हारी अनावृत  देह की सफ़ेद धूप
और उसकी गर्म आंच
मैं जीत्ताता हूँ तुमको
तुम्हारे व्याकरण और
नारीत्व की शर्तो के साथ
मैं हारता हूँ
एक पूरी उम्र
तुम्हारे एवज में!

कठिन समय में

हमें कठिन क्षणों में भी गुनगुनाना चाहिए अपना मौन
बुननी चाहिए उधड़ते हुए रिश्तो की सीवन
लिखनी चाहिए प्रेम कविताये
निहारना चाहिए चाँद के आलोक में लिपटता आकाश  
रखना चाहिए एक स्मृति फूल किताब के भीतर
और लौटना चाहिए पुराने दोस्त दिनों में

हमें कठिन समय में भी
अपने आदि मंत्र की तरह
सहेजकर रखनी चाहिए
बची खुची
जीवन क्र प्रति अपनी
कोमल जिजीविषा!

 

डॉ.मनीष मिश्रा
22सितंबर, 200
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