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हर्फे ताज़ा नई खुश्बू में लिखा चाहता है
बाग एक और मुहब्बत का खुला चाहता है - परवीन शाकिर मौसमे बहार मेरे गुलसितां में है ताज़ा
मोहब्ब्तों का नशा जिस्मों जां में है एक ख्वाब
है कि बारे दीगर देखते हैं हम एक शाखे
यास्मीन थी कल तक खिंज़ां असर खुश्बू को
तर्क करके न लाए चमन में रंग मसनद के
इतने पास न जाएँ कि फिर खले
परवीन शाकिर |
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